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Thursday, 14 December 2017

दलित /मूलनिवासी आन्दोलन की समस्याए और समाधान : सुरेंदर सागर


जन उदय : भारत के मूलनिवासी , ब्राह्मणों ने जिन्हें शुद्र का दर्जा दे कर अपने  कपोल  कल्पित  ग्रन्थ और भगवानो  की रचना के माध्यम से शुद्र  बनाया और इन्हें जीवन जीने के सभी अधिकारों से वंचित रखा , इनके अंदर समाज को बदलने की और अपने अधिकारों की जागरूकता  मध्यकाल से आनी  शुरू हो गई  थी . लेकिन ये  आन्दोलन  और सामाजिक चेतना की धाराए  महात्मा  ज्योतिबा फुले , माता सावित्री बाई फुले  जिन्होंने भारत में महिलाओं को शिक्षा  देना प्रारम्भ  किया  और उसके बाद अंग्रेजो  के शाशन काल  और उनके दुवारा किये गए हुए कानूनी , सुधार  और समाजिक सुधारों के जरिये जो चेतना  शुद्र / दलित / एस सी एस टी के बीच  आई  उसी परम्परा  के रहते बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के जरिये  मूनिवासियो ने अपना हक अंग्रेजो से प्राप्त कर लिया , लेकिन धूर्त  गाँधी ने  चाल चली और  अपने पाखंड  के जरिये  बाबा साहेब से पूना पैक्ट करवा लिया लेकिन बाबा साहेब  चूँकि  ब्राह्मणों के चरित्र को बाखूबी समझते  थे इसलिए उनकी  दूरदर्शिता  ने  शुद्रो  को  बचा  लिया  और बाबा साहेब ने इस फैसले में एस सी  एस टी के लिए आरक्षण की मांग की  जिसे मान लिया गया  , सो आरक्षण पूना पैक्ट का  परिणाम  बन  गया .

लेकिन ब्राह्मणों  की धूर्तता से जितना  इतना आसान नहीं था  बाबा साहेब या बात जानते थे  और उनके दलित / बहुजन  लोग इतने  पढ़े  लिखे  समझदार , सामाजिक और आर्थिक रूप से भी सक्षम  नहीं थे इस करके बाबा साहेब के लिए यह लड़ाई  और भी ज्यादा  मुश्किले  थी  इसलिए बाबा साहेब हमेशा   बहुजन युवाओं से कहते थे  कि “”अगर आप मेरा कारवा   आगे न ले जा सको  तो इसे पीछे  मत जाने देना”” 
बाबा साहेब  के जाने के बाद  इतना वक्त गुजरा  , दलितों  पर अत्याचार  कम  होने  की जगह बढ़ते  गए   ब्राह्मणों  का पुरोहितवाद  , आतंकवाद  किसी  न किसी शक्ल में सामने आता ही रहा  है   आरक्षित वर्ग पर  ब्राह्मण बैठ  गया , दलितों के हिस्सों को खा गया उनकी जमीने , अनाज , विकास का फण्ड  खा गया , उनको शिक्षा  के अधिकारों  को खा गया   और यही कारण रहा है की आज २०१७  में भी  लगभग  ७५ % सीट पर केवल ब्राह्मण विराजमान है और उन तमाम सीट पर विराजमान  है जो  सत्ता  की चाबी  होते है  , न्यायपालिका , आदि सब में घुसे बैठे है .

हालांकि  दलित उत्थान  और दलित राजनीति के नाम पर सबसे बड़ी पहल देश में मान्वर कांसीराम जी ने की बसपा  के रूप में   बसपा ने  इतना जी तोड़  काम किया की देश में राजनीती  को एक अलग मोड़  दे दिया  और आलम यह हो गया की किसी  वक्त   डंडे के जोर  पर वोट  ले लिए जाते  थे  अब उन्ही दलित वोटो  को  एक समीकरण  के रूप में देखा जाने लगा  और वो भी उनकी अपनी मर्जी से , वरना  खाने पिने , रहने की मर्जी  क्या होती है  ये दलित जानता ही नहीं था , लेकिन इसके बावजूद दलित राजनीति  में जो परिवर्तन आने चाहिए थे , दलित  राजनीती से जो परिवर्तन आने चाहिए  थे ,वो नहीं आये  आज २०१७ अलविदा  होने जा रहा है  लेकिन दलित लडकियो  के बलात्कार , हत्या , लूट , , सहारनपुर ,  रोहित वेमुला , डेल्टा मेघवाल , उना काण्ड हमारे माथे  पर अपमान के टीके  बन कर लगे है , और हम कुछ नहीं कर सके  और न ही कुछ कर सकते
ऐसा क्यों इसके कारणों  के कारण  और निवारण  नहीं हो जाता  तब तक इस देश में दलित / मूलनिवासी  उत्पीडन  ऐसे ही चलता  रहेगा

इसके मुख्य कारण में है


१.       दलित युवा आज के दौर में बहुत आक्रोशित है  और अपने अपने स्थान पर ऐसा लगता है कि वह एक ऐसी  मिसाइल  है  जो समाजिक परिवर्तन के चलाई  जा रही  है लेकिन इसकी ख़ास बात यह है कि इस मिसाइल  के पास कोई दिशा निर्देश नहीं है  यानी  ये युवा एक अनगाइडेड मिसाइल  है और  सही दिशा न मिलने के कारण ये मिसाइल अंत में  फूस हो कर गिर जाती है , यानी जब इनके द्वारा किये गए कार्य से कोई परिणाम नहीं निकलता  तो लोग हताश व् निराश हो कर  बैठ जाते है  जबकि  दलित आन्दोलन में शामिल  संस्था  और राजनैतिक पार्टियो को चाहिए की उनको एक सूत्र में बांधे
२.        दूसरा कारण  है दलित प्रतिनिधिओ का बिकायु  होना  या अवसरवादी  निकल जाना  , यानी ऐसा नहीं  है की दलित आन्दोलन में कोई संस्था बिलकुल ही काम नहीं कर रही है   काम तो हो रहे है लेकिन इनके प्रतिनिधि   इन युवाओं की उतेजन का लाभ अपने निजी फायदे के लिए उठा लेते  है  और  संघी  जैसी पार्टियो के हाथो  बिक जाते है , जैसे उदित राम हुआ , रामदास अठावले , , रामविलास पासवान , आदि आदि  ये लोग दलितों  की रहनुमाई के नाम पर दलितों  की दलाली करने लग जाते है , हलांकि ठीक ऐसा ही फायदा  आजादी से पहले से लेकर वामपंथी  पार्टियो ने उठाया और समाजिक बराबरी के नाम पर इन युवाओं को  गुमराह किया
३.       दलितों  का सूचना तंत्र : एक राजनैतिक  आन्दोलन के लिए एक सूचना का फ्लो  बड़ा जरूरी  होता है  यानी किसी  विषय पर क्या स्टैंड  होगा यह बहुत जरूरी है , लेकिन दलितों में ऐसा कोई तंत्र नहीं  जो जिसके मन में आता है वह बोल देता है कर देता है .

४.       खुद दलित नेताओं के द्वारा दलितों का शोषण राजनीतिक  रूप से होता है  यानी खुद दलित नेता दल के अंदर ऐसे दलित नेता को आगे नहीं बढ़ने देते  जो काफी तेज  हो  , क्योकि ऐसे युवा को आगे बढ़ने  दिया गया तो ऐसे बहुत से दलित बुद्धिजीवी  है जो साइड लाइन हो जाएंगे , ऐसा बसपा  में बहुत है और अन्य पार्टी में हद से जयादा है
५.       आर्थिक –समाजिक रूप से कमजोर :  दलित आन्दोलन में एक समस्या यह बहुत है की  दलित आर्थिक रूप  से और समाजिक रूप से बहुत कमजोर है यानी अगर किसी समस्या पर आन्दोलन करना  हो तो शायद ही हजार दो हजार  दलित सामने आ पाए उसका कारण  अगर आनोद्लं करेंगे तो खायंगे क्या ?? दुसरा अन्य जाति के लोगो ने देखा तो जब वो लोग इकट्ठे हो कर हमला करेंगे  ऐसी हालत में दलित इकट्ठा  हो कर मुकाबला करने में असमर्थ होंगे
६.       हिन्दू  बनाम शुद्र : अपनी सत्ता  बनाए रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग लगातार कार्यशील  है ये लोग फिल्मो , साहित्य , सोशल नेट वोर्किंग , आदि के जरिये  समाज में भ्रान्तिया फैलाते रहते है  यानी दलितों को हिन्दू बनाए रखने के लिए  ( हिन्दू यानी शुद्र , शुद्र यानी ब्राह्मणों  के गुलाम ) हिन्दू – मुस्लिम का  दंगा लगाए रखते है

७.       आर्थिक विषमता और अनिश्चिता  भगवान् को जन्म देती है : भारत में  लोग जल्द विशवास करने वाले , कार्टून जैसी चीजो से डरने वाले , वीभत्स  इमेज से डरने वाले होते है लेकिन अगर आर्थिक रूप से कोई समाज  विषम हो और जीवन में खाने पिने , रहने , स्वास्थ और जीवन जैसी किसी  भी चीज पर कोई निश्चितता न हो  तो वहा एक भगवान् का जन्म हो जाता  है , धर्म को मानने का मतलब है जैसा है उसमे गुजरा करो तकलीफों से जूझो और उस परम , असीम कृपा वाले भगवान् को मानो , अब ये भगवान् के मालिक  और  रिश्तेदार कौन है ?? यह समझने की बात है
८.       प्रबुद्ध वर्ग की अनदेखी : दलित वर्ग में एक ऐसा बहुत बड़ा वर्ग ही जो आरक्षण का लाभ  उठा एक शीर्ष स्तर पर पहुच गया गया है लेकिन  अपनी जाति  को ही अपमानित समझता है  और और अपने समाझ के लोगो से दूर हो जाता है वह न तो इस समाज के कुछ काम आता है बाकायदा   ब्राह्मणवाद को यानी अपने दुश्मनों  के खेमो  को मजबूत करता  है

९.       आन्दोलन को  क्रिएटिव  और रोचक न बनाना :  दलित लोग प्रोटेस्ट के सिर्फ पुराने  तरीको पर टिका है जबकि   देश दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमेशा  अपने आन्दोलन को क्रिएटिव  बनाना  होता है , वही सोंग , वही नाटक , वही लोग लेकिन इर भी अलग लगे ,जो लोग तेलंगाना  आन्दोलन से जुड़े है या उन्होंने दिल्ली में उनके धरने पदर्शन देखे है उनको यह बात अच्छी  तरह याद होगा की ऐसा कोई प्रोटेस्ट  नहीं रहा होगा जिसको मीडिया ने कवर न किया हो , कवर करने की वजह में क्रिएटिविटी  एक बहुत बड़ा कारण रहा था

१०.   कला संस्कृति के माध्यम से चेतना बड़े : कला संस्कृति  एक बहुत बड़ा हथियार है इसलिए  इन दोनों माध्यमो  को  काफी मजबूत करना होगा और मूलनिवासी वर्ग को अपनी ब्राह्मण से पूर्व अपनी संस्कृति  को  आगे बढाए


अगर दलित समाज  सिर्फ   संघठित हो जाए  और अपने सुचना तंत्र को सही बना ले  तो वो दिन दूर नहीं की जब दलित पहले की तरह इस देश के राजा होंगे और ब्राह्मण  इस देश को छोड़ भागेंगे 

Thursday, 19 May 2016

टीना डाबी खिलाफ जहर उगल रहे ब्राह्मणों ने साबित किया कि ब्राह्मण है देश का देशद्रोही और गद्दार नम्बर वन


क्या ऑल वर्ल्ड गायत्री परिवार आरक्षण विरोधी संगठन है?

गायत्री परिवार में अगर सिर्फ सवर्ण हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना. लेकिन अगर इस संगठन में SC, ST, OBC का कोई है, तो उसे संगठन के नेताओं से पूछना चाहिए कि वे आरक्षण विरोधी अभियान क्यों चला रहे हैं.



गायत्री परिवार के पेज पर लगभग दस लाख लाइक्स हैं. मेरी फ्रैंड लिस्ट के डेढ़ सौ लोग वहां है.
इस पेज ने सिविल सेवा की टॉपर टीना डाबी के प्रिलिम्स के नंबर के आधार पर एक आरक्षण विरोधी टिप्पणी लगाई है. जबकि हर कोई जानता है कि प्रिलिम्स सिर्फ क्वालिफाई करने के लिए है. मेरिट मेंस और इंटरव्यू के आधार पर तय होती है.

और ये अंकित श्रीवास्तव रो क्यों रहे हैं. टीना डाबी ने मेंस में उन तमाम लोगों को पीछे छोड़ दिया, जो अंकित से ज्यादा नंबर लाकर सेलेक्ट हुए थे... अंकित को और मेहनत करनी चाहिए.


गायत्री परिवार अगर हर जाति के लोगों का है, तो यह पोस्ट हटानी चाहिए और जांच करनी चाहिए कि उसका फेसबुक पेज कौन चला रहा है.

इस पोस्ट से गायत्री परिवार की प्रतिष्ठा खराब हुई है.

Tuesday, 3 May 2016

जातिवादी जजों की चिंता है प्रमोशन में आरक्षण से लेकिन कभी इस बात की चिंता क्यों नहीं की जिनको आरक्षण का लाभ नहीं मिला उसको मिले और बेक लॉग खत्म हो

 जन उदय :  हाल में में  जातिवादी   ब्राह्मण  जजों  ने  प्रमोशन में आरक्षण को यह कहते हुए खत्म कर दिया की यह तर्क संगत नहीं और देश को बाँट  रहा है और इससे गुणवत्ता  पर फर्क पढ़  रहा है यानी जो  लोग आरक्षण  आगे आये है उनमे योग्यता की कमी है

बहुत  अच्छा  किया जज साहेब ने लेकिन जज साहेब ने नहीं   बताया की जिन्हें आरक्षण नहीं मिला यानी ब्राह्मण बनिए  ने अपनी योग्यता के दम  पर क्या क्या चमत्कार किये है  लेकिन ये बताना  भूल  जाते है ये जज

इसके अलावा सुप्रीम  कोर्ट ने समाज में फैली विषमता जो जातिवाद के कारण फैली है जिसके कारण आरक्षण दिया जाता है उसको दूर करने के लिए कभी भी कोई रोड मैप  नहीं दिया

कभी हमारी आदरणीय ब्राह्मण न्यायपालिका ने यह नहीं कहा की आरक्षण जिन लोगो के लिए था उन लोगो को इतने सालो बाद  भी क्यों नहीं मिला , क्यों उनके हिस्से का माल / यानी आरक्षण सब ब्राह्मण खा   गए  और जो  खा गए उन पर केस   या अपराधिक  मुकदमे  क्यों नहीं  चलाये  गए

हमारे ब्राह्मणवादी जज  कभी ये कोशिस क्यों नहीं करते की जो बकाया   आरक्षण  है उसके लिए सरकार जल्द से जल्द कदम उठाये

कोर्ट ने ये कभी  क्यों नहीं कहा की  या कोई रिपोर्ट  मांगी की  की जिनका आरक्षण था मिला या नहीं उन लोगो को ?/


नहीं ऐसा कभी नहीं करेगी  और साथ में जातिवादी  मीडिया में इस बारे में कुछ नहीं कहेगी 

Wednesday, 20 April 2016

सिर्फ भाषण और सेमिनारो में नहीं अपने चुनावी मेनिफेस्टो में ऐलान करे आरक्षण खत्म करने का


जन उदय :  आज अगर आप भारत में आरक्षण के उपर बहस को देखे तो कोई भी चलता फिरता  नेता , बुद्धिजीवी,  कवि ,नाटककार , आरक्षण पर बहस करता नजर आ जाएगा , और उस पर अपनी टीका टिप्पणी कर देगा की आरक्षण बंद कर दिया जाए कि जातिगत आरक्षण खत्म कर दिया जाए

दरअसल ये वो लोग  है जो आरक्षण को दलितों को दिए  जाने वाला  खैरात समझते है या ऐसा समझते है आरक्षण उनके हक को मार कर दलितों को दिया जा रहा है
तो सबसे पहले ऐसे मंद बुद्धिजीवी , नकली साधू , कवि छुट भय्या नेता समझ ले कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है , बल्कि सत्ता और समाज में भागीदारी का फार्मूला है और यह सविन्धानिक है , दूसरी बात यह किसी खैरात या भीख में नहीं मिलता है बल्कि १९३२ के कम्युनल अवार्ड में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के प्रतिनिधित्व को स्वीकारा  था  और दिया गया  था ,

 लेकिन गांधी की चालबाजी से आंबेडकर ने कम्युनल अवार्ड को छोड़ा और उसके बदले आरक्षण की वाव्व्यस्था की गई , इस कम्युनल अवार्ड की ख़ास बात यह थी की दलित समाज और इसके भूगोलिक खंड पर भारत सरकार राज नहीं कर सकती थी  और न ही भारत का कोई अन्य जाति  का व्यक्ति इनके क्षेत्र से चुनाव लड़ सकता था  हाँ दलितों को ये हक था की उसको दोहरे वोट अधिकार थे

अब कोई भी बुद्धिजीवी समझ सकता है की अगर ऐसा होता  तो दलित आज स्वयं राजा होते और  खुद प्रजा उन पर कोई हुकूमत नहीं कर सकता था यानी देश के अंदर ही कई देश होते दलितों के
लेकिन फिर भी बाबा साहेब ने सदीओ की जिल्लत को भुला कर और इतिहास को ध्यान में रख कि हम एक रहेंगे तो सुरक्षत रहेंगे  को ध्यान में रखा  और भारत यानी गांधी के समझोते को मान लिया  वो भी सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के लिए

आज  हलांकि बहुत सारे दलित नेता भी ब्राह्मण की बांटो में आकर यह कहने लगे है की आर्थिक रूप से  सक्षम दलित  आरक्षण  छोड़े , कमाल की बात यह है की सबसे पहले उन्हें छोड़ना  चाहिए ताकि बाकी दलितों को  रास्ता दिखा सके , खुद सामान्य सीट पर लड़े पार्टी के अंदर दलितों से सम्बन्धित किसी भी  विशेष अधिकार का प्रयोग न करे  , और अपने को दलित शब्द से दूर रखे

इसके अलावा जो लोग /पार्टी के नेता आरक्षण का विरोध करते है तो सबसे पहले अपने चुनावी मेनिफेस्टो में  लाये की जीतेंगे तो आरक्षण ख़त्म करेंगे , ताकि आपकी कर्त्यवनिष्ठा चमके  

Tuesday, 12 April 2016

आरक्षण छोड़ने की बात करने वाले दलित नेता पहले खुद दलित राजनीती छोड़े और आरक्षित सीटो पर न लड़े

नई दिल्ली : रामविलास पासवान ने एक बार कहा था की अगर आरक्षण न होता तो वो आज जहा है वहा नहीं होते ,जाहिर है इसमें कोई दो राय नहीं है क्योकि आज जितने भी दलित है वो आरक्षण की वजह से आगे आये है


अब इनके सपुत्र  आरक्षण के लिए लड़ने वाली अपनी ही पिता की पार्टी से जिन्हें चुनाव लड़ने का आरक्षण मिला  कहते है कि आर्थिक रूप से खुशहाल दलितों को भी आरक्षण का लाभ उठाना बंद कर देना चाहिए।



अख़बार 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को दिए गए एक इंटरव्यू में चिराग पासवान ने कहा कि आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों के लिए आरक्षण कोटा बंद कर देना चाहिए और यह उन समुदायों को दिया जाना चाहिए जिन्हें इसकी जरूरत है, इससे उनकी स्थिति में सुधार आएगा। 


इस बात को खाने से पहले चिराग पासवान ने के बार भी नहीं सोचा होगा की अगर समृद्ध दलित आरक्षण छोड़ेंगे तो वो खुद अपने पिता की  पार्टी में क्यों आरक्षण पाकर चुनाव लड़े ?
इसके अलावा अब खुद क्यों दलित राजनीती कर रहे है ??  आप समृद्ध है अब आपको क्या करना है आरक्षण का ??



ये बड़े ही अचरज की बात है की इससे पहले दलितों के नाम पर खाने वाले आरक्षित सीट पर लड़ने वाले कहते है समृद्ध दलितों को आरक्षण छोड़ना चाहिए , यानी ये वो लोग है जिन्हें खुद सब कुछ चाहिए लेकिन प्रवचन सबको त्याग का दे रहे है   

Tuesday, 5 April 2016

आज भी दलितों के कान में शीशा पिघला कर डाला जाता है अगर मांगते है शिक्षा

जन उदय : सब लोगो ने ब्राह्मणों के उस साम्राज्य की बात तो सुनी होगी की जब दलितों को शिक्षा के लिए मनाही थी और  अगर गलती से भी कोई दलित / शुद्र स्कूल के पास से गुजर जाए और उसके कानो में कोई ब्राह्मणों का मन्त्र पड़  जाए तो उस शुद्र के कानो में शीशा पिघला कर दाल दिया जाता  था .

देश के एक बड़े   इतने बड़े समाज को ब्राह्मणों ने केवल शिक्षा  से वंचित करके गुलाम बना कर रख लिया   इसी अशिक्षा की वजह से ये मानसिक रूप से भी गुलाम हो गए और शुद्रो की ये गुलामी सदीओ तक चलती रही . यानी एक वक्त के राजा अपने ही देश में इन  विदेशी ब्राह्मण आक्रमंकारियो  के गुलाम बन गए .

शुद्रो की गुलामी सुनिश्चित   रहे  ब्राह्मणों ने इस देश में राज करने वाले वाले  , या राज करने के लिए आने वाले हर देशी विदेशी वर्ग को अपना समर्थन  दिया , और शासन करने में मदद की

शिक्षा  पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोडा तो लार्ड मैकाले ने जिसने शिक्षा में सभी वर्गो को पढने का सामान अधिकार दिया  , इस पर ब्राह्मणों को बहुत अफ़सोस हुआ , खैर  इन अंग्रेजो को भी ब्राह्मण  बाद में मदद करते नजर आये

आजादी के बाद  ये ब्राह्मणों की  मजबूरी  हो गई क्योकि   डॉ  भीम राव अम्बेडकर ने पूना पैक्ट में अपने लिए सारे  अधिकार ले लिए थे लेकिन धूर्त ब्राह्मणों  ने इस पर भी चाल चली  लेकिन इतने कामयाब नहीं हुए और बाबा साहेब ने समानता  के साथ साथ सविंधान में  ही सरकार को मजबूर कर दिया की  सरकार सबको शिक्षा दे , लेकिन ब्राह्मणों को ये भी मंजूर नहीं था इसलिए इन्होने शिक्षा को निजी और सरकारी दो भागो में बाँट  दिया यानी गरीब / शुद्र  और निजी उच्च   जाति  इरादा  था ऐसा करने के पीछे की सरकारी खराब शिक्षा से ये शुद्र उपर नहीं उठ पायंगे  और इनका वर्चस्व हर चीज पर बना रहेगा, जैसा की हुआ भी लेकिन शुद्र के मेघावी बच्चे आगे निकलने लगे , और जीवन के हर क्षेत्र में आगे आने लगे , बावजूद इसके की ब्राह्मणों ने खूब बेईमानी  की  धोखे  दिए   लेकिन फिर भी शुद्र  आगे आ गए

अब ब्राह्मणों के पास एक ही रास्ता  बचा  की भारत की उस शिक्षा वाव्य्स्था को बिलकुल बर्बाद कर दिया जाए ताकि ये दलित शुद्र आगे न आ सके  इसलिए धीरे धीरे  शिक्षा का बजट कम किया जा रहा है  , उच्च संस्थाओं  जैसे आई आई टी , मेडिकल में फी बढाई जा रही है  और निजी कॉलेज को प्राथमिकता  दी जा रही है इसके अलावा उच्च शिक्षा में आने वाले दलित और ओ बी सी न आ पाए इसके लिए यु जी सी के द्वारा दी जाने वाली फेलोशिप बंद करने जा रही है यही नहीं यु जी सी का सालाना बजट इस बार ५५ % कम कर  दिया गया है , पुरे देश में  पिछले  दो सालमे ३ लाख से जयादा  सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए है

और सबसे बड़ी  बात की सरकारी स्कूलों में ९वी कक्षा तक फेल न करने की निति  से भी  शिक्षा  तो बर्बाद हो  ही  रही है  बल्कि ब्राह्मण  टीचर  इन स्कूलों में जानबूझ कर दलित  छात्रो को  तीन विषय में  फेल कर रहे है  और इनको पास करने के लिए एक हजार रूपये  प्रति विषय  लिया जा  रहा है

रोहित वेमुला  , डेल्टा की संस्थानिक हत्या  और अन्य  छात्रो की हत्या ये सब साबित कर रही है


आज से सदीओ पहले जिस  तरह शीशा  पिघला कर डालने का चलन  रहा होगा , अब शीशा  पिघला कर  दलितों के कान में डालने का स्टाइल  बदल  गया है लेकिन काम वही है 

Saturday, 26 March 2016

सिर्फ भारत ही नहीं जानिये दुनिया के कितने देशो में मिलता है आरक्षण :: राज आदिवाल


दलित आरक्षण के खिलाफ कई तरह के तर्क कुतर्क किये जाते है। उनके कुछ तर्को में दलित आरक्षण विरोधियों का सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे  देशो मे आरक्षण नहीं है इसलिये वो हमसे ज्यादा प्रगितिशील  है। जो बिल्कुल गलत है।

 विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है ।

बाहरी देशों में आरक्षण को Affirmative Action कहा जाता है। Affirmative Action मतलब समाज के "वर्ण " तथा "नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।
1961  को संयुक्त राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण अथवा नस्लभेद रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बना। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित  किये हुए वर्ग को (दलित) की मदद करके उन्हें समाज मे स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसी के तहत अलग अलग देशो ने अलग अलग तरीके से आरक्षण लागु है।



अन्य देशो में आरक्षण
ब्राझील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है ।
कॅनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामन्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है ।
चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है ।
फिनलैंड  मे स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है ।
जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
इसरायल में Affirmative Action तहत आरक्षण है ।
जापान जैसे सबसे प्रगत देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के  हक वंचित दलित लोग हैं ) 
मॅसेडोनिया में अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।

मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत  आरक्षण जारी हुए है ।
न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
 नॉर्वे मे 40 % महिला आरक्षण है पीसीएल बोर्ड में।
रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
दक्षिण कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन  लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र अमरिका में भी Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।                            
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। यहां तो सबसे ज्यादा लोग जातिभेद के ही शिकार हैं । तो फिर दलित तथा पिछड़े वर्ग को क्यों न मिले आरक्षण..??
अगर आरक्षण हट गया तो फिर से एक ही " विशीष्ट " वर्ग का शासन तथा उद्योग व्यवसायों पर कब्जा  होगा, फिर ऐसे में किस प्रकार देश की प्रगति होगी। भारत सिर्फ किसी विशीष्ट समुदाय के लोगो का देश नहीं है, सिर्फ एक वर्ग विशेष की प्रगति से भारत की प्रगति नहीं  होगा।

 जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, नौकरी तथा सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तकदेश प्रगति नहीं करेगा। अगर  प्रत्येक देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहा है तो फिर भारत क्यों नहीं ..?

Monday, 7 March 2016

देश में विरोध , भारतीय विदेशो में मांगते है ब्राह्मण आरक्षण ,देश में ही नहीं भगवा मानसिकता के लोग विदेशो में भी इस जहर को फैलाते है

जन उदय : देश में विरोध , भारतीय विदेशो में मांगते है आरक्षण ,देश में ही नहीं भगवा मानसिकता के लोग विदेशो में भी इस जहर को फैलाते है

कनाडा दुनिया की सभी संस्कृतियो का समावेश , एक खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है , कनाडा दुनिया का शायद एकमात्र देश है जहां पर दुनिया की सभी हिस्सों के लोग रहते है , सभी भाषा और संस्कृतियो का एक साथ समन्वय और समावेश है
 .
कहने को भारत भी विविधता वाला देश है , यहाँ भी दुनिया के सभी धर्म , प्रजाति के लोग है लेकिन जो आदर सम्मान कनाडा में विदेशी मूल के लोगो को मिलता है वो शायाद कही नहीं . कनाडा में ६९ % लोग विदेशी मूल के है ये एक बहुत बड़ी संख्या है क्योकि ये नज़ारा भी आपको देखने को कही नहीं मिलेगा , लेकिन ऐसा नहीं की इन विदेशी मूल के लोगो को अपने नागरिक हको के लिए लड़ना नहीं पड़ा कोई आन्दोलन नहीं करना पड़ा . यहाँ भी अन्य देशो की तरह सामाजिक आन्दोलन हुए जो लोगो ने अपने हको के लिए लड़े .

कनाडा के सविंधान में इस बात की पूरी कोशिश की गई है की वहा रहने वाले लोग सामान रूप से नागरिक कहे जाए और सामान आदर प्राप्त करे .
सामाजिक उठान के लिए वहा सामान रोजगार अवसर १९९५ में बनाया गया और ये सिर्फ कानून नहीं है बल्कि इसका पालन किया जाता है यहाँ रहने वाले नागरिक चाहे वो चीन से हो अफ्रीका से हो या भारत से हो इस कानून का पूरा लाभ उठाते है और सरकार इस बात की पूरी कोशिस करती है की इस कानून का पालन हो .
कनाडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोग इस कानून का पूरा फायदा उठाते है नौकरी में तो है ही इसे साथ साथ राजनीति आदि में भी भारतीयों की पूरी हिस्सेदारी होती है , यही कारण है की इस बार सामान्य चुनाव के बाद कनाडा में पहली बार एक सिख को रक्षा मंत्री बनाया गया है .
लेकिन भारतीय लोगो के चरित्र की एक ख़ास बात समझ नहीं आती की कनाडा और अन्य यूरोपीय देशो में ये लोग अपने लिए आरक्षण की मांग करते है समानता का हक मांगते है लेकिन यही लोग भारत के सन्दर्भ में जातिवादी बन जाते है , धार्मिक रूप से असह्ष्णु बन जाते है मार पिटाई और आतंकवाद पर उतर जाते है . इन्ही भारतीय लोगो की मदद से भारत में कुछ असामाजिक तत्वों ने आतंक मचाया हुआ है , कभी गाय के नाम पर .
भारत में धर्म के नाम पर दंगे कराने वाले केवल ब्राह्मण और बनिए संघठन ही होते है और ये जाती के लोग ही विदेशो में भी भारत की इस सामाजिक बिमारी को फैला रहे है , जिसके कारण इंग्लैंड में जातिविरोधी कानून बनाना पड़ा .
अगर इन लोगो को आरक्षण सामाजिक न्याय से इतना परहेज है तो यही लोग विदेशो में आरक्षण और सामाजिक न्याय की मांग क्यों करते है