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Saturday, 30 December 2017

भारत में नहीं थी जाति मेगास्थनीज़ की पुस्तक इंडिका से खुलासा :

 जन उदय : भारत में जातिवाद पूर्ण रूप से  ब्राह्मणों के षड्यंत्र के रूप में विकसित हुई  क्योकि इसका विवरण भारत के पोरानिक  इतिहास में कही नहीं मिलता  बल्कि  इसका  प्रमाण ब्राह्मण अपने ग्रंथो में जो दिखाते  है वह तकनिकी  और वैज्ञानिक  रूप से बोगस  है और झूट है  . अपने आपको  सर्व्श्रेस्थ और भगवान् का प्रतिनिधि बना कर पेश करना और सबसे ज्यादा अधिकार अपने पास रखना  और धार्मिक  ग्रंथो की रचना कर उनके माध्यम से अपने आपको   सभी लोगो पर अत्याचार करने का अधिकार खुद को ले लेना  ये सब  षड्यंत्र के रूप में ही सामने आये  इनके द्वारा लिखे गए रामायण , महाभारत झूठे और काल्पनिक  ग्रन्थ है

अब सवाल आता है भारत में एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रान्तियो के बारे में यानी रामायण और महाभारत कभी इस देश में हुए या नहीं या ये सिर्फ कोरी कल्पना है , इतिहास ने भी विज्ञान के नियमो को अपनाया है और इतिहास
का लेखन वास्तुनिष्ट सामग्री पर लेखन के लिए ही जो डाला गया है , और जब हम वास्तुनिष्ट सबूतों या सामग्री की बात करते है तो उस पर रामायण और महाभारत खरी नहीं उतरती , आइये देखे कैसे
कहानी रामयाण और महाभारत एक एपिक की तरह लिखे गए ज्सिका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक राजनितिक षड्यंत्र तय्यार करना था जिसका पहला उधाह्र्ण है


1.कोई भी वास्तु /शिल्प सबूत नहीं : हर राजा , महाराजा , अपने लिए महल बनवाता है , भवन बनवाता है , बाग़ बगीचे बनवाता है और इन इमारतो को वह कुछ ख़ास तरीके से बनवाता है यानी हम अगर सम्राट अशोक का इतिहास देखे तो हमें सभी प्रकार के सबूत मिलते है वास्तु भी शिल्प भी लेकिन रामायण और महाभारत के इन अभिनेताओं का कुछ भी नहीं मिलता , कुछ संघटनो का कहना है की मंदिर मिले है भगवान् के तो कोई इनसे पूछे क्या भगवान् इन्हों मंदिरों से शासन करते थे ??

2 . हर शासक , राजा , महाराजा अपने शासन काल में अपने सिक्के यानी व्यापार के लिए सिक्के ,मुद्रा चलवाता है , जो निश्चित तोर पर उसकी सीमा और विदेश सीमा यानी उसके शासन के बाहर भी खुदाई में मिलते है लेकिन रामायण , महाभारत काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता
३. विदेशो से सम्बन्ध एक राजा के लिए बड़े जरूरी होते है , युद्ध भी होते है संधिया भी होती है लेकिन इन दोनों काल के यानी रामायण और महाभारत काल का ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिलता
४. विदेशो से व्यापार , यात्रिओ के लिए धर्मशाला , सुरक्षा वाव्य्स्था बाग़ बगीचे , सराय ये सब भी रहा बनवाता है लेकिन इन दोनों काल का कुछ भी नहीं मिलता

५. संस्कृति – कला ,किसी भी इतिहास में या शासन में अपनी कला और संस्कृति जन्म लेती है , लेखक ,कवी आदि जन्म लेते है लेकिन न तो किताबो के स्तर पर कुछ भी नहीं मिलता , शिल्प , पेंटिंग , नक्काशी , वाल राइटिंग, वाल कार्विंग , भित्ति चित्र आदि इस काल का कुछ भी नहीं मिलता 

६. कालखंड . सबसे बड़ी बात होती है कि कोई भी घटना किसी कालखंड में ही होती है यानी उसका अपना एक समय होता है लेकिन इन ग्रंथो का कोई भी कालखंड नहीं है कहने को तो हर धार्मिक संघठन अपनी अपनी दलील देता रहता है , कोई कुछ काल बताता है तो कोई कुछ
इसके अलावा जो ग्रन्थ या किताबे मिली है उनकी भी कार्बन डेटिंग से कोई सबूत नहीं मिलता की ये ग्रन्थ बहुत पुराने है बल्कि इसमें भी घपला है
सो विज्ञान धारणा या कल्पना से शुरू हो सकता है लेकिन हमने उड़ने की कल्पना की लेकिन उड़े कैसे ? इसलिए विज्ञानिक कोई भी तत्थ्य आज तक नहीं है और न ही आयगा
खैर यहाँ पर बात चल रही है  जातिवाद की तो हम यहाँ पर किसी भारतीय ग्रन्थ के माध्यम से नहीं बल्कि एक विदेशी  सैलानी  मेगास्थिज़ के माध्यम से ही सम्झंगे की भारत में जातिवाद  या जाति का अस्तितिव  ही नहीं था
मेगस्थनीज (Megasthenes, 350 ईसापूर्व - 290 ईसा पूर्व) यूनान का एक राजदूत था जो चन्द्रगुप्त के दरबार में आया था। यूनानी सामंत सिल्यूकस भारत में फिर राज्यविस्तार की इच्छा से 305 ई. पू. भारत पर आक्रमण किया था किंतु उसे संधि करने पर विवश होना पड़ा था। संधि के अनुसार मेगस्थनीज नाम का राजदूत चंद्रगुप्त के दरबार में आया था। वह कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। उसने जो कुछ भारत में देखा, उसका वर्णन उसने "इंडिका" नामक पुस्तक में किया है।

इंडिका में मेगास्थिज़  ने भारत में यानी चन्द्रगुप्त के समय में समाज में सात वर्ग बताये  यह बात ध्यान में रहे  मेगास्थिज़ ने सात वर्ग की बात की है , की जाति की  इसमें  उसने एक पुरोहित  वर्ग बताया जो  लोगो को पूजा कराता  था  और लोगो के पैसे से या समान से अपना जीवन चलाता था   लेकिन वह सबसे उपर  था ऐसा बिलकुल नहीं था , बल्कि इसको कार्य करने से रोका जा सकता  था और वही आदमी फिर समान्य वग में आ जाता था
दूसरा वर्ग किसान का था   जो खेती  करते थे , तीसरा  ग्वाले , का था जो लोग भेड़  बकरिया  चराते थे चोथा वर्ग दुकानदार  और शिल्पकारो  का था जो दूकान चलाते  थे   ये लोग टेक्स पे करते  थे 
पांचवा वर्ग सैनिको  का था  और सबसे बड़े और इज्जतदार  लोग यही होते  थे  ये लोग युद्ध करते  थे और शांतिकाल में आराम करते  थे 

छटा वर्ग   सुपरवाइजर  का था जो देश समाज में हो रहे हर काम पर निगरानी रखते थे  और इन कामो  के बारे में राजा को जानकारी   देते थे .
सातवा  और अंतिम   वर्ग  मंत्रियो का था जो राज्य से सम्बन्धित  हर कार्य में राजा से मंत्रणा  करते  थे और नीतिया  बनाते थे . मेग्स्थिज़  ने एक ही  परिवार  और वंश में पैदा  हुए लोगो को हर तरह के काम करते  देखा  यानी कोई भी  वेग निश्चित  और स्थाई  नहीं था बल्कि योग्यता के अनुसार  अपने वव्साय को चुन सकते  थे
अब चूँकि  मेगास्थिज़  ३००  बी सी में  था  और जाति  नहीं थी  तो  ब्राह्मण  कैसे कामयाब हो गए इस तरह के समाज का निर्माण  करने में

वैज्ञानिक  रूप से यह बात प्रमाणित  है की ब्राह्मण  विदेशो  से आय  कार्य  घुमन्तु   लोग थे और यहाँ आकर   इन्होने शरण मांगी  जो इन्हें दे दी गई
इन्होने कई बार इस देश और समाज से गद्दारी करने की कोश्सी  की लेकिन ये लोग कामयाब १८० बी सी में हो गए परशुराम / पुष्यमित्र शुंग इसे ब्राह्मण भगवान् भी मानते है क्योकि इसने  मौर्य सम्राज्य को धोखे से समाप्त कर ब्राह्मण शासन स्थापित  किया इसके अशोक के पोते व्रह्द्स्थ को धोखे से मार दिया था और लाखो  बौध  लोगो की ह्त्या की  और चोरासी  हजार  बौध विहारों को तोड़  मंदिरों में बदल दिया यह बात सनद  रहे कि  इससे पहले मंदिर  नहीं थे  लेकिन लोगो  के कुल देवी देवताओं के पूजा गृह थे

इसके बाद इन्होने इन्होने जातिवाद  यानी अपने आपको सव्र्श्रेस्थ रखने के लिए ऐसे ग्रंथो की रचना की जिनके जरिये देश में असमानता  , बर्बरता , आज भी बरकरार  है , और इसी कारण  देश का सबसे बड़ा वर्ग तरक्की नहीं कर पाया शिक्षित नहीं हो पाया और यही कारण देश की बदहाली  के कारण ये ही लोग है

Megasthene  traveler visited India during the reign of Chandergupta , his account book Indika  revealed  that there was no caste system in India instead  seven class of workers  were there .
Later on caste was created by the Brahman / Aryan Invaders as a part of conspiracy against the aboriginals along with Ramayan , Mahbharat , Manusimriti  and other fake scriptures .

Carbon dating of these books has confirmed   these books age and are not ancient book but were written during the 180 BC to 230 AD 

Tuesday, 12 December 2017

पुष्यमित्र शुंग / परशुराम गद्दार ब्राह्मण , जिसने की लाखो बौध लोगो की हत्या और स्थापित किया ब्राह्मणवाद


जन उदय : ये बात सब को बड़ी अजीब लगेगी की ऐसा कौनसा  समाज दुनिया में हो सकता है जो अपने ही समाज के लोगो  की हत्या , बलात्कार को  जायज समझता है  और बाकायदा इस उत्पीडन और हत्याओं को ये लोग धार्मिक जामा  पहनाते  है , और यह कहते है की इन्हें तो भगवान्  ने ऐसा करने के लिए  बनाया है , और यही नहीं शिक्षा सम्पति  और अधिकार से ये लोग वंचित रखते है .. ऐसे लोग क्या किसी सभ्य समाज के हिसा हो सकते है ??  नहीं शायद नहीं  ये बर्बर लोग है  जंगली लोग है जो इंसानियत  और मानवता को  न जानते है न समझते है   क्या आप जानते है  की ये लोग कौन है  ??  जी हाँ ये लोग  है ब्राह्मण

देश के सबसे बड़े गद्दार , देशद्रोही   साबित हुए  ये लोग आज भी दुसरे लोगो को शिक्षा , और मानवाधिकारों से वंचित रखना चाहते है  और अपना शासन  स्थापित करना चाहते है

सम्राट अशोक ने अपने राज्य में पशु हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके कारन ब्राह्मणों की रोजगार योजना बंद को गई थी, उसके बाद सम्राट अशोक ने तीसरी धम्म संगती में ६०,००० ब्राह्मणों को बुद्ध धम्म से निकाल बाहर किया था, तो ब्राह्मण १४० सालों तक गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे थे, उस वक़्त ब्राह्मण आर्थिक दुर्बल घटक बनके जी रहे थे, ब्राह्मणों का वर्चस्व और उनकी परंपरा खत्म हो गई थी, उसे वापस लाने के लिए ब्राह्मणों के पास बौद्ध धम्म के राज्य के विरोध में युद्ध करना यही एक मात्र विकल्प रह गया था, ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए

अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के पौत्र , मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट राजा बृहद्रथ मौर्य की हत्या धोखे से उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में ईसा.पूर्व. १८५ में रक्त रंजिस साजिश के तहत प्रतिक्रांति की और खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।

और इस प्रकार ब्राह्मणशाही का विजय हुआ।


उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता था।

उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पर यूनानी राजा मिलिंद का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया, इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की शरण ली।

जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा खारवेल को पता चला तो उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र से यूनानी राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया।
इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग राम ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी...

राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग राम ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ का कत्लेआम हुआ। राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे । इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा दता था।

राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया।
इसी "सरयू" नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया थ…


Brahmaan kingdom / dominance was established by Pushyamitr shung / Parshuram was the chief soldier of vrahdhasth  the grand son of  King Ashok in 180 BC ,  Pushymitr shung  killed millions of Boudhist People  demolished more then  90 thousand  Boudh Vihar and  Stupa and converte them into temple

Brahmins   nomads of Europe  and central asia originally came  to india in search of food and water  and a peaceful life but later  by  luring  local kings  giving them their daughters  they got  the place in courts of local king . but  they did as their original nature was , treachery , ungretfulness 

Wednesday, 20 April 2016

सिर्फ भाषण और सेमिनारो में नहीं अपने चुनावी मेनिफेस्टो में ऐलान करे आरक्षण खत्म करने का


जन उदय :  आज अगर आप भारत में आरक्षण के उपर बहस को देखे तो कोई भी चलता फिरता  नेता , बुद्धिजीवी,  कवि ,नाटककार , आरक्षण पर बहस करता नजर आ जाएगा , और उस पर अपनी टीका टिप्पणी कर देगा की आरक्षण बंद कर दिया जाए कि जातिगत आरक्षण खत्म कर दिया जाए

दरअसल ये वो लोग  है जो आरक्षण को दलितों को दिए  जाने वाला  खैरात समझते है या ऐसा समझते है आरक्षण उनके हक को मार कर दलितों को दिया जा रहा है
तो सबसे पहले ऐसे मंद बुद्धिजीवी , नकली साधू , कवि छुट भय्या नेता समझ ले कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है , बल्कि सत्ता और समाज में भागीदारी का फार्मूला है और यह सविन्धानिक है , दूसरी बात यह किसी खैरात या भीख में नहीं मिलता है बल्कि १९३२ के कम्युनल अवार्ड में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के प्रतिनिधित्व को स्वीकारा  था  और दिया गया  था ,

 लेकिन गांधी की चालबाजी से आंबेडकर ने कम्युनल अवार्ड को छोड़ा और उसके बदले आरक्षण की वाव्व्यस्था की गई , इस कम्युनल अवार्ड की ख़ास बात यह थी की दलित समाज और इसके भूगोलिक खंड पर भारत सरकार राज नहीं कर सकती थी  और न ही भारत का कोई अन्य जाति  का व्यक्ति इनके क्षेत्र से चुनाव लड़ सकता था  हाँ दलितों को ये हक था की उसको दोहरे वोट अधिकार थे

अब कोई भी बुद्धिजीवी समझ सकता है की अगर ऐसा होता  तो दलित आज स्वयं राजा होते और  खुद प्रजा उन पर कोई हुकूमत नहीं कर सकता था यानी देश के अंदर ही कई देश होते दलितों के
लेकिन फिर भी बाबा साहेब ने सदीओ की जिल्लत को भुला कर और इतिहास को ध्यान में रख कि हम एक रहेंगे तो सुरक्षत रहेंगे  को ध्यान में रखा  और भारत यानी गांधी के समझोते को मान लिया  वो भी सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के लिए

आज  हलांकि बहुत सारे दलित नेता भी ब्राह्मण की बांटो में आकर यह कहने लगे है की आर्थिक रूप से  सक्षम दलित  आरक्षण  छोड़े , कमाल की बात यह है की सबसे पहले उन्हें छोड़ना  चाहिए ताकि बाकी दलितों को  रास्ता दिखा सके , खुद सामान्य सीट पर लड़े पार्टी के अंदर दलितों से सम्बन्धित किसी भी  विशेष अधिकार का प्रयोग न करे  , और अपने को दलित शब्द से दूर रखे

इसके अलावा जो लोग /पार्टी के नेता आरक्षण का विरोध करते है तो सबसे पहले अपने चुनावी मेनिफेस्टो में  लाये की जीतेंगे तो आरक्षण ख़त्म करेंगे , ताकि आपकी कर्त्यवनिष्ठा चमके  

Monday, 14 March 2016

“पाकिस्तान जिंदाबाद “ का नारा अगर किसी और ने लगाया होता तो .... क्या अब संघ के गुर्गे मीडिया देशद्रोह पर चर्चा करेंगे ??


 श्री श्री रवि शंकर ने विश्व संस्कृति महोतसव में राजनाथ की मोजुदगी में लगाया पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा , सारे अखबार , मीडिया  जो की बहुत बड़े देशभक्त है , ज्ञानी  है है पुरोहित  है , महान है  सब या तो चुप है  या  इसकी चर्चा बोधिक स्तर पर कर रहे है , भारत पाक रिश्ते की कर रहे है , इंसानियत की कर रहे है , देश में एक अच्छा  राजनैतिक  माहोल बन रहा है  ये बात भोली भाली जनता को समझाने की कोशिस कर रहे है ,  इन मीडिया के संघी गुर्गो को लगता है की जनता तो बेवकूफ है  क्योकि जो संघी जैसे  लोगो के हाथो में सत्ता दे सकती है वह जनता तो निरी मुर्ख ही होगी

खैर  थोडा बौधिक  हो कर सोचते है और यह सोचते है की पाकिस्तान जिंदाबाद क्यों न हो ??  रहे वो भी रहे , जिंदाबाद रहे , खुशहाल रहे , बंगलादेश भी रही रहे है तभी सही मायने में विश्व संस्कृति फले फूलेगी , यही मायने में यही मानवता है इंसानियत है ,
लेकिन सवाल यह है की  जब यही नारे कश्मीर में लगते है तो वहा की जनता का स्वागत गोलिओ से होता है  अगर यु पी में लग जाए , जे एन यु में लग जाए तो सारे के सारे संघी बुद्धिजीवी कुत्ते के तरह एक  कतार में लग कर  उसके उपर भोंकते रहे है , उसो देशद्रोही बताने लगते है  उनके उपर देशद्रोह  के आरोप लगते है , जे एन यु के छात्र कन्हिया एंड कम्पनी के उपर इसी वजह से देशद्रोह का आरोप लगा है  , तो इस बात से क्या मतलब निकाले जाए ???  जनता  खुद ही सोचे

दरअसल संघ एक दोमुहा   जहरीला नाग है  ये जो कहते है करते है  बस वाही सची है और सही है लेकिन दुसरा जब करने लग जाए  तो वह गलत है देशद्रोही है  , विश्व संस्कृति महोत्सव दरअसल एक बहाना  है ब्राह्मणवाद को विश्व स्तर पर बढ़ावा  देने के लिए कमाल की बात है है की ये लोग इस ब्राह्मणवाद को बढ़ावा भारतीय संस्कृति के बधावे के नाम पर देते है , रवि शंकर   संघ का एक गुर्गा है और संघियो के लिए काम करता है विश्व संस्कृति के नाम पर इसने जय श्री राम का नारा लगवाया  ये भी एक बहुत बढ़ा अपराध है 

Sunday, 13 March 2016

संघ ड्रेस नहीं अपनी आतंकी और देशद्रोह वाली सोच बदले

संघ ड्रेस नहीं अपनी आतंकी और देशद्रोह वाली सोच बदले
संघ ने त्यागा खाकी निक्कर ,लेकिन नहीं बदली मानसिकता और देशद्रोही चरित्र
अपनी राष्ट्रीय मीटिंग में आर एस एस ने अपनी वर्दी को बदलने का फैसला किया है  आर एस एस का मानना है की यह वक्त की मांग है एक हम अपनी वर्दी बदले ,  गैर तलब है की आजकल के माहोल में आर एस एस अपने आपको अपने सभी देशद्रोही वाले कामो के बावजूद , अपने सभी अनैतिक कामो के बावजूद , अपने  सभी अपराधिक कार्यो के बावजूद अपने आपको देशभक्त  साबित करना चाहे है

और यह कदम इसी राह में है , अब इनसे कोई ये पूछे  की आप दलितों के पुरे गाव जला देते है सिर्फ उनकी जमीने हडपने के लिए  , आप दलित छात्रो को पढने से रोकते है  आप गोमांस के नाम पर दंगे कराते है , लोगो के घरो में जबरदस्ती घुस कर आपके गुंडे उनकी हत्या कर देते है , देश की दौलत पूंजीपतियो के हाथो  लूटवाते है , आपके गुर्गे  लोगो ने पुरे देश में आतंक का माहोल  बनाया हुआ है  और अपने आपको देशभक्त कहते है

वैसे ये बात जान लेते है की संघियो ने इस तरह की ड्रेस कोड कहा से लिया तो बताया  जाता है की १९२० के कोंग्रेस अधिवेशन से प्रभावित हो कर  जिसे  कार्यकर्ताओं  ने इस तरह की ड्रेस पहनी थी संघ  ने भी इसी तरह की ड्रेस के अपनाया
इसके बाद १९४० और १९७३ में इसे फिर से परिवर्तित किया गया  , सवाल इस बात  का है क्या कोई व्यक्ति एक ख़ास तरह की पोशाक पहनने से देशभक्त बन जाता है ??  जवाब है नहीं


संघ एक ऐसा दल है जो संस्कृति के नाम पर इस देश में आतंक मचाये हुए है ,  अंधविश्वास , जातिवाद सम्प्रद्यवाद ये ही इनके हथियार है . चलिए ड्रेस आपने बदल ली लेकिन ड्रेस बालने के बाद ब्यान  क्या आया , ?? आरक्षण खत्म करो .. क्या संघ को ये नहीं मालूम की ७९ % सीट सिर्फ ब्राह्मण चट  करे बैठा है  ??  क्या अपने आपको  यानी ब्राह्मणों  को नौकरी  के एग्जाम देने से हटायेगा   संघ  ताकि बाकी सभी जातिओ के लोगो को नौकरी मिल सके ??  और आरक्षण का लाभ सही मायने में  लोगो तक पहुचे , शायद नहीं  क्योकि  ये लोग सिर्फ  ब्राह्मणों की पार्टी है और किसी भी  तरह सिर्फ  ब्राह्मणों  का ही भला करते है