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Sunday, 25 February 2018

भारत सभी अलगाववादी पार्टी भाजपा के साथ ही क्यों ?? : मो.मिनाज़

देश में अलगाववाद एक ऐसी समस्या है जिससे भारत आजादी के बाद से ही जूझ रहा है और इसकी वजह से वुरे देश में अशांति है इन शक्तिओ के उबरने का एक कारण यह भी है की इनके क्षेत्रो में सामाजिक -आर्थिक विकास न के बराबर हो पाया और इसको एक षड्यंत्र के तहत होने ही नहीं दिया गया यानी जानबूझ कर इन कोमो को इन प्रान्तों को विकास से दूर रखा गया . 

कमाल की बात यह है की १९५० से लेकर अब तक देश की नौकरशाही , राजनीती और प्रशासन में केवल और केवल एक ही जाति के लोग हावी रहे है यानी ब्राह्मण और इन ब्राह्मणों ने देश केविकास के पैसे को लूट लिया और देश से इस गद्दारी को नाम दिया भ्रष्टाचार . खैर 



आज बैठे बैठे अचानक मन में विचार आया, आप भी एक बार विचार जरूर कीजिएगा... 
अलग गोरखालैंड की मांग करने वाला 
"गोरखा जनमुक्ति मोर्चा" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 
आज़ाद नागालैंड की मांग करने वाला 
"नागा जनमुक्ति मोर्चा" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 
आज़ाद कश्मीर की मांग करने वाली 
"पीडीपी" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 
आज़ाद खालिस्तान की मांग करने वाला 
"अकाली दल" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 
केवल मराठियों के लिए महाराष्ट्र की मांग करने वाली "शिवसेना" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 
अलग बोडोलैंड की मांग करने वाला 
"बोडो जनमुक्ति मोर्चा" का गठबंधन बीजेपी के साथ है। 

Wednesday, 27 December 2017

भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद : संजय झोटे


भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा. कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है. इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदि को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिकों की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये. कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पाई. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.


कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा ऊँचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद-वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नई बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए.

इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है.

भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता. यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है.

भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुड़ी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

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संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

दीनदयाल हत्याकांड से बचने को अटल विहारी वाजपेयी ने इन्दिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कह कर खुश किया था ... कीर्ति कुमार

दीनदयाल हत्याकांड में अटल विहारी वाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी, मोदी सरकार जांच कराने से क्यों बच रही?
दीनदयाल की हत्या की जांच कराने के बजाए जन्मशती मनाकर किस रहस्य को छुपा रही है मोदी सरकार-रिहाई मंच
जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक ने दीनदयाल हत्याकांड में अटल बिहारी और नाना देशमुख की भूमिका पर उठाए थे सवाल...

मधोक ने लिखा ‘अटल ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है’
दीनदयाल का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, संघियों के अलावा कोई नहीं जानता
लखनऊ । रिहाई मंच ने कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती पर करोड़ों रूपया खर्च करके जश्न मनाने वाली मोदी सरकार द्वारा अपने इस विचारक की हत्या की जांच पर मौन रहना इस लोकधारणा को पुख्ता करता है कि उनकी हत्या में अटल बिहारी बाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी और इसीलिए मोदी सरकार हत्याकांड की जांच नहीं कराकर अटल बिहारी को बचाना चाहती है।

मंच ने यह भी कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, इसे पूरे देश में संघियों के अलावा कोई नहीं जानता। मंच ने कहा है कि जनता के पैसे से दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों को प्रतिष्ठित करने का यह भोंडा प्रयास भाजपा और संघ परिवार के नायकत्व विहीन होने की कुंठा से निपटने का हास्यास्पद नुस्खा है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि सुभाष चंद्र बोस की हत्या की जांच की मांग तो भाजपा करती है लेकिन अपने कथित ‘दाशर्निक’ नेता दीन दयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर संदेहास्पद स्थिति में हुई हत्या की कभी जांच की मांग नहीं करती।
शाहनवाज आलम ने कहा कि समाज में यह धारणा व्याप्त है कि संघ और भाजपा दीन दयाल हत्याकांड की जांच की मांग इसलिए नहीं करती है कि इसमें खुद अटल बिहारी वाजपेयी और नाना जी देशमुख की भूमिका संदिग्ध थी। जिसका आधार पूर्व जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक द्वारा अपनी पुस्तक ‘जिंदगी का सफर’ के तीसरे खंड में दीनदयाल हत्या कांड के संदर्भ में किए गए रहस्योद्घाटन हैं।


गौरतलब है कि पुस्तक में मधोक ने बताया है कि उन्हें अपने सूत्रों से पता चला था कि हत्या में जनसंघ के ही कुछ वरिष्ठ नेता शामिल थे और ये पार्टी पर नियंत्रण के लिए चल रहे आंतरिक संघर्ष का नतीजा था। पुस्तक में उन्होंने यह भी रहस्योद्घाटन किया था कि तत्कालीन सरकार द्वारा इस हत्या कांड की की जारी जांच को अटल बिहारी बाजपेयी और नाना जी देषमुख ने बाधित किया और उसे ठंडे दिमाग से किए गए हत्या के बजाए एक दुखद दुघर्टना के बतौर प्रचारित किया।

मधोक ने अपने दावे के समर्थन में इस तथ्य को भी पुस्तक में दर्ज किया है कि 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब सुब्रह्मणियम स्वामी ने तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से दुबारा जांच की मांग की लेकिन जनसंघ के मंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस प्रयास को बाधित कर दिया।
रिहाई मंच प्रवक्ता ने कहा कि जनमानस में एक धारणा यह भी है कि दीनदयाल की हत्या के पीछे एक कारण अवैध सम्बंधों से भी जुड़ा था जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख की भूमिका मास्टरमाइंड की थी और इस धारणा का आधार भी मधोक की पुस्तक में उजागर किए गए तथ्य ही हैं।

गौरतलब है कि अपनी पुस्तक के तीसरे खंड के पृष्ठ संख्या 25 पर मधोक ने लिखा है ‘‘मुझे अटल बिहारी और नाना देशमुख की चारित्रिक दुर्बलताओं का ज्ञान हो चुका था। जगदीश प्रसाद माथुर ने मुझसे शिकायत की थी कि अटल (बिहारी वाजपेयी) ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है। वहां नित्य नई-नई लड़कियां आती हैं। अब सर से पानी गुजरने लगा है। जनसंघ के वरिष्ठ नेता के नाते मैंने इस बात को नोटिस में लाने की हिम्मत की। मुझे अटल के चरित्र के बारे में कुछ जानकारी थी। पर बात इतनी बिगड़ चुकी है, ये मैं नहीं मानता था। मैंने अटल को अपने निवास पर बुलाया और बंद कमरे में उससे जगदीश माथुर द्वारा कही गई बातों के विषय में पूछा। उसने जो सफाई दी बात साफ हो गई। तब मैंने अटल (बिहारी वाजपेयी) को सुझाव दिया कि वह विवाह कर ले अन्यथा वह बदनाम तो होगा ही जनसंघ की छवि को भी धक्का लगेगा।
’’
मंच के नेता अनिल यादव ने दावा किया है कि इंदिरा गांधी सरकार में हुई दीनदयाल हत्याकांड की जांच में सीबीआई और जस्टिस चंद्रचूड़ आयोग, दोनों ने ही अटल बिहारी और नाना देषमुख की भूमिका को संदिग्ध पाया था और उस रिपोर्ट को जल्दी ही इंदिरा गांधी सरकार सार्वजनिक करने वाली थी। जिसे रोकने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने बांग्लादेश के निमार्ण में निभाई गई भूमिका के लिए इंदिरा गांधी को सदन में ‘दुर्गा’ कह कर सम्बोधित कर दिया। जिससे चापलूसों को पसंद करने वाली इंदिरा गांधी ने खुश होकर रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

अनिल यादव ने कहा कि अगर इंदिरा गांधी ने दीनदयाल उपाध्याय के हत्यारों को इंसाफ देने का साह
स दिखाया होता तो अटल बिहारी वाजपेयी और नाना देशमुख को इस जघन्य हत्याकांड में फांसी या उम्र कैद की सजा हो गई होती।

Friday, 8 December 2017

धार्मिक आंतकवाद लोगो को आदमखोर बनाता हुआ : उदय चे

राजस्थान के राजसमंद में एक धार्मिक आंतकवादी ने जिस प्रकार से एक बुजर्ग मजदूर को धोखे से काम के लिए बुलाकर उसकी निर्ममता से हत्या की गई। उसकी पीठ पर वार किया गया। उसके अंगों को बड़ी बेहरमी से काटा गया फिर उसको जलाया गया। उसके बाद जिस निडरता से कातिल ने कत्ल करने के पिछे का राज बताया, हत्या को जायज ठहराने के लिए जिस प्रकार कातिल ने महाराणा प्रताप को कोट किया, जय मेवाड़, जय भारत, जय हिंद का नारा दिया। मन्दिर में वीडियो को बनाना औऱ भगवा रंग, ये सब उस धर्म के जहर का असर है जिसे धीरे-धीरे हिंदुत्व की सिरिंज से चढ़ाया गया है। ऐसे लोगो को आदमखोर जानवर धीरे-धीरे हिंदुत्ववादी आंतकवादियो ने बनाया है। कोई भी इन्सान या समाज आदमखोर एक दम नही बन जाता इसके लिए धार्मिक आंतकवादी बहुत लंबे समय से काम कर रहे होते है। भारत की आजादी के आंदोलन में जहाँ बहुत बड़ा तबका देश को आजाद करवाने के लिएअंग्रेजो के खिलाफ मजबूती से लड़रहा था। 


शहीद भगत सिंह और उसके साथियों ने देश की ही नही, पूरी मानव जाति की आजादी के लिए 1928 में जहाँ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का गठन किया। जिसने मानव मुक्ती के लिए संघर्ष का आह्वान किया। वही दूसरी तरफ भारत में अंग्रेजो की मद्दत से आजादी के आन्दोलन और HSRA के खिलाफ मुस्लिम और हिंदुत्वादी संघठनो को मजबूत किया गया। जिनका मुख्य एजेंडा ही मानव मुक्ति के संघर्ष की बुनियाद मेहनतकश आवाम की एकता को तोड़ने के लिए भारतीय समाज में धर्म-जात-इलाका के नाम परलोगो को बांटना था। इस मुहिम में वो कामयाब भी रहे। गोड़से जिसको धर्म के जहर ने धीरे-धीरे आदमखोर जानवर बनाया। इस आदमखोर जानवर का सहारा लेकर इसके आकाओं ने महात्मा गांधी की हत्या करवाई। महात्मा गांधी की हत्या इसी हिंदुत्वादी आंतकवादी लाइन द्वारा की गई हत्या थी। बाबरी मस्जिद को तोड़ने की, बम्बई, गुजरात, गन्धमालके दंगे हो या प्रगतिशील बुद्विजीवियों, कलाकारो, छात्रों, मजदूर नेताओं, लेखकों, पत्रकारो की हत्याये ये सब धार्मिक आतंकवादियों द्वारा अपने आकाओं के इशारे पर की गयी कार्यवाईयाँ है।
एक आदमी जान-बूझकर, सोच-समझकर अपने हाथों से हत्या करता है और उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं है। ये धार्मिक पागलपन हैऔऱ ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी यहाँ दलितो, मुश्लिमो, सिखों व आदिवासियों के नरसंहार हुए है। बस वीडियो अब बनने लगे है। हरियाणा के झज्झर जिले केदुलीना में 5 दलितो को इसलिए जिंदा जला दिया गया था क्योकि वो मरे हुए पशुओं को उठाकर उनकी खाल उतारने का काम करते थे। उस दिन भी वो मरी हुई गायों की खाल उतार कर अपने घर जा रहे थे। इस काम का उनके पास सरकारी मंजूरी भी थी लेकिन आदमखोरों ने उनको घेर लिया और धर्म के नाम पर जिंदा जला दिया। ऐसे ही मिर्चपुर में अंधे बुजर्ग ओर उसकी अपँग बेटी को भीड़ ने जला दिया था। दादरी के अखलाक, जुनैद औऱ अलवर के पास हुई किसान पहलू खान की इन आदमखोरों द्वारा हत्याये इसी धार्मिक जहर का असर है। लेकिन जब ये आदमखोर जानवर अपना शिकार करते है तो बाकी आवाम की चुप्पी ये साबित करती है कि आप भी इस धर्म के जहर के प्रभाव में वहसी दरिंदे बनने की तरफ बढ़ रहे हो। धार्मिक आंतकवादी इन सभी हत्यायों के बाद जश्न मनाते है हत्या के पक्ष में दलील देते है और हत्यारों को समान्नित करते है। आप ऐसे धार्मिक आतंकवादियों के समर्थन में जय जयकार करते हो या चुप रहते हो।आपकी जय जयकार या चुप्पी आपकी आने वाली नश्लो को आदमखोर जानवर बना देगी। फिर इंसानी बस्ती होने कीबजाए आदमखोरों की बस्ती होगी। उस समय इंसानी मूल्य, सिंद्धान्त, मानवतासब खत्म हो जायेगें। इसलिए अभी भी समय है अगर हमे इंसानी सभ्यता को बचाना है तो खुद के धर्म के इन धार्मिक आंतकवादियो का नाश करना पड़ेगा। धर्म-जात-इलाका से ऊपर उठकर हमे मेहनतकश आवाम की एकतास्थापित करनी होगी। क्योकि लुटेरी मण्डली का ये सारा खेल ही इस एकता को तोड़ने के लिए है। भारत में ही नही पुरे विश्व मे जब भी मेहनतकश मानव मुक्ति के लिए एकजुट होना शुरू करता है तो सामंतवादी, पूंजीवादी लुटेरी मण्डली धर्म-जात-इलाका औऱ अंधराष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को बांटने का काम करती है। अल्पसंख्यको, दलितो, आदिवासियों को दुश्मन के तौर पर बहुसंख्यक आबादी के सामने पेश करती है और अल्पसंख्यको, दलितो, आदिवासियों पर हमले करने के लिए बहुसंख्यक आबादी को तैयार करती है। पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी सत्ताएँ पिछले दरवाजे से इनको संचालित करती है। तालिबान, अलक़ायदा, isisi, भारत मे हिंदुत्वादी आंतकवादी इन सब के पीछे साम्राज्यवादी खेमा मजबूती से खड़ा है। जो इनको फंडिंग करता है।


बहुत पहले हॉलीवुड की एक फ़िल्म रॉंग टर्न फ़िल्म देखी थी। रॉंगटर्न का मतलब होता है "गलत रास्ता"
इसफ़िल्म कि कई सीरीज मार्किट में आई। ये सभी सीरीज इतनी डरावनी औऱ हॉरर थी कि अकेलाआदमी सायद न देख सके। फ़िल्म में कहानी ये है कि कुछ वज्ञानिक गरीब लोगों पर बिना सरकार कीइजाजत लिए दवाइयों का प्रयोग करते है। ऐसी दवाइयों का प्रयोग जो मानव हित मे न होकर मानव की बर्बादी की तरफ जाता है। जिन इंसानो ओर ये प्रयोग किये जाते है वो सब उन दवाइयों के कारण विकृत हालात ने चले जाते है वो आदमखोर बन जाते है। वो उस प्रयोगशाला से इन सभी को मार कर भाग जाते है। अब वो आदमखोर जहां भी जाते है। वहाँ-वहाँ वो मानव जाति का सर्वनाश करते है उनको खा जाते है। अब वो जंगल मे रहते है जहाँ रहते है वहाँ आस-पास वो मानव जाति को खत्म कर देते है। अब कोई भी शख्स गलती से रास्ता भूल कर उनकी बस्ती की तरफ चल जाता है तो उस इंसान का खात्मा वो बड़ी बेहरमी से कर देते है जैसे कुल्हाड़ी, दरातसे काट देना जैसे लकड़ी को काटा हो। उस फिल्म को देख कर जो मेरी समीक्षा बनी वो ये थी की वो सभी आदमखोर मानवता के लिए इतना बड़ा खतरा नही है न वो बड़े दोषी है। लेकिन वो आदमखोर बन चुके है तो उनका इलाजजरूरी है। लेकिनसबसे बड़ा खतरा वो डॉ या वज्ञानिक है जिन्होंने अपने फायदे के लिए साधारण इंसानो को आदमखोर बनाया। उनका खात्मा सबसे ज्यादा जरूरी है ताकि नए आदमखोर पैदा होने से समाज को बचाजा सके। हमें इन्हें देखकर निराश नहीं होना है। उम्मीद अब भी बची हुई है, हम ये सब रोक सकते हैं। वक्त रहते कुछ लिख-पढ़ लें, अपनी सोच का दायरा बढ़ा लें, लोगों से बात करें, तोइस पागलपन को हम आसानी से रोक देंगे।



राजसमंद की इस घटना को टाला जा सकता थाअगर समय रहते ऐसे आदमखोर की पहचान हो जाती तो उसका समय पर इलाज करवाया जा सकता था। इसलिए आज आप अपने आस-पास ऐसे धार्मिक आंतकवादियो की पहचान कीजिये जो साधारण इंसानो को धर्म के नाम पर वहसी जानवर बना रहे है, मानव बम बना रहे है। ऐसे आतंकवादियों को जितना जल्दी खदेड़ दोगे आप खुद को और मानव जाति के वर्तमान व भविष्य को सुरक्षित बना पाओगे। मानवता के लिए आज सबसे बड़ा दुश्मन साम्रज्यवाद, उसके दलाल धार्मिक आंतकवादी औरये आदमखोर जानवर है। मानव सभ्यता बचाने औऱ मानव मुक्ति के लिए मेहनतकश आवाम का पहला काम इन तीनों ताकतों का सफाया करना जरूरी है।
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