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Wednesday, 27 December 2017

भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद : संजय झोटे


भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा. कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है. इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदि को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और ”विल” को अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिकों की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये. कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पाई. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.


कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा ऊँचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद-वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नई बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए.

इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है.

भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता. यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है.

भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुड़ी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

~~~

संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

Thursday, 9 November 2017

ब्राह्मण न तो हिन्दू है न भारतीय ,वैज्ञानिक खोजो ने किया खुलासा

जन उदय : वैसे तो जब से यह दुनिया बनी है तब से मानव सवभाव लालची ही रहा है और मानव अपने अपनों के लिए उनके फायदे के लिए ही काम करता है लेकिन सभ्यता के बढ़ते चरणों में जब देश समाज आता है तो हर इंसान देश को और देश की जनता को सर्वोपरी रखते है और वैसे भी जो लोग देश के नहीं होते वे लोग देशद्रोही कहलाते है . इस तरह के लोग हर देश में होते है और उनका इतिहास भी होता है भारत में ऐसे ही एक जाति है जिसे ब्राह्मण कहते ही 

ब्राह्मणों का इतिहास . 

ब्राह्मणों के अनुसार ये लोग किसी भगवान् के मूह से पैदा हुए है और उस भगवान् ने इन्हें सर्वोच्च स्थान दिया है , भगवान् ने सिर्फ इन्हें ही पढने का धिकार दिया इन्हें यह भी अधिकार दिए कि ये किसी भी स्त्री का बलात्कार कर सकते है , किसी भी दुसरे समुदाय के लोगो की स्मप्प्ती छीन सकते है क्योकि ऐसा इन्हें भगवान् ने कहा है ... अगर कोई सामान्य अक्ल का व्यक्ति इनकी इन बातो को सुने तो या तो हंस पढ़ेगा या इन्हें मुर्ख मानते हुए चला जाएगा , लेकिन कमाल की बात यह है की ये लोग इस बात पर अडिग है की ये लोग महान है सबसे बड़ी बात ये लोग इस जाति के आधार पर सबसे घृणा करते है और ऐसा वही लोग कर सकते है जो लोग उस समाज और देश के निवासी नहीं होते 

ब्राह्मणों के इतिहास में यह साफ़ साफ़ पता चलता है कि ये लोग यूरोप , इटली , जर्मन से भारत की और घुमन्तु जाति के रूप ,में आये थे और यहाँ के मूल निवासिओ की दया पर यहाँ रहने लगे बदले में इन्होने यहाँ के मूलनिवासी लोगो को अपनी बेतिया गिफ्ट दी और इनसे पैदा हुए लोग इंडो – आर्यन लोग कहलाये आर्य यानी ब्राह्मण विदेशी है इस बात के सारे वैज्ञानिक प्रमाण है और मिले है 

इन लोगो ने यहाँ के लोगो से जो दुश्मनी की है वह शायद मानव सभ्यता में कही भी नहीं मिलेगी यानी कुल मिला कर ये लोग एक आतंकवादी दस्ते के रूप में काम करते है 


री दुनिया में हम जिस आतंकवाद को जानते है वह है हिंसक आतंकवाद यानी इसमें या इसके मानने वाले सिर्फ हिंसा में विशवास रखते है यानी अल कायदा , आर एस एस , आइसिस ,लिट्टे जैसे संघठन इसमें आते है , दूसरा होता है सांस्कृतिक आतंकवाद जो दुनिया में सिर्फ आर एस एस चलाता है इसके पूरी दुनिया में बहुत सारे सन्घठन है जो लोगो को गुमराह करके अपनी संस्क्रती की और खींचते है और उन्हें अपने समाज और संस्क्रती की सच्चाई से दूर रखते है , आर एस एस के सन्घठन , अमरीका , यूरोप , कनाडा ,एशिया सभी देश में ये लोग काम करते है इसके कुछ मुख्या एजेंट है ब्रहम कुमारी , पतंजलि , आर्ट ऑफ़ लिविंग , विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल आदि 

तीसरा है राजननीतिक आतंकवाद इसमें अमरीका रूस , चीन , कोरिया इसराइल आदि मुख्य देश है जो पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए इन देशे में तरह तरह के आन्दोलन चलवाते है , इन देशो की अर्थ वाव्य्स्था पर कब्जा जमाते है और इन् देशो को वैसा ही चलाने की कोशिस करते है जैसा ये चाहते है 

भारत में एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रान्तियो के बारे में यानी रामायण और महाभारत कभी इस देश में हुए या नहीं या ये सिर्फ कोरी कल्पना है , इतिहास ने भी विज्ञान के नियमो को अपनाया है और इतिहास 
का लेखन वास्तुनिष्ट सामग्री पर लेखन के लिए ही जो डाला गया है , और जब हम वास्तुनिष्ट सबूतों या सामग्री की बात करते है तो उस पर रामायण और महाभारत खरी नहीं उतरती , आइये देखे कैसे 

कहानी रामयाण और महाभारत एक एपिक की तरह लिखे गए ज्सिका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक राजनितिक षड्यंत्र तय्यार करना था जिसका पहला उधाह्र्ण है 

1.कोई भी वास्तु /शिल्प सबूत नहीं : हर राजा , महाराजा , अपने लिए महल बनवाता है , भवन बनवाता है , बाग़ बगीचे बनवाता है और इन इमारतो को वह कुछ ख़ास तरीके से बनवाता है यानी हम अगर सम्राट अशोक का इतिहास देखे तो हमें सभी प्रकार के सबूत मिलते है वास्तु भी शिल्प भी लेकिन रामायण और महाभारत के इन अभिनेताओं का कुछ भी नहीं मिलता , कुछ संघटनो का कहना है की मंदिर मिले है भगवान् के तो कोई इनसे पूछे क्या भगवान् इन्हों मंदिरों से शासन करते थे ?? 

2 . हर शासक , राजा , महाराजा अपने शासन काल में अपने सिक्के यानी व्यापार के लिए सिक्के ,मुद्रा चलवाता है , जो निश्चित तोर पर उसकी सीमा और विदेश सीमा यानी उसके शासन के बाहर भी खुदाई में मिलते है लेकिन रामायण , महाभारत काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता 

३. विदेशो से सम्बन्ध एक राजा के लिए बड़े जरूरी होते है , युद्ध भी होते है संधिया भी होती है लेकिन इन दोनों काल के यानी रामायण और महाभारत काल का ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिलता 

४. विदेशो से व्यापार , यात्रिओ के लिए धर्मशाला , सुरक्षा वाव्य्स्था बाग़ बगीचे , सराय ये सब भी रहा बनवाता है लेकिन इन दोनों काल का कुछ भी नहीं मिलता 

५. संस्कृति – कला ,किसी भी इतिहास में या शासन में अपनी कला और संस्कृति जन्म लेती है , लेखक ,कवी आदि जन्म लेते है लेकिन न तो किताबो के स्तर पर कुछ भी नहीं मिलता , शिल्प , पेंटिंग , नक्काशी , वाल राइटिंग, वाल कार्विंग , भित्ति चित्र आदि इस काल का कुछ भी नहीं मिलता 

६. कालखंड . सबसे बड़ी बात होती है कि कोई भी घटना किसी कालखंड में ही होती है यानी उसका अपना एक समय होता है लेकिन इन ग्रंथो का कोई भी कालखंड नहीं है कहने को तो हर धार्मिक संघठन अपनी अपनी दलील देता रहता है , कोई कुछ काल बताता है तो कोई कुछ 

इसके अलावा जो ग्रन्थ या किताबे मिली है उनकी भी कार्बन डेटिंग से कोई सबूत नहीं मिलता की ये ग्रन्थ बहुत पुराने है बल्कि इसमें भी घपला है .. 
सो विज्ञान धारणा या कल्पना से शुरू हो सकता है लेकिन हमने उड़ने की कल्पना की लेकिन उड़े कैसे ? इसलिए विज्ञानिक कोई भी तत्थ्य आज तक नहीं है और न ही आयगा 

इतिहास बदला समय बदला लेकिन ये लोग नहीं बदले ये लोग आज भी इस वैज्ञानिक युग में अपना जातीय आतंक फैलाने पर तुले है 

Thursday, 18 May 2017

बदनाम कर रहा ही ब्राह्मणवादी मीडिया भीम आर्मी को : कातिलो की जगह ,पीडितो को जेल में बंद कर रही है

बदनाम कर रहा ही ब्राह्मणवादी मीडिया भीम आर्मी को : कातिलो की जगह ,पीडितो को जेल में बंद  कर रही है  
जन उदय : सहारनपुर में ठाकुरों ने दलितों की बस्ती में हुड-दंग किया या के युवाओं की महिलाओं की बुजुर्गो की पिटाई की , इसके बदले में पुलिस ने अपनी जातिवादी मानसिकता के चलते ठाकुरों पर कोई कारवाही नहीं की डी एम् भी चुप रहा इसी बीच वीर बहादुर ठाकुरों ने २० से जयादा निहत्थे चमारो को तलवारों से घायल कर दिया . लेकिन फिर भी पुलिस वालो ने कोई कार्यवाही नहीं की इस पर चमारो ने पुलिस की गाडिया जला दी और चौकी को आग लगा दी .

इसके बाद पुलिस और प्रशासन मीडिया में इस तरह की गलत बयानबाजी कर रहा है की सारी फसाद की जड़ भीम आर्मी है



कमाल की बाते देखो :

१.     पुलिस प्रशासन यानी एस एस पी दुबे और डी एम् नरेंदर सिंह , जो ठाकुर है ने ठाकुरों को दंगा करने से नहीं रोका , पुलिस के होते हुए भी मौके पर पुलिस नहीं भेजी
२.     दंगाई ठाकुरों के खिलाफ जिन्होंने निर्दोष बच्चे , बुजुर्गो को तलवारों से मारो उनके खिलाफ कार्यवाही नहीं की
३.     जब भीम आर्मी ने इनके खिलाफ मामला दर्ज करने के लिए पुलिस पर दबाव डाला तो इनके ही खिलाफ मुकदमा बना दिया
४.     पुलिस कहती है की भीम आर्मी ने अपना ग्रेट चमार का बोर्ड लगा रखा है जिससे ठाकुरों को ऐतराज है .. तो कोई इनसे पूछे क्या बोर्ड लागना अपराध है ?? और इस बोर्ड से ठाकुरों को क्या जलन है ?? यानी हमेशा डरे , इनको सलाम ठोके तो सही वर्ना उपद्रवी ?? या इन लोगो के नाम से सब कुछ हो
५.     इतनी घटना के बाद मीडिया ने सही ढंग से रिपोर्टिंग नहीं की
६.     मीडिया पर सरकार ने दबाव डाला खबर न दिखाए
७.     दंगाईओ के लिए प्रशासन की तरफ से हथियारों की सुविधा मिली
८.     घायल चमारो को इलाज तक नहीं होने दिया जा रहा

अब कोई बताये क्या अपनी रक्षा करना अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना अपराध है ??
इन्ही ठाकुरों ने जब ये लोग बाबा साहेब की मूर्ति लगा रहे थे तो मूर्ति नहीं लगने दी इन लोगो ने सरेआम गुंडागर्दी की जब भी जातिवादी मानसिकता के पुलिस प्रशासन ने ठाकुरों की मदद की .

इन्ही चमारो को मुसलमानों से लड़वाने के लिए आर एस एस नाम के आतंकवादी संघठन ने २० अप्रैल को कोशिस की कमाल की बात ये है जब इनको डर लगता है तब ये लोग चमार भंगी को हिन्दू हिन्दू कहने लग जाते है . वर्ना इसके बाद इन्हें अछूत बना कर हमला करते है भेदभाव करते है . सहारनपुर उत्तर प्रदेश या गुजरात या अन्य स्थानों पर यह रोज होता है लेकिन तब कोई आगे नहीं आता

सहारनपुर में भीम आर्मी के लोगो ने जो किया यह बात पुरे देश के दलित समाज को काफी प्रेरित कर रही है , और लाखो करोडो लोग भीम आर्मी में जाना चाहते है . इनका मानना है की आर एस एस जैसे संघठनो और अन्य ठाकुर बनिए ब्राह्मणों की जातीय गुंडागर्दी रोकने में कामयाब होगा और इस देश पर फिर से मूलनिवासियो का वर्चस्व होगा और पुरे देश में फैली अमानिविय प्रथाए खत्म होंगी



Bhim army , the great Chamar , RSS , Caste system ,caste atrocity in India , RSS, terrorism in India

पहले यु पी चुनाव में इस्तेमाल ई वी एम् की जांच करवाए: हैकिंग प्रतियोगिता बाद में करवाए चुनाव आयोग


जन उदय : आल पार्टी मीटिंग के बाद चुनाव आयोग ने प्रतियोगिता का ऐलान कर दिया है की कोई भी आ कर ई वी एम् मशीन हैक करके दिखाए , लेकिन यह नहीं बताया की अगर ई वी एम् हैक हो गई तो उसके बदले कार्यवाही क्या होगी ??/ क्या उत्तर प्रदेश और पंजाब के रिजल्ट को रद्द कर दिया जाएगा ??

इसके अलावा चुनाव आयोग इस प्रतियोगिता के जरिये देश का ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा अहि यानी यु पी में हुए चुनाव में जो गड़बड़ी हुई उसको दबाने की कोशिस कर रहा है जबकि मुद्दा यही है की उत्तर प्रदेश में चुनाव में जो ई वी एम् इस्तेमाल हुई उनमे काफी गड़बड़ी थी



और एक तरह से यह चुनाव पूरा बेइमानी के आधार पर भाजपा जीती .
ई वी एम् हैक होगी या नहीं या इसके बाद क्या होगा यह एक पूरा सरकार द्वारा प्रायोजित ड्रामा चल रहा है

जबकि असली मुद्दा उन मशीनों की जांच का है जो यु पी चुनाव में इस्तेमाल हुई

ये है हमारे समाज की सोच जो महिला को प्रॉपर्टी समझते है - उदय चे


अभी 2 दिन पहले रोहतक में एक लड़की के साथ जो जघन्य सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उसकी निर्ममता से जो हत्या हुई। उसकी जैसे-जैसे परते खुल रही है वो बहुत ही भयानक है। क्योंकि बलात्कारी और हत्यारे कोई और नही उस लड़की का पुराना प्रेमी और प्रेमी के दोस्त ही है जिन्होंने उसको सोनीपत से जबर्दस्ती गाड़ी में अपरहण किया। उसके बाद लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार फिर उसकी निर्ममता से हत्याकी। उसके प्रत्येक अंग को बुरी तरह से कुचल दिया। उसके बाद उसकी देह को झाड़ियों में फेंक दिया। जहाँ उसको कुते खाते रहे। अख़बार के अनुसार लड़की को ईंट से बुरी तरह मारा गया, उसको गाड़ी से भी कुचला गया, उसके गुप्तांग में लोहे की छड़ घुसेड़ दी गयी। ये अमानवीयता की हद है।

अब वो लड़का कहता है कि मै उस लड़की से बहुत प्यार करता था। मैं उससे शादी करना चाहता था। लेकिन लड़की ने शादी से जब मना कर दिया तो मैने ये सब किया।

क्या प्यार की आखिरी मंजिल शादी है।

अगर किसी कारण से शादी न हो तो आप उसको मार दोगे? आप उससे सामूहिक बलात्कार करोगे? आप उस पर तेजाब डाल दोगे? अगर प्यार की आखिरी मंजिल तुम्हारी नजर में शादीहै तो तुम उससे प्यार नही कर रहे हो तुम उस पर कब्जा करना चाहते हो, उसको गुलाम बनाना चाहते हो।

ये तुम्हारी एकाधिकार की सोच है। वो किससे बात करे, कहाँ बैठे, कहाँ जाये, क्या खाएं, क्या पहनेये सब आप तय करना चाहते हो। अगर वो आपकी गुलामी का विरोध करे, आपके एकाधिकार का विरोध करे तो आप उसको सजा दोगे। जैसे लड़की अपने बाप के एकाधिकार का विरोध जब करती है, अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहती है तो उसका रूढ़िवादी बाप उस पर हमला करता है। उसकी जान भी ले लेता है। वैसे ही तुम भी उस पर हमला करते हो। तुम उसकी योनि पर, उसकी छाती पर, उसके चेहरे पर हमला करते हो क्योकि तुमको लगता है कि ये सिर्फ तुम्हारे लिए है।
लड़की ने प्यार करने की गलती क्या की अब उसका अपनेशरीर पर और अपने दिमाक पर कोई अधिकार नही है? अगर वो अपनी जिंदगी के फैंसले खुद लेगी तो उसको इसकी सजा कभी बाप की तरफ से तो कभी प्रेमी की तरफ से मिलेगी?

तुम्हारी नजर मेंप्यार का मतलब हैकी वो सिर्फ तुम्हारे लिए बनी है, उस पर सिर्फ तुम्हारा हक है। तुमको वो अच्छी लगती है। तुमको उसका चेहरा देखे बिना नींद नही आती है। तुम्हारी नजर में वो चेहरा दुनिया में तुम्हारे लिए सबसे बेहतरीन चेहरा है। लेकिन उस बेहतरीन जिस्म को, चेहरे को जब तुम हासिल नही कर पाते हो या वो तुमसे दूर जाता है तो तुम उस जिस्म को चाकू से खोद देते हो, चेहरे को तुम तेजाब से जला देते हो। उसके गुप्तांग में लोहे की छड़ डाल देते हो। ऐसा कैसे कर लेते हो तुम, कोई भी अपनी सबसे प्यारी वस्तु को ऐसे कैसे नष्टकर सकता है। इसका मतलब तुम प्यार नही करते थे। ये तुम्हारी सनक थी। जब आपप्यार में होते हो तो एक दूसरे के किये चाँद तारे तोड़ने की बात करते हो। लेकिन लड़की ने एक इंकार क्या किया आपने चाँद तारो की जगह लड़की के शरीर को ही ईंटो से तोड़ दिया। गाड़ी से कुचल दिया।

जिसने आपको अपनी योनि से चर्म सुख की अनुभूति करवाई। तुमने उसकी योनि को लोहे की छड़ से खोद दिया। क्या किसी लड़की का इंकार इतना भयंकर हैउस लड़की के लिए।


लेकिन फिर ये प्यार नही था तो क्या था। ये सिर्फ वासना थी, ये सनकीपन थाएकाधिकार करने के लिए। ये कोई पहली घटना तो है नही, देश में भी और खासकर उतर भारत में ये घटनाएं होती रहती है। हरियाणा, दिल्ली, उतर प्रदेश तो इन घटनाओं के लिए चर्चित है। प्यार में धोखा खाये आशिक ने मारा चाकू, चेहरे पर डाला तेजाब, गल घोट कर की हत्या आदि ये खबर आती रहती है।
अब सवाल ये है कि अगर मामूली सा भी लड़के को उस लड़की से कभी प्यार होता तो वो बलात्कार तो दूर की बात है उसकी मर्जी के बिना उसको छूता भी नही। हत्या करना तो दूर उसको खरोंच भी नही आने देता। क्या कोई सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ ऐसा करेगा। चाहे एक तरफा ही प्यार क्यों न हो।वो ऐसा कभी भी नही करेगा। अगर कोई भी सिरफिरा प्रेमी ऐसा करने की सोचता है तो वो मानसिक बीमार है। उसको अपना इलाज किसी अच्छे दिमाकी डॉ से करवाना चाहिए।


लेकिन ऐसी घटनाएं दिनों दिन बढ़ रही है। इसके पीछे कारण क्या है।
सबसे बड़ा बुनियादी कारण है पुरुषवादी सोच जो महिला को दोयम दर्जे का मानती है। जो मानती है कि महिला पुरुषसे कमजोरहै, महिला का रक्षक पुरुष होता है, महिला को पतिव्रता होना चाहिए, महिला को पुरूष की सत्ता के अधीन रहना चाहिए। महिला को घर में चुल्ले-चोके तक सीमित रहना चाहिये। बाहर निकलेगी तो ये घटनाएं तो होगी ही। पिछले दिनों राष्ट्रीय पार्टी के एक नेता ने ब्यान दिया था कि गाड़ी बाजार में आएगी तो एक्सीडेंट तो होगा ही। इसलिए महिला को अंदर रहना चाहिए।

हरियाणा में एक जोक चलता है कि-
"महिलाएं शादी के बाद सिंदूर क्यों लगाती है।
वो सिंदूर इसलिए लगाती है ताकि नये लड़को को पता चल जाये की इस प्लाट की रजिस्ट्री हो चुकी है। वो किसी दूसरे प्लाट की खोज करे।"
ये है हमारे समाज की सोच जो महिला को प्रॉपर्टी समझते है।
भारतीय सिनेमा भी ऐसी फिल्मों से भरा पड़ा है कभी सनी देओल की "जीत" फिल्म देखना जब हीरोइन करिश्मा कपूर कहती है कि अगर हमारी शादी न हो सकी तो, हीरो सनी कहता है पुरे गुस्से में"काजल तुम सिर्फ मेरी हो, सिर्फ मेरी, तुम अगर किसी और की हुई तो लाशें बिछा दूंगा लाशें।" क्यों भई तुमने इसे खरीद लिया है? ये तेरी गुलाम है?
जिस माँ ने इसको 9 महीने पेट में रखा। बड़ी मुसीबतों से पैदा किया, माँ-बाप ने इसको 20 साल पाला इस पर अधिकार जब उसका भी नही है तो तेरा कैसे हो सकता है। 2 दिन के प्यार के चक्कर में तुम इसको गुलाम बनाना चाहते हो? गुलाम न बनी तो तेजाब डालोगे, उससे रेप करोगे, उसके गुप्तांग फाड़ोगे, उसकी जान लोगे? हद है सनक की भी.....

"जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है!"ओशो

प्यार का मतलब तो हम जिससे प्यार करते है हमारे कारण उसके आँख में पानी का एक कतरा भी कैसे आ जाये, उसकी खुशी में हमारी ख़ुशी है, उसकी आजादी में हमारी आजादी है। प्यारकिसी भी बंधन का नाम नही है। बलिदान और त्याग का दूसरा नाम ही प्यार है।एक दूसरे के विचार, भावनाओ, आजादी की कद्र करना प्यार है। जब तक साथ है तब तक साथ है किसी भी कारण से अलगहुए तो भी पूरी उम्र उससे प्यार रहता है। जरूरी नही है कि शादी हो वो अच्छे दोस्त पूरी उम्र रह सकते है। वो क्या खायेगी, क्या पीयेगी, कहाँ घूमेगी, किसके साथ सोएगी वो उसका निजी मामला है। उसकी आजादी है। आपको पसन्द नही है तो आप उसको छोड़ सकते है। लेकिन बेवफाई का रोना रो कर के उस पर हमला करना कदापि उचित नही है ये सीधा-सीधा आधी आबादी पर हमला है।

"प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न हाटि बिकाइ"कबीर
प्रेम न किसी खेत में पैदा होता है और न ही किसी बाजार में बिकता है।

इस समस्या का समाधान क्याहो-
इस पर समाज में 2 रॉय है।
पहली रॉय के लोगो में कुछ जो महिलाओं को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ज्यादा मानते है। वो सवाल उठाते हैं कि महिला किसी से प्यार करे ही क्यों, महिला ऐसे वैसे कपड़े पहने ही क्यों, महिला घर से बाहर निकले ही क्यों। कुछ का मानना होता है किबलात्कारियों को फांसी होनी चाहिए, उनका लिंग काट लेना चाहिए, उनके हाथ-पांव काट देने चाहिए, जनता के सामने उनको मारा जाये। कुछ ऐसे भी है कि जो मानते है कि लड़कियां प्यार में धोखा देगी तो ऐसा होता ही है। लेकिन ये सभी रॉय बेकार है क्योंकि बलात्कार की घटनाएं 1 साल की बच्ची से 80 साल की बुजर्ग महिला से हो रही है। घर, खेत, ऑफिसों में हो रही है। फांसी या दूसरी तीसरी सजाओ से भी रोकना नामुमकिन है क्योंकि ये घटना जब घट रही थी उसीसमय सुप्रीम कोर्ट निर्भया के बलात्कारियों को फांसी की सजा सुना रहा था। फिर भी ये घटना होती है। गुड़गांवमें चलती गाड़ी में एक लड़की से सामूहिक बलात्कार भी उसी समय होता है। पुरे देश को तो छोड़ ही दीजिये कितनी घटनाएं हुई होंगी।

लेकिन जो प्रगतिशील, बुद्विजीवी, कम्युनिस्ट है उनका मानना है कि बलात्कार को कड़ी सजा देने से या कड़े कानून बनाने से नही रोका जा सकता है। अगर बलात्कार को रोकना है तो सबसेपहले गैर बराबरी पर आधारति समाज को खत्म करना पड़ेगा। महिला को उपभोग की वस्तु न मानकरइंसान मानना पड़ेगा, महिला को सेक्स डोल मानना बन्द करना पड़ेगा, सेक्स एजुकेशन सबको देनी पड़ेगी। महिलाओं को चुल्ले-चोके से निकाल कर आर्थिक आजादी देनी पड़ेगी, काम का बंटवारा मेल-फीमेल में जो है उसको खत्म करना पड़ेगा। लड़के-लड़की की परवरिस भी मेल-फीमेल के अनुसार न करके बराबरी पर करनी पड़ेगी। लड़कियों को भी इस काल्पनिक प्यार के चक्कर से बचनाहोगा व् उनको बचना होगा पूँजीवाद द्वारा बनाई जा रही उपभोग की वस्तु बनने से उनको बराबरी के लिए चल रही इस लड़ाई की अगुहाई करनी पड़ेगी।

सच्चा प्यार तब स्थापित होगा जब औरत और पुरुष के बीच वास्तविक बराबरी आएगी। जब औरतों को मात्र एक सेक्स ऑब्जेक्ट न मानक़र इंसान के रूप में स्वीकारा जाएगाऔर जब सच्चा प्यार स्थापित होगा तो नफरत व् हिंसा के लिए कोई जगह नहीं रह जायेगी। तब कोई निर्भया बलात्कार का शिकार नहीं होगी। हमें महिला पुरुष बराबरी के लिए काम करना होगा। इस दुनिया को बेहतर और खूबसूरत बनाने के लिए काम करना होगा। हमको समतामूलक समाज बनाने के लिए लड़ना होगा।


अभी 2 दिन पहले रोहतक में एक लड़की के साथ जो जघन्य सामूहिक बलात्कार और उसके बाद उसकी निर्ममता से जो हत्या हुई। उसकी जैसे-जैसे परते खुल रही है वो बहुत ही भयानक है। क्योंकि बलात्कारी और हत्यारे कोई और नही उस लड़की का पुराना प्रेमी और प्रेमी के दोस्त ही है जिन्होंने उसको सोनीपत से जबर्दस्ती गाड़ी में अपरहण किया। उसके बाद लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार फिर उसकी निर्ममता से हत्याकी। उसके प्रत्येक अंग को बुरी तरह से कुचल दिया। उसके बाद उसकी देह को झाड़ियों में फेंक दिया। जहाँ उसको कुते खाते रहे। अख़बार के अनुसार लड़की को ईंट से बुरी तरह मारा गया, उसको गाड़ी से भी कुचला गया, उसके गुप्तांग में लोहे की छड़ घुसेड़ दी गयी। ये अमानवीयता की हद है।

अब वो लड़का कहता है कि मै उस लड़की से बहुत प्यार करता था। मैं उससे शादी करना चाहता था। लेकिन लड़की ने शादी से जब मना कर दिया तो मैने ये सब किया।

क्या प्यार की आखिरी मंजिल शादी है।

अगर किसी कारण से शादी न हो तो आप उसको मार दोगे? आप उससे सामूहिक बलात्कार करोगे? आप उस पर तेजाब डाल दोगे? अगर प्यार की आखिरी मंजिल तुम्हारी नजर में शादीहै तो तुम उससे प्यार नही कर रहे हो तुम उस पर कब्जा करना चाहते हो, उसको गुलाम बनाना चाहते हो।

ये तुम्हारी एकाधिकार की सोच है। वो किससे बात करे, कहाँ बैठे, कहाँ जाये, क्या खाएं, क्या पहनेये सब आप तय करना चाहते हो। अगर वो आपकी गुलामी का विरोध करे, आपके एकाधिकार का विरोध करे तो आप उसको सजा दोगे। जैसे लड़की अपने बाप के एकाधिकार का विरोध जब करती है, अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहती है तो उसका रूढ़िवादी बाप उस पर हमला करता है। उसकी जान भी ले लेता है। वैसे ही तुम भी उस पर हमला करते हो। तुम उसकी योनि पर, उसकी छाती पर, उसके चेहरे पर हमला करते हो क्योकि तुमको लगता है कि ये सिर्फ तुम्हारे लिए है।
लड़की ने प्यार करने की गलती क्या की अब उसका अपनेशरीर पर और अपने दिमाक पर कोई अधिकार नही है? अगर वो अपनी जिंदगी के फैंसले खुद लेगी तो उसको इसकी सजा कभी बाप की तरफ से तो कभी प्रेमी की तरफ से मिलेगी?

तुम्हारी नजर मेंप्यार का मतलब हैकी वो सिर्फ तुम्हारे लिए बनी है, उस पर सिर्फ तुम्हारा हक है। तुमको वो अच्छी लगती है। तुमको उसका चेहरा देखे बिना नींद नही आती है। तुम्हारी नजर में वो चेहरा दुनिया में तुम्हारे लिए सबसे बेहतरीन चेहरा है। लेकिन उस बेहतरीन जिस्म को, चेहरे को जब तुम हासिल नही कर पाते हो या वो तुमसे दूर जाता है तो तुम उस जिस्म को चाकू से खोद देते हो, चेहरे को तुम तेजाब से जला देते हो। उसके गुप्तांग में लोहे की छड़ डाल देते हो। ऐसा कैसे कर लेते हो तुम, कोई भी अपनी सबसे प्यारी वस्तु को ऐसे कैसे नष्टकर सकता है। इसका मतलब तुम प्यार नही करते थे। ये तुम्हारी सनक थी। जब आपप्यार में होते हो तो एक दूसरे के किये चाँद तारे तोड़ने की बात करते हो। लेकिन लड़की ने एक इंकार क्या किया आपने चाँद तारो की जगह लड़की के शरीर को ही ईंटो से तोड़ दिया। गाड़ी से कुचल दिया।

जिसने आपको अपनी योनि से चर्म सुख की अनुभूति करवाई। तुमने उसकी योनि को लोहे की छड़ से खोद दिया। क्या किसी लड़की का इंकार इतना भयंकर हैउस लड़की के लिए।

लेकिन फिर ये प्यार नही था तो क्या था। ये सिर्फ वासना थी, ये सनकीपन थाएकाधिकार करने के लिए। ये कोई पहली घटना तो है नही, देश में भी और खासकर उतर भारत में ये घटनाएं होती रहती है। हरियाणा, दिल्ली, उतर प्रदेश तो इन घटनाओं के लिए चर्चित है। प्यार में धोखा खाये आशिक ने मारा चाकू, चेहरे पर डाला तेजाब, गल घोट कर की हत्या आदि ये खबर आती रहती है।
अब सवाल ये है कि अगर मामूली सा भी लड़के को उस लड़की से कभी प्यार होता तो वो बलात्कार तो दूर की बात है उसकी मर्जी के बिना उसको छूता भी नही। हत्या करना तो दूर उसको खरोंच भी नही आने देता। क्या कोई सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ ऐसा करेगा। चाहे एक तरफा ही प्यार क्यों न हो।वो ऐसा कभी भी नही करेगा। अगर कोई भी सिरफिरा प्रेमी ऐसा करने की सोचता है तो वो मानसिक बीमार है। उसको अपना इलाज किसी अच्छे दिमाकी डॉ से करवाना चाहिए।

लेकिन ऐसी घटनाएं दिनों दिन बढ़ रही है। इसके पीछे कारण क्या है।
सबसे बड़ा बुनियादी कारण है पुरुषवादी सोच जो महिला को दोयम दर्जे का मानती है। जो मानती है कि महिला पुरुषसे कमजोरहै, महिला का रक्षक पुरुष होता है, महिला को पतिव्रता होना चाहिए, महिला को पुरूष की सत्ता के अधीन रहना चाहिए। महिला को घर में चुल्ले-चोके तक सीमित रहना चाहिये। बाहर निकलेगी तो ये घटनाएं तो होगी ही। पिछले दिनों राष्ट्रीय पार्टी के एक नेता ने ब्यान दिया था कि गाड़ी बाजार में आएगी तो एक्सीडेंट तो होगा ही। इसलिए महिला को अंदर रहना चाहिए।

हरियाणा में एक जोक चलता है कि-
"महिलाएं शादी के बाद सिंदूर क्यों लगाती है।
वो सिंदूर इसलिए लगाती है ताकि नये लड़को को पता चल जाये की इस प्लाट की रजिस्ट्री हो चुकी है। वो किसी दूसरे प्लाट की खोज करे।"
ये है हमारे समाज की सोच जो महिला को प्रॉपर्टी समझते है।
भारतीय सिनेमा भी ऐसी फिल्मों से भरा पड़ा है कभी सनी देओल की "जीत" फिल्म देखना जब हीरोइन करिश्मा कपूर कहती है कि अगर हमारी शादी न हो सकी तो, हीरो सनी कहता है पुरे गुस्से में"काजल तुम सिर्फ मेरी हो, सिर्फ मेरी, तुम अगर किसी और की हुई तो लाशें बिछा दूंगा लाशें।" क्यों भई तुमने इसे खरीद लिया है? ये तेरी गुलाम है?
जिस माँ ने इसको 9 महीने पेट में रखा। बड़ी मुसीबतों से पैदा किया, माँ-बाप ने इसको 20 साल पाला इस पर अधिकार जब उसका भी नही है तो तेरा कैसे हो सकता है। 2 दिन के प्यार के चक्कर में तुम इसको गुलाम बनाना चाहते हो? गुलाम न बनी तो तेजाब डालोगे, उससे रेप करोगे, उसके गुप्तांग फाड़ोगे, उसकी जान लोगे? हद है सनक की भी.....

"जो प्रेम घृणा बन सकता है, वह प्रेम नहीं है!"ओशो

प्यार का मतलब तो हम जिससे प्यार करते है हमारे कारण उसके आँख में पानी का एक कतरा भी कैसे आ जाये, उसकी खुशी में हमारी ख़ुशी है, उसकी आजादी में हमारी आजादी है। प्यारकिसी भी बंधन का नाम नही है। बलिदान और त्याग का दूसरा नाम ही प्यार है।एक दूसरे के विचार, भावनाओ, आजादी की कद्र करना प्यार है। जब तक साथ है तब तक साथ है किसी भी कारण से अलगहुए तो भी पूरी उम्र उससे प्यार रहता है। जरूरी नही है कि शादी हो वो अच्छे दोस्त पूरी उम्र रह सकते है। वो क्या खायेगी, क्या पीयेगी, कहाँ घूमेगी, किसके साथ सोएगी वो उसका निजी मामला है। उसकी आजादी है। आपको पसन्द नही है तो आप उसको छोड़ सकते है। लेकिन बेवफाई का रोना रो कर के उस पर हमला करना कदापि उचित नही है ये सीधा-सीधा आधी आबादी पर हमला है।

"प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न हाटि बिकाइ"कबीर
प्रेम न किसी खेत में पैदा होता है और न ही किसी बाजार में बिकता है।

इस समस्या का समाधान क्याहो-
इस पर समाज में 2 रॉय है।
पहली रॉय के लोगो में कुछ जो महिलाओं को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ज्यादा मानते है। वो सवाल उठाते हैं कि महिला किसी से प्यार करे ही क्यों, महिला ऐसे वैसे कपड़े पहने ही क्यों, महिला घर से बाहर निकले ही क्यों। कुछ का मानना होता है किबलात्कारियों को फांसी होनी चाहिए, उनका लिंग काट लेना चाहिए, उनके हाथ-पांव काट देने चाहिए, जनता के सामने उनको मारा जाये। कुछ ऐसे भी है कि जो मानते है कि लड़कियां प्यार में धोखा देगी तो ऐसा होता ही है। लेकिन ये सभी रॉय बेकार है क्योंकि बलात्कार की घटनाएं 1 साल की बच्ची से 80 साल की बुजर्ग महिला से हो रही है। घर, खेत, ऑफिसों में हो रही है। फांसी या दूसरी तीसरी सजाओ से भी रोकना नामुमकिन है क्योंकि ये घटना जब घट रही थी उसीसमय सुप्रीम कोर्ट निर्भया के बलात्कारियों को फांसी की सजा सुना रहा था। फिर भी ये घटना होती है। गुड़गांवमें चलती गाड़ी में एक लड़की से सामूहिक बलात्कार भी उसी समय होता है। पुरे देश को तो छोड़ ही दीजिये कितनी घटनाएं हुई होंगी।

लेकिन जो प्रगतिशील, बुद्विजीवी, कम्युनिस्ट है उनका मानना है कि बलात्कार को कड़ी सजा देने से या कड़े कानून बनाने से नही रोका जा सकता है। अगर बलात्कार को रोकना है तो सबसेपहले गैर बराबरी पर आधारति समाज को खत्म करना पड़ेगा। महिला को उपभोग की वस्तु न मानकरइंसान मानना पड़ेगा, महिला को सेक्स डोल मानना बन्द करना पड़ेगा, सेक्स एजुकेशन सबको देनी पड़ेगी। महिलाओं को चुल्ले-चोके से निकाल कर आर्थिक आजादी देनी पड़ेगी, काम का बंटवारा मेल-फीमेल में जो है उसको खत्म करना पड़ेगा। लड़के-लड़की की परवरिस भी मेल-फीमेल के अनुसार न करके बराबरी पर करनी पड़ेगी। लड़कियों को भी इस काल्पनिक प्यार के चक्कर से बचनाहोगा व् उनको बचना होगा पूँजीवाद द्वारा बनाई जा रही उपभोग की वस्तु बनने से उनको बराबरी के लिए चल रही इस लड़ाई की अगुहाई करनी पड़ेगी।

सच्चा प्यार तब स्थापित होगा जब औरत और पुरुष के बीच वास्तविक बराबरी आएगी। जब औरतों को मात्र एक सेक्स ऑब्जेक्ट न मानक़र इंसान के रूप में स्वीकारा जाएगाऔर जब सच्चा प्यार स्थापित होगा तो नफरत व् हिंसा के लिए कोई जगह नहीं रह जायेगी। तब कोई निर्भया बलात्कार का शिकार नहीं होगी। हमें महिला पुरुष बराबरी के लिए काम करना होगा। इस दुनिया को बेहतर और खूबसूरत बनाने के लिए काम करना होगा। हमको समतामूलक समाज बनाने के लिए लड़ना होगा।