Apni Dukan

Wednesday, 27 December 2017

भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद : संजय झोटे


भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा. कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है. इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदि को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और विलको अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिकों की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये. कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पाई. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.


कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा ऊँचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद-वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नई बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए.

इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है.

भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता. यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है.

भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुड़ी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

~~~

संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

सविंधान नहीं ब्राह्मणों के ग्रंथो को जलाना होगा


जन उदय : आजकल एक नया सगूफा  भगवा आतंकियो ने छोड़ दिया है की   ये लोग सत्ता में सिर्फ सविंधान बदलने के लिए आये है क्योकी  देश की सारी  समस्याओं की जड   सविंधान है .

कमाल की बात यह है की १९४७  से देश के सविंधान जलाने वाले  तिरंगा  झंडा  जलाने वाले  औ देश में  दंगे कराने वाले जातिवाद  के जनक  रक्षक  और पोषक जिन्होंने देश की हर समस्या को जन्म दिया है ये कहते है की देश की समस्या सविंधान की वजह से है . जबकि उसके उल्ट देश की हर हर समस्या सिर्फ इन्ही जैसे लोगो की वजह से है इनके दिमाग की गंदगी , देशद्रोही भावना ने देश की हर समस्या को जन्म दिया है .

आईये  देखते है क्यों  है ये लोग देश के सबसे बड़े दुश्मन  एक उधाह्र्ण  लेते है   कि  एक संसदीय  क्षेत्र में  जहा पर त्रि स्तरीय  फंड  आता  है उस इलाके में स्कूल ,कॉलेज,  बिजली ,सडक  पानी , डिस्पेंसरी , अस्पताल  बनाने में कितना समय  लगेगा ??  आप कहेंगे   पांच साल , दस साल  .. आप हद से हद कहंगे बीस साल “ लेकिन आजादी के सत्तर सालो में यह नहीं हो पाया  , सोचिये क्यों , किसकी वजह  से .. ?? देश की  ८५ % सीट पर बैठा  ब्राह्मण बनिया  यह नहीं बताता  और आरक्षण को दोष देता है  जबकि ८५ % सीट पर बीतने वाला   नेता उच्च अधिकारी  ही   जिम्मेदार होगा न की आरक्षण या दलित 
अपने आपको  हमेशा  योग्यता वाला बताने वाला ब्राह्मण बनिया  का रिकॉर्ड ऐसा है की  हजारो सालो में  आज तक किचन से लेकर आसमान तक कोई चीज नहीं बनाई   गैस , बिजली , बल्ब , फोन , टीवी  , रेल जहाज , हथियार  कुछ भी नहीं .  तो देश का सबसे बड़ा दुश्मन कौन हुआ और क्या इस देश में  सविंधान कैसे जिम्मेदार  हुआ .  यानी एक ऐसी मानसिकता के लोग  जिन्होंने इस देश को सिर्फ लूटा  है और आज की तारीख में देश के  के लोकतंत्र  की ह्या कर ई वी एम् घोटाले के जरिये सत्ता पर काबिज भगवा आतंकी   कह रहे है की सविंधान जिम्मेदार है
देश में कितने कानून है  गरीबो के लिए  अपराधो को रोकने के लिए , बलात्कारो  को रोकने के लिए  तो क्या इनसे अपराध रुके  , नहीं रुके  वो सिर्फ  इसलिए  क्योकि ये देश के कानून  की इज्जत नहीं करते  देश के सविंधान की इज्जत नहीं करते  क्योकि ब्राह्मणवादी   संस्कृति को फैलाने वाले लोग  और इस  संस्कृति में अपराध को  उत्पीडन को महिला उत्पीडन  और हत्याओं को मान्यता  दी गई है और ये लोग इसी संस्कृति  को फैलाते है   तो असल में तो इनके ग्रन्थ और ये लोग ही जिम्मेदार है

 बाबा साहेब ने कहा था सविंधान चाहे जितना मर्जी खराब हो अगर उसका पालन करने वाले सही है तो वो सविंधान बेहतर ही साबित होगा  और सविंधान चाहे जितना मर्जी अच्छा  हो अगर उसके पालन करने वाले  सही नहीं  तो वह सविंधान खराब ही साबित होगा


देश में फ़ैल रहे  गेंगरेप , गोआतंक ,दंगे , लव जिहाद ,  ई वी एम् घोटाले अपराध है और इनको करने वाले  अपराधी . और ये अपराध करने वाले लोग भगवा आतंकी है . और इन अपराधियो  को खत्म करने के लिए इनकी किताबो  को इनकी संस्कृति  को  इस देश से खत्म करना होगा 

दीनदयाल हत्याकांड से बचने को अटल विहारी वाजपेयी ने इन्दिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कह कर खुश किया था ... कीर्ति कुमार

दीनदयाल हत्याकांड में अटल विहारी वाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी, मोदी सरकार जांच कराने से क्यों बच रही?
दीनदयाल की हत्या की जांच कराने के बजाए जन्मशती मनाकर किस रहस्य को छुपा रही है मोदी सरकार-रिहाई मंच
जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक ने दीनदयाल हत्याकांड में अटल बिहारी और नाना देशमुख की भूमिका पर उठाए थे सवाल...

मधोक ने लिखा अटल ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है
दीनदयाल का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, संघियों के अलावा कोई नहीं जानता
लखनऊ । रिहाई मंच ने कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती पर करोड़ों रूपया खर्च करके जश्न मनाने वाली मोदी सरकार द्वारा अपने इस विचारक की हत्या की जांच पर मौन रहना इस लोकधारणा को पुख्ता करता है कि उनकी हत्या में अटल बिहारी बाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी और इसीलिए मोदी सरकार हत्याकांड की जांच नहीं कराकर अटल बिहारी को बचाना चाहती है।

मंच ने यह भी कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, इसे पूरे देश में संघियों के अलावा कोई नहीं जानता। मंच ने कहा है कि जनता के पैसे से दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों को प्रतिष्ठित करने का यह भोंडा प्रयास भाजपा और संघ परिवार के नायकत्व विहीन होने की कुंठा से निपटने का हास्यास्पद नुस्खा है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि सुभाष चंद्र बोस की हत्या की जांच की मांग तो भाजपा करती है लेकिन अपने कथित दाशर्निकनेता दीन दयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर संदेहास्पद स्थिति में हुई हत्या की कभी जांच की मांग नहीं करती।
शाहनवाज आलम ने कहा कि समाज में यह धारणा व्याप्त है कि संघ और भाजपा दीन दयाल हत्याकांड की जांच की मांग इसलिए नहीं करती है कि इसमें खुद अटल बिहारी वाजपेयी और नाना जी देशमुख की भूमिका संदिग्ध थी। जिसका आधार पूर्व जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक द्वारा अपनी पुस्तक जिंदगी का सफरके तीसरे खंड में दीनदयाल हत्या कांड के संदर्भ में किए गए रहस्योद्घाटन हैं।


गौरतलब है कि पुस्तक में मधोक ने बताया है कि उन्हें अपने सूत्रों से पता चला था कि हत्या में जनसंघ के ही कुछ वरिष्ठ नेता शामिल थे और ये पार्टी पर नियंत्रण के लिए चल रहे आंतरिक संघर्ष का नतीजा था। पुस्तक में उन्होंने यह भी रहस्योद्घाटन किया था कि तत्कालीन सरकार द्वारा इस हत्या कांड की की जारी जांच को अटल बिहारी बाजपेयी और नाना जी देषमुख ने बाधित किया और उसे ठंडे दिमाग से किए गए हत्या के बजाए एक दुखद दुघर्टना के बतौर प्रचारित किया।

मधोक ने अपने दावे के समर्थन में इस तथ्य को भी पुस्तक में दर्ज किया है कि 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब सुब्रह्मणियम स्वामी ने तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से दुबारा जांच की मांग की लेकिन जनसंघ के मंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस प्रयास को बाधित कर दिया।
रिहाई मंच प्रवक्ता ने कहा कि जनमानस में एक धारणा यह भी है कि दीनदयाल की हत्या के पीछे एक कारण अवैध सम्बंधों से भी जुड़ा था जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख की भूमिका मास्टरमाइंड की थी और इस धारणा का आधार भी मधोक की पुस्तक में उजागर किए गए तथ्य ही हैं।

गौरतलब है कि अपनी पुस्तक के तीसरे खंड के पृष्ठ संख्या 25 पर मधोक ने लिखा है ‘‘मुझे अटल बिहारी और नाना देशमुख की चारित्रिक दुर्बलताओं का ज्ञान हो चुका था। जगदीश प्रसाद माथुर ने मुझसे शिकायत की थी कि अटल (बिहारी वाजपेयी) ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है। वहां नित्य नई-नई लड़कियां आती हैं। अब सर से पानी गुजरने लगा है। जनसंघ के वरिष्ठ नेता के नाते मैंने इस बात को नोटिस में लाने की हिम्मत की। मुझे अटल के चरित्र के बारे में कुछ जानकारी थी। पर बात इतनी बिगड़ चुकी है, ये मैं नहीं मानता था। मैंने अटल को अपने निवास पर बुलाया और बंद कमरे में उससे जगदीश माथुर द्वारा कही गई बातों के विषय में पूछा। उसने जो सफाई दी बात साफ हो गई। तब मैंने अटल (बिहारी वाजपेयी) को सुझाव दिया कि वह विवाह कर ले अन्यथा वह बदनाम तो होगा ही जनसंघ की छवि को भी धक्का लगेगा।
’’
मंच के नेता अनिल यादव ने दावा किया है कि इंदिरा गांधी सरकार में हुई दीनदयाल हत्याकांड की जांच में सीबीआई और जस्टिस चंद्रचूड़ आयोग, दोनों ने ही अटल बिहारी और नाना देषमुख की भूमिका को संदिग्ध पाया था और उस रिपोर्ट को जल्दी ही इंदिरा गांधी सरकार सार्वजनिक करने वाली थी। जिसे रोकने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने बांग्लादेश के निमार्ण में निभाई गई भूमिका के लिए इंदिरा गांधी को सदन में दुर्गाकह कर सम्बोधित कर दिया। जिससे चापलूसों को पसंद करने वाली इंदिरा गांधी ने खुश होकर रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

अनिल यादव ने कहा कि अगर इंदिरा गांधी ने दीनदयाल उपाध्याय के हत्यारों को इंसाफ देने का साह
स दिखाया होता तो अटल बिहारी वाजपेयी और नाना देशमुख को इस जघन्य हत्याकांड में फांसी या उम्र कैद की सजा हो गई होती।

Sunday, 17 December 2017

चुनाव आयोग ने माना गुजरात में हुई है ई वी एम् हेक :सबूत के साथ सबसे बड़ा खुलासा,

जन उदय  जिस तरह सभी विपक्षी पार्टिया  यह कह रही है भाजपा ई वी एम् हैकिंग  का सहारा लेकर चुनाव जित रही है  जो न सिर्फ   गैर-कानूनी है बल्कि लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा  है , भगवा  गुंडों  के होंसले इतने बढ़ते  जा रहे है की उत्तर प्रदेश में पुलिस वालो  की पिटाई  हो रही है  उनकी हत्याए  की जा रही है बल्कि दिन रात गेंग  रेप  , हत्या , बलात्कार जैसी  घटनाए  बढती जा रही  है
हाल में  राजेस्थान में एक भगवा आतंकी शम्भु  नाम के युवक ने एक मुस्लिम युवा की हत्या कर उसको आग लगा दी और इसी क्रम  में आगे बढ़ते  हुए उसके समर्थको  ने कोर्ट  की  बिल्डिंग पर ही भगवा लहरा दिया  इस तरह की घटनाओं  ने लोकतंत्र  को  शर्मशार  कर  दिया है और कमाल की बात यह है इन दोनों घटनाओं में राज्य  की भाजपा सरकार ने कोई भी कड़ी  कार्यवाही  नहीं की है हां

  अगर गलित से य घटना किसी  ब्राह्मण   या राजपूत के साथ हुई होती  तो पुरे राज्य में इस वक्त सरकार द्वारा समर्थित  उत्पात  मचा  होता  और इन सब की  जड़  में है ई वी एम्
ई वी एम्  हैकिंग  की वजह से भाजपा आज २०१४  के चुनाव के जरिये केंद्र में  काबिज  है  और इसी कारण  देश में भगवा आतंक बढ़ता  जा रहा है लेकिन गुजरात चुनाव के दौरान खुद चुनाव आयोग ने यह स्वीकार कर लिया  है की चुनाव  में ई वी एम् मशीन हैक  की जा रही है और यही कारण रहा की राज्य में जहा जहा चुनाव  हो रहे थे  वहा पर चुनाव आयोग ने इन्टरनेट  सेवाए  बंद कर दी


इस बात का खुलासा  श्री के एल परमार   जो उप  चुनाव आयुक्त  है गुजरात  के उनके एक खत के लीक  होने के बाद हुआ है   और  इस खत की एक प्रति  जन उदय  के हाथ भी लगी  है  ,
यह खत  असली  है या नकली   खुद चुनाव आयोग ने इस बात की पुष्टि  नहीं की है हमारे सहयोगियो  द्वारा  पुष्टि  के प्रयास किये गए यकीन चुनाव आयोग से कोई जवाब नहीं मिला

Thursday, 14 December 2017

दलित /मूलनिवासी आन्दोलन की समस्याए और समाधान : सुरेंदर सागर


जन उदय : भारत के मूलनिवासी , ब्राह्मणों ने जिन्हें शुद्र का दर्जा दे कर अपने  कपोल  कल्पित  ग्रन्थ और भगवानो  की रचना के माध्यम से शुद्र  बनाया और इन्हें जीवन जीने के सभी अधिकारों से वंचित रखा , इनके अंदर समाज को बदलने की और अपने अधिकारों की जागरूकता  मध्यकाल से आनी  शुरू हो गई  थी . लेकिन ये  आन्दोलन  और सामाजिक चेतना की धाराए  महात्मा  ज्योतिबा फुले , माता सावित्री बाई फुले  जिन्होंने भारत में महिलाओं को शिक्षा  देना प्रारम्भ  किया  और उसके बाद अंग्रेजो  के शाशन काल  और उनके दुवारा किये गए हुए कानूनी , सुधार  और समाजिक सुधारों के जरिये जो चेतना  शुद्र / दलित / एस सी एस टी के बीच  आई  उसी परम्परा  के रहते बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के जरिये  मूनिवासियो ने अपना हक अंग्रेजो से प्राप्त कर लिया , लेकिन धूर्त  गाँधी ने  चाल चली और  अपने पाखंड  के जरिये  बाबा साहेब से पूना पैक्ट करवा लिया लेकिन बाबा साहेब  चूँकि  ब्राह्मणों के चरित्र को बाखूबी समझते  थे इसलिए उनकी  दूरदर्शिता  ने  शुद्रो  को  बचा  लिया  और बाबा साहेब ने इस फैसले में एस सी  एस टी के लिए आरक्षण की मांग की  जिसे मान लिया गया  , सो आरक्षण पूना पैक्ट का  परिणाम  बन  गया .

लेकिन ब्राह्मणों  की धूर्तता से जितना  इतना आसान नहीं था  बाबा साहेब या बात जानते थे  और उनके दलित / बहुजन  लोग इतने  पढ़े  लिखे  समझदार , सामाजिक और आर्थिक रूप से भी सक्षम  नहीं थे इस करके बाबा साहेब के लिए यह लड़ाई  और भी ज्यादा  मुश्किले  थी  इसलिए बाबा साहेब हमेशा   बहुजन युवाओं से कहते थे  कि “”अगर आप मेरा कारवा   आगे न ले जा सको  तो इसे पीछे  मत जाने देना”” 
बाबा साहेब  के जाने के बाद  इतना वक्त गुजरा  , दलितों  पर अत्याचार  कम  होने  की जगह बढ़ते  गए   ब्राह्मणों  का पुरोहितवाद  , आतंकवाद  किसी  न किसी शक्ल में सामने आता ही रहा  है   आरक्षित वर्ग पर  ब्राह्मण बैठ  गया , दलितों के हिस्सों को खा गया उनकी जमीने , अनाज , विकास का फण्ड  खा गया , उनको शिक्षा  के अधिकारों  को खा गया   और यही कारण रहा है की आज २०१७  में भी  लगभग  ७५ % सीट पर केवल ब्राह्मण विराजमान है और उन तमाम सीट पर विराजमान  है जो  सत्ता  की चाबी  होते है  , न्यायपालिका , आदि सब में घुसे बैठे है .

हालांकि  दलित उत्थान  और दलित राजनीति के नाम पर सबसे बड़ी पहल देश में मान्वर कांसीराम जी ने की बसपा  के रूप में   बसपा ने  इतना जी तोड़  काम किया की देश में राजनीती  को एक अलग मोड़  दे दिया  और आलम यह हो गया की किसी  वक्त   डंडे के जोर  पर वोट  ले लिए जाते  थे  अब उन्ही दलित वोटो  को  एक समीकरण  के रूप में देखा जाने लगा  और वो भी उनकी अपनी मर्जी से , वरना  खाने पिने , रहने की मर्जी  क्या होती है  ये दलित जानता ही नहीं था , लेकिन इसके बावजूद दलित राजनीति  में जो परिवर्तन आने चाहिए थे , दलित  राजनीती से जो परिवर्तन आने चाहिए  थे ,वो नहीं आये  आज २०१७ अलविदा  होने जा रहा है  लेकिन दलित लडकियो  के बलात्कार , हत्या , लूट , , सहारनपुर ,  रोहित वेमुला , डेल्टा मेघवाल , उना काण्ड हमारे माथे  पर अपमान के टीके  बन कर लगे है , और हम कुछ नहीं कर सके  और न ही कुछ कर सकते
ऐसा क्यों इसके कारणों  के कारण  और निवारण  नहीं हो जाता  तब तक इस देश में दलित / मूलनिवासी  उत्पीडन  ऐसे ही चलता  रहेगा

इसके मुख्य कारण में है


१.       दलित युवा आज के दौर में बहुत आक्रोशित है  और अपने अपने स्थान पर ऐसा लगता है कि वह एक ऐसी  मिसाइल  है  जो समाजिक परिवर्तन के चलाई  जा रही  है लेकिन इसकी ख़ास बात यह है कि इस मिसाइल  के पास कोई दिशा निर्देश नहीं है  यानी  ये युवा एक अनगाइडेड मिसाइल  है और  सही दिशा न मिलने के कारण ये मिसाइल अंत में  फूस हो कर गिर जाती है , यानी जब इनके द्वारा किये गए कार्य से कोई परिणाम नहीं निकलता  तो लोग हताश व् निराश हो कर  बैठ जाते है  जबकि  दलित आन्दोलन में शामिल  संस्था  और राजनैतिक पार्टियो को चाहिए की उनको एक सूत्र में बांधे
२.        दूसरा कारण  है दलित प्रतिनिधिओ का बिकायु  होना  या अवसरवादी  निकल जाना  , यानी ऐसा नहीं  है की दलित आन्दोलन में कोई संस्था बिलकुल ही काम नहीं कर रही है   काम तो हो रहे है लेकिन इनके प्रतिनिधि   इन युवाओं की उतेजन का लाभ अपने निजी फायदे के लिए उठा लेते  है  और  संघी  जैसी पार्टियो के हाथो  बिक जाते है , जैसे उदित राम हुआ , रामदास अठावले , , रामविलास पासवान , आदि आदि  ये लोग दलितों  की रहनुमाई के नाम पर दलितों  की दलाली करने लग जाते है , हलांकि ठीक ऐसा ही फायदा  आजादी से पहले से लेकर वामपंथी  पार्टियो ने उठाया और समाजिक बराबरी के नाम पर इन युवाओं को  गुमराह किया
३.       दलितों  का सूचना तंत्र : एक राजनैतिक  आन्दोलन के लिए एक सूचना का फ्लो  बड़ा जरूरी  होता है  यानी किसी  विषय पर क्या स्टैंड  होगा यह बहुत जरूरी है , लेकिन दलितों में ऐसा कोई तंत्र नहीं  जो जिसके मन में आता है वह बोल देता है कर देता है .

४.       खुद दलित नेताओं के द्वारा दलितों का शोषण राजनीतिक  रूप से होता है  यानी खुद दलित नेता दल के अंदर ऐसे दलित नेता को आगे नहीं बढ़ने देते  जो काफी तेज  हो  , क्योकि ऐसे युवा को आगे बढ़ने  दिया गया तो ऐसे बहुत से दलित बुद्धिजीवी  है जो साइड लाइन हो जाएंगे , ऐसा बसपा  में बहुत है और अन्य पार्टी में हद से जयादा है
५.       आर्थिक –समाजिक रूप से कमजोर :  दलित आन्दोलन में एक समस्या यह बहुत है की  दलित आर्थिक रूप  से और समाजिक रूप से बहुत कमजोर है यानी अगर किसी समस्या पर आन्दोलन करना  हो तो शायद ही हजार दो हजार  दलित सामने आ पाए उसका कारण  अगर आनोद्लं करेंगे तो खायंगे क्या ?? दुसरा अन्य जाति के लोगो ने देखा तो जब वो लोग इकट्ठे हो कर हमला करेंगे  ऐसी हालत में दलित इकट्ठा  हो कर मुकाबला करने में असमर्थ होंगे
६.       हिन्दू  बनाम शुद्र : अपनी सत्ता  बनाए रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग लगातार कार्यशील  है ये लोग फिल्मो , साहित्य , सोशल नेट वोर्किंग , आदि के जरिये  समाज में भ्रान्तिया फैलाते रहते है  यानी दलितों को हिन्दू बनाए रखने के लिए  ( हिन्दू यानी शुद्र , शुद्र यानी ब्राह्मणों  के गुलाम ) हिन्दू – मुस्लिम का  दंगा लगाए रखते है

७.       आर्थिक विषमता और अनिश्चिता  भगवान् को जन्म देती है : भारत में  लोग जल्द विशवास करने वाले , कार्टून जैसी चीजो से डरने वाले , वीभत्स  इमेज से डरने वाले होते है लेकिन अगर आर्थिक रूप से कोई समाज  विषम हो और जीवन में खाने पिने , रहने , स्वास्थ और जीवन जैसी किसी  भी चीज पर कोई निश्चितता न हो  तो वहा एक भगवान् का जन्म हो जाता  है , धर्म को मानने का मतलब है जैसा है उसमे गुजरा करो तकलीफों से जूझो और उस परम , असीम कृपा वाले भगवान् को मानो , अब ये भगवान् के मालिक  और  रिश्तेदार कौन है ?? यह समझने की बात है
८.       प्रबुद्ध वर्ग की अनदेखी : दलित वर्ग में एक ऐसा बहुत बड़ा वर्ग ही जो आरक्षण का लाभ  उठा एक शीर्ष स्तर पर पहुच गया गया है लेकिन  अपनी जाति  को ही अपमानित समझता है  और और अपने समाझ के लोगो से दूर हो जाता है वह न तो इस समाज के कुछ काम आता है बाकायदा   ब्राह्मणवाद को यानी अपने दुश्मनों  के खेमो  को मजबूत करता  है

९.       आन्दोलन को  क्रिएटिव  और रोचक न बनाना :  दलित लोग प्रोटेस्ट के सिर्फ पुराने  तरीको पर टिका है जबकि   देश दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमेशा  अपने आन्दोलन को क्रिएटिव  बनाना  होता है , वही सोंग , वही नाटक , वही लोग लेकिन इर भी अलग लगे ,जो लोग तेलंगाना  आन्दोलन से जुड़े है या उन्होंने दिल्ली में उनके धरने पदर्शन देखे है उनको यह बात अच्छी  तरह याद होगा की ऐसा कोई प्रोटेस्ट  नहीं रहा होगा जिसको मीडिया ने कवर न किया हो , कवर करने की वजह में क्रिएटिविटी  एक बहुत बड़ा कारण रहा था

१०.   कला संस्कृति के माध्यम से चेतना बड़े : कला संस्कृति  एक बहुत बड़ा हथियार है इसलिए  इन दोनों माध्यमो  को  काफी मजबूत करना होगा और मूलनिवासी वर्ग को अपनी ब्राह्मण से पूर्व अपनी संस्कृति  को  आगे बढाए


अगर दलित समाज  सिर्फ   संघठित हो जाए  और अपने सुचना तंत्र को सही बना ले  तो वो दिन दूर नहीं की जब दलित पहले की तरह इस देश के राजा होंगे और ब्राह्मण  इस देश को छोड़ भागेंगे 

Tuesday, 12 December 2017

पुष्यमित्र शुंग / परशुराम गद्दार ब्राह्मण , जिसने की लाखो बौध लोगो की हत्या और स्थापित किया ब्राह्मणवाद


जन उदय : ये बात सब को बड़ी अजीब लगेगी की ऐसा कौनसा  समाज दुनिया में हो सकता है जो अपने ही समाज के लोगो  की हत्या , बलात्कार को  जायज समझता है  और बाकायदा इस उत्पीडन और हत्याओं को ये लोग धार्मिक जामा  पहनाते  है , और यह कहते है की इन्हें तो भगवान्  ने ऐसा करने के लिए  बनाया है , और यही नहीं शिक्षा सम्पति  और अधिकार से ये लोग वंचित रखते है .. ऐसे लोग क्या किसी सभ्य समाज के हिसा हो सकते है ??  नहीं शायद नहीं  ये बर्बर लोग है  जंगली लोग है जो इंसानियत  और मानवता को  न जानते है न समझते है   क्या आप जानते है  की ये लोग कौन है  ??  जी हाँ ये लोग  है ब्राह्मण

देश के सबसे बड़े गद्दार , देशद्रोही   साबित हुए  ये लोग आज भी दुसरे लोगो को शिक्षा , और मानवाधिकारों से वंचित रखना चाहते है  और अपना शासन  स्थापित करना चाहते है

सम्राट अशोक ने अपने राज्य में पशु हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके कारन ब्राह्मणों की रोजगार योजना बंद को गई थी, उसके बाद सम्राट अशोक ने तीसरी धम्म संगती में ६०,००० ब्राह्मणों को बुद्ध धम्म से निकाल बाहर किया था, तो ब्राह्मण १४० सालों तक गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे थे, उस वक़्त ब्राह्मण आर्थिक दुर्बल घटक बनके जी रहे थे, ब्राह्मणों का वर्चस्व और उनकी परंपरा खत्म हो गई थी, उसे वापस लाने के लिए ब्राह्मणों के पास बौद्ध धम्म के राज्य के विरोध में युद्ध करना यही एक मात्र विकल्प रह गया था, ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए

अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के पौत्र , मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट राजा बृहद्रथ मौर्य की हत्या धोखे से उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में ईसा.पूर्व. १८५ में रक्त रंजिस साजिश के तहत प्रतिक्रांति की और खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।

और इस प्रकार ब्राह्मणशाही का विजय हुआ।


उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता था।

उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पर यूनानी राजा मिलिंद का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया, इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की शरण ली।

जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा खारवेल को पता चला तो उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र से यूनानी राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया।
इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग राम ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी...

राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग राम ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ का कत्लेआम हुआ। राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे । इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा दता था।

राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया।
इसी "सरयू" नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया थ


Brahmaan kingdom / dominance was established by Pushyamitr shung / Parshuram was the chief soldier of vrahdhasth  the grand son of  King Ashok in 180 BC ,  Pushymitr shung  killed millions of Boudhist People  demolished more then  90 thousand  Boudh Vihar and  Stupa and converte them into temple

Brahmins   nomads of Europe  and central asia originally came  to india in search of food and water  and a peaceful life but later  by  luring  local kings  giving them their daughters  they got  the place in courts of local king . but  they did as their original nature was , treachery , ungretfulness 

Monday, 11 December 2017

मोदी को गुजरात में हार का डर , उतर आये संघी स्टाइल के घटिया स्तर पर , हार्दिक, राहुल की रैलियो पर गैरकानूनी रोक


जन उदय : नरेंदर मोदी को गुजरात में हार डर  सता रहा है , और यही कारण है की ऐसा लगता है जैसे मोदी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे है और अंट शंट ब्यान  और आरोप  लगा रहे है , यह बात गोरतलब है की  गुजरात को भाजपा को गड कहा  जाता रहा है  ,गुजरात में भाजपा किसी भी तरीके से सिर्फ जित हांसिल  करना चाहती है , यह  चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है की इस चुनाव को २०१९ का सेमी फाइनल  भी कहा जा रहा है


यह बात पहले से ही उठ रही है कि ..देश का का लोकतंत्र खतरे में है इसके प्रमाण हर चुनाव में उबर कर सामने आ रहे है ९ दिसम्बर २०१७ को जब गुजरात में चुनाव हुए तो दो बात विशेष रूप से सामने आई ई वी एम् की पहली ये वाई फाई से कनेक्ट हुई बल्कि गड़बडियो की एक लम्बी फेहरिस्त सामने आ गई यही नहीं सबसे बड़ा कमाल तो यह रहा की दोपहर दो बजे तक गुजरात में सिर्फ ३० प्रतिशत वोटिंग हुई लेकिन दो बजे से लेकर चार बजे के बीच ६० प्रतिशत वोटिंग हो गई ये सिर्फ दो घंटे में ३० प्रतिशत वोटिंग यह अपने अप में चकित करने वाली बात है अब यह अनुमान लगाए जा रहे है की जो भाजपा गुजरात , मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ़ में चुनाव जीतती आ रही थी वे भी ई वी एम् की मेहरबानी से थे ,


सबसे बड़ी बात की मोदी और भाजपा में हार का इतना डर  बैठ  गया है की गुजरात में राहुल गाँधी , जिग्नेश मेवानी , हार्दिक पटेल  के रोड शो  पर कानून  वाव्य्स्था का हवाला दे कर  रोक लगा दी गई है .

यह रोक  गैर कानूनी है जिसे  कानून के फारमे में दिखाया जा रहा है 



bjp scared of defeat in gujrat ,evm scam