Apni Dukan

Showing posts with label reservation. Show all posts
Showing posts with label reservation. Show all posts

Monday, 23 May 2016

जानिये इस बार यु पी एस सी के ब्राह्मणों की मिली भगत से कितने ब्राह्मणों बने है आई ए एस है फर्जी जाति प्रमाण पत्र से , दलित बन कर दी थी परीक्षा


 जन उदय : जय भीम ही करते रह जाओगे और वहां हर नौकरी में आपका रिजर्वेशन दूसरे लोग लूटते जा रहे हैं! इस साल की UPSC एग्जाम में चयनीत हुए लोगों में से कई ऐसे हैं जो ब्राह्मण हैं...लेकिन झूठे SC,ST और ओबीसी सर्टिफिकेट बनवाकर IAS बन गए हैं!

रोल नम्बर 0007599 सौरभ कुमार शर्मा कैटिगरी ओबीसी से सेलेक्ट हुए है
0325060 अमित कुमार शर्मा कैटिगरी ST से सेलेक्ट हुए है
0079960 कनिका शर्मा कैटिगरी obc से सेलेक्ट हुये है।
0010132 मयंक शर्मा कैटिगरी ST से सेलेक्ट हुए है।


UPSC ने इसके अलावा एक दूसरी लिस्ट भी डाली है जिसमे 172 कैंडिडेट्स को रिज़र्व चुना जाता है...यानी अगर पहले सेलेक्ट कैंडिडेट में कोई नौकरी ना करना चाहे तो उसकी जगह दूसरे को मौका दिया जाता है! उसमे तो आरक्षण के नियमो को पूरी तरह से गायब ही कर दिया है! 172 में से 86 जनरल वाले हैं लेकिन SC-ST के 21% कोटे के हिसाब से जो 36 सीटें बनती हैं....उसकी जगह सिर्फ 12 सीटें दी गई हैं...और बाकी सीटें इन्होने ओबीसी में दिखा दी...जबकि ओबीसी में भी असल हकदारों को ना देकर झूठे जाती प्रमाण पत्र लगाकर गैरकानूनी रूप से ब्राह्मणों को डाला गया है! 


अब आपको समझ आया कि ओबीसी वाले जनरल वालो की साइड पर क्यूँ रहते आये हैं! दलितों के साथ यह धोखा हमेशा से चलता आ रहा है...लेकिन दलित इसको देखना भी नहीं चाहते! इसलिए अब भी वक़्त है...आँखें खोलो....अपना हक़ छीनकर ही मिलेगा!


In accordance with Rule 16 (4) & (5) of the Civil Services Examination Rules 2015, the Commission is maintaining a consolidated Reserve List of 172 candidates as under:
GENERAL: 86
OBC: 74
SC: 08
ST: 4

TOTAL: 172. 

Wednesday, 20 April 2016

सिर्फ भाषण और सेमिनारो में नहीं अपने चुनावी मेनिफेस्टो में ऐलान करे आरक्षण खत्म करने का


जन उदय :  आज अगर आप भारत में आरक्षण के उपर बहस को देखे तो कोई भी चलता फिरता  नेता , बुद्धिजीवी,  कवि ,नाटककार , आरक्षण पर बहस करता नजर आ जाएगा , और उस पर अपनी टीका टिप्पणी कर देगा की आरक्षण बंद कर दिया जाए कि जातिगत आरक्षण खत्म कर दिया जाए

दरअसल ये वो लोग  है जो आरक्षण को दलितों को दिए  जाने वाला  खैरात समझते है या ऐसा समझते है आरक्षण उनके हक को मार कर दलितों को दिया जा रहा है
तो सबसे पहले ऐसे मंद बुद्धिजीवी , नकली साधू , कवि छुट भय्या नेता समझ ले कि आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है , बल्कि सत्ता और समाज में भागीदारी का फार्मूला है और यह सविन्धानिक है , दूसरी बात यह किसी खैरात या भीख में नहीं मिलता है बल्कि १९३२ के कम्युनल अवार्ड में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के प्रतिनिधित्व को स्वीकारा  था  और दिया गया  था ,

 लेकिन गांधी की चालबाजी से आंबेडकर ने कम्युनल अवार्ड को छोड़ा और उसके बदले आरक्षण की वाव्व्यस्था की गई , इस कम्युनल अवार्ड की ख़ास बात यह थी की दलित समाज और इसके भूगोलिक खंड पर भारत सरकार राज नहीं कर सकती थी  और न ही भारत का कोई अन्य जाति  का व्यक्ति इनके क्षेत्र से चुनाव लड़ सकता था  हाँ दलितों को ये हक था की उसको दोहरे वोट अधिकार थे

अब कोई भी बुद्धिजीवी समझ सकता है की अगर ऐसा होता  तो दलित आज स्वयं राजा होते और  खुद प्रजा उन पर कोई हुकूमत नहीं कर सकता था यानी देश के अंदर ही कई देश होते दलितों के
लेकिन फिर भी बाबा साहेब ने सदीओ की जिल्लत को भुला कर और इतिहास को ध्यान में रख कि हम एक रहेंगे तो सुरक्षत रहेंगे  को ध्यान में रखा  और भारत यानी गांधी के समझोते को मान लिया  वो भी सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के लिए

आज  हलांकि बहुत सारे दलित नेता भी ब्राह्मण की बांटो में आकर यह कहने लगे है की आर्थिक रूप से  सक्षम दलित  आरक्षण  छोड़े , कमाल की बात यह है की सबसे पहले उन्हें छोड़ना  चाहिए ताकि बाकी दलितों को  रास्ता दिखा सके , खुद सामान्य सीट पर लड़े पार्टी के अंदर दलितों से सम्बन्धित किसी भी  विशेष अधिकार का प्रयोग न करे  , और अपने को दलित शब्द से दूर रखे

इसके अलावा जो लोग /पार्टी के नेता आरक्षण का विरोध करते है तो सबसे पहले अपने चुनावी मेनिफेस्टो में  लाये की जीतेंगे तो आरक्षण ख़त्म करेंगे , ताकि आपकी कर्त्यवनिष्ठा चमके  

Friday, 15 April 2016

अपने हर अपमान और जिल्लत का बदला लेगा दलित :बात सिर्फ आरक्षण या सामाजिक समानता की नहीं है

 जन उदय : युद्ध में जीत  प्राचीन समाज में एक व्यक्ति के हाथो में निरंकुश सत्ता देती थी अब ये बात उस राजा पर निर्भर करती थी की वो हारे हुए व्यक्ति को क्या सजा दे . सभी युद्ध में यही होता था की सत्ता बदल जाति थी लेकिन आम आदमी , मजदूर किसान वही रहते थे कोई आय जाए मजदूर सिर्फ  मजदूरी ही करते थे ,

लेकिन   ब्राह्मणों ने ऐसा नहीं किया पुष्यमित्र शुंग जो  अशोक के पोते के राज में उसका एक सेनापति था उसने धोखे से सारी सत्ता को हडप लिया और उसके बाद उसने बौध  लोगो की हत्या करना शुरू कर दिया , जहा जहा तक उसकी नजर गई  वहा वहा बौध विहार , तोड़ दिए गए उनकी हत्याए की गई  , उनकी औरतो के बलात्कार किये गए यहाँ तक की गर्भवती  बौध महिलाओं के पेट फाड़ कर बच्चे निकाल कर उनकी हत्याए की गई और इनकी सारी जमीन , खेत , घर खलिहान पर कब्जा कर लिया गया  . ब्राह्मण  इस पुष्यमित्र शुंग को  परशुराम कहते है  और अपना भगवान् मानते है
इसके बाद भी परशुराम का दिल नहीं भरा इन बौध लोगो को गुलाम बनाया गया  और इनको हर क्व्हीज से वंचित कर दिया गया  जिसमे शिक्षा , धन , सम्पति आदि रहा  और यह सिलसिला सदीओ तक रहा और धीरे धीरे खुद शुद्र लोग  ब्राह्मणों के इस षड्यंत्र कि इनका जन्म अपने से उपर  वाले वर्गों यानी जातिओ के सेवा के लिए हुआ है और इनका हक इस दुनिया की किसी भी चीज पर नहीं है “ को भगवान् का आदेश मानने लगे

सर  उठाने पर सर काटना , पढने पर जबान काटना , शीशा पिघला कर कान में डालना भगवान् के नाम पर किया गया , ब्राह्मणों का षड्यंत्र सदीओ तक इस लिए भी कामयाब रहा की आने वाले अंतराल  में जो शासक भारत विदेशो से आये  , ब्राह्मण उनके साथ मिल गए  और उनको उनकी सत्ता में पूरा योगदान दिया  और यह भी कहा गया की ये गुलामो की फौज  उनकी सेवा के लिए हमेशा हाजिर है , जिससे आने वाले विदेशी मुस्लिम शासको को कोई ऐतराज न था

भारत  में अंग्रेजो का आना और भारत को गुलाम बनाना  शायद कुछ दृष्टिकोण से ठीक न हो लेकिन आधुनिकता , और शुद्रो की गुलामी को दूर करने में एक बहुत बड़ा कदम था जब अंग्रेजो ने शुद्रो के लिए भी शिक्षा की वाव्य्स्था की तो बस  जैसे इन ब्राह्मणों के होश उड़ गए  शायद इसी लिए ये आज भी लार्ड मैकाले को गाली देते है .
इसके बाद ब्राह्मणों में  डर  इसलिए भी आ गया जब १ जनवरी १८१८ की भीमा कोरेगाव की लड़ाई में सिर्फ ५००  म्हारो ने २९०००  हजार की सेना को काट कर फेंक दिया था

पेरियार  फुले , और बाबा साहेब के आन्दोलन  अब ब्राह्मणों को डराने लगे थे  यही कारण रहा की गाँधी ने पहली राउंड टेबल कांफ्रेंस में अम्बेडकर के  होने का  विरोध किया  और  विरोध ही नहीं किया बल्कि अंग्रेजो से कहा की अम्बेडकर को न बुलाया जाए ,
खैर  बाबा साहेब के प्रयासों से कम्युनल अवार्ड  मिला और  शुद्रो को हिन्दू नाम  से अलग करके देखा गया , जिसका  गांधी ने फिर विरोध किया  इसके बाद गांधी –अम्बेडकर के बीच पूना पैक्ट  हुआ जिसमे आरक्षण की वाव्य्स्था को स्वीकार किया  गया
आरक्षण के बावजूद  और इस बात के साबित होने के बावजूद की दलित ब्राह्मणों से लाग दर्जे बेहतर है ब्राह्मणों की जातिगत  दुर्भावना  गई नहीं है ये इतने मुर्ख है की इनको लगता है की ये रात को दिन  कहंगे तो सबको वही कहना पड़ेगा
योग्यता के नाम पर किचन से लेकर उपग्रह ,रेडियो , टीवी  फोन , कंप्यूटर ,आदि  कुछ भी नहीं बना पाए है  ,आधुन्किता के नाम पर भारत में जो कुछ भी है वह सब विदेशो से है लेकिन न जाने क्यों ये आज भी सुधर नहीं पाते

आज भी जाति के नाम पर दलितों के कत्ल हत्या , बलात्कार  करते है और इनको ये लगता है की इनका कुछ नहीं होगा

लेकिन दलितों में जो आक्रोश है अब इससे ये बच  नहीं पायंगे , सभी दलित युवा ये मानते है की आरक्षण तो है ही इनका हक इनकी लड़ाई सामाजिक समानता के साथ साथ उस उत्पीडन और अपमान का बदला लेना है   

वैज्ञानिक रूप से साबित की ब्राह्मण विदेशी हमलावर  है  तो इस देश में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है की ये लोग आतंक मचाते रहे ,

वैसे भी दलित बुद्धिजीवी  मानते है की आने वाले सालो में गृह युद्ध  भारत में निश्चित है और ब्राह्मणों का अंत भी


उपरोक्त लेख दलित युवाओं से लिए गए इंटरव्यू पर आधारित  है 

Saturday, 26 March 2016

सिर्फ भारत ही नहीं जानिये दुनिया के कितने देशो में मिलता है आरक्षण :: राज आदिवाल


दलित आरक्षण के खिलाफ कई तरह के तर्क कुतर्क किये जाते है। उनके कुछ तर्को में दलित आरक्षण विरोधियों का सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे  देशो मे आरक्षण नहीं है इसलिये वो हमसे ज्यादा प्रगितिशील  है। जो बिल्कुल गलत है।

 विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है ।

बाहरी देशों में आरक्षण को Affirmative Action कहा जाता है। Affirmative Action मतलब समाज के "वर्ण " तथा "नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।
1961  को संयुक्त राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण अथवा नस्लभेद रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बना। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित  किये हुए वर्ग को (दलित) की मदद करके उन्हें समाज मे स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसी के तहत अलग अलग देशो ने अलग अलग तरीके से आरक्षण लागु है।



अन्य देशो में आरक्षण
ब्राझील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है ।
कॅनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामन्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है ।
चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है ।
फिनलैंड  मे स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है ।
जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
इसरायल में Affirmative Action तहत आरक्षण है ।
जापान जैसे सबसे प्रगत देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के  हक वंचित दलित लोग हैं ) 
मॅसेडोनिया में अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।

मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत  आरक्षण जारी हुए है ।
न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
 नॉर्वे मे 40 % महिला आरक्षण है पीसीएल बोर्ड में।
रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
दक्षिण कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन  लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र अमरिका में भी Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।                            
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। यहां तो सबसे ज्यादा लोग जातिभेद के ही शिकार हैं । तो फिर दलित तथा पिछड़े वर्ग को क्यों न मिले आरक्षण..??
अगर आरक्षण हट गया तो फिर से एक ही " विशीष्ट " वर्ग का शासन तथा उद्योग व्यवसायों पर कब्जा  होगा, फिर ऐसे में किस प्रकार देश की प्रगति होगी। भारत सिर्फ किसी विशीष्ट समुदाय के लोगो का देश नहीं है, सिर्फ एक वर्ग विशेष की प्रगति से भारत की प्रगति नहीं  होगा।

 जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, नौकरी तथा सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तकदेश प्रगति नहीं करेगा। अगर  प्रत्येक देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहा है तो फिर भारत क्यों नहीं ..?

Tuesday, 22 March 2016

आरक्षण को लेकर मगरमच्छ के आंसू बहा रहा है नोटंकी नरेंद्र मोदी


जन उदय : दिल्ली  और बिहार की   हार ने उस धारणा और भ्रम को खत्म कर दिया जिसमे कहा जा रहा था मोदी लहर चल पड़ी , वैसे खुद मोदी को संघ के इस प्रोपगेंडा पर विशवास हो चला था की उसके नाम की कोई लहर चल पड़ी है . लेकिन बिहार और दिल्ली ने इस बात को झूटा साबित कर दिया जैसा की यह झूट था भी

संघ को पहले यह भी विशवास था की अगर सारे स्वर्ण उनके साथ हो जाए तो पुरे देश पर कब्जा कर लेंगे क्योकि मुसलमानों को एक तरफ करने के लिए संघ ने ओवेशी को ड्यूटी पर लगा दिया था  इसलिए मोहन भागवत ने आरक्षण खत्म करने का अपना दाव  चल दिया  जो बिलकुल खाली गया

अब नरेंद्र मोदी को यह चिंता होने लगी है की कही ऐसा न हो दिल्ली बिहार संघ सम्राज्य के अंत की शुरुआत बन जाए क्योकि बिना दलितों के कुछ भी नहीं हो सकता

इसलिए अब नरेंद्र मोदी ने मगरमच्छ के आंसू बहाना शुर कर दिया है यह कह कर की अम्बेडकर एक विश्व पुरुष थे  उन्हें किसी राष्ट्र या जाति में न बाँधा जाए और आरक्षण कभी खत्म नहीं होगा

आरक्षण खत्म होगा या नहीं ये बात अलग है क्योकि इसको ऐसे समाप्त किया ही नहीं जा सकता  दूसरा अगर मोदी को इतना ही दलित प्रेम हो गया है तो यु पी  बिहार में लगातार दलित बस्तिओ को आग लगाईं जा रही है  पहले  ऐसे अत्याचार रोके   न की नौटंकी करे 

Monday, 21 March 2016

नरेंद्र मोदी ने मोहन भागवत और संघियो को साबित किया भोंकने वाला कूकुर

नरेंद्र  मोदी ने मोहन  भागवत और संघियो  को साबित  किया  भोंकने वाला कूकुर
जन उदय :  बिहार , दिल्ली में हार के बाद  अब अन्य राज्यों में  चुनाव आने वाले है इसलिए  मोदी और भाजपा अब घडियाली  आंसू बहाना शुरू कर दिया है ताकि दलित वोट उनसे क्त न सके

हलांकि बिहार चुनाव के वक्त मोहन भागवत ने आरक्षण खत्म करने की बात करने की बात कह कर स्वर्ण समाज को अपने साथ करने की  कोशिस  की  भागवत जी को ये विशवास था की अगर समस्त स्वर्ण समाज संघ के साथ आ जाएगा  तो दलित समाज को  तो  दुबारा  मनुस्मिरिती  लागू करके  उनकी औकात  दिखा देंगे  , लेकिन सफल न हो सके

 हार से परेशान आज मोदी  ने ये एलान कर  दिया कि आरक्षण को  कोई छू  भी नहीं सकता   तो सबसे पहले मोदी  यह जान ले की संघ  भाजपा  की कोई औकात है ही नहीं  अगर है  तो कर के दिखा दो   यानी आरक्षण  खत्म कर दो .
नरेंद्र मोदी अम्बेडकर के नाम पर जितना  रोना  रो रहे है तो सबसे पहले ये बता  दे की बाबा साहेब की किताबे रिडिल्स ऑफ़ हिंदूइस्म  और अन्हीलेश्न ऑफ़ कास्ट  क्यों नहीं छपने दे रहे है संघी
दरसल ये सिर्फ चुनावी  आंसू  है


Wednesday, 9 March 2016

देश के 39 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी/एसटी और ओबीसी कोटे के शिक्षकों के 58 फीसदी पद खाली हैं।

देश के 39 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी/एसटी और ओबीसी कोटे के शिक्षकों के 58 फीसदी पद खाली हैं।
इन वर्गों के लिए स्वीकृत 4763 पद में से सिर्फ 1977 पदों पर असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर की नियुक्तियां हुई हैं। इसके अलावा असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए बीएचयू और एचएनबी गढ़वाल ने स्वीकृत पदों से ज्यादा नियुक्तियां सामान्य वर्ग में कर ली थी।


आंकड़े एक साल पुराने 2015 के हैं लेकिन वर्तमान में भी इनकी प्रासंगिकता है क्योंकि हाल ही में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला के सुसाइड के बाद आरक्षण का मुद्दा गर्माया हुआ है।

आरटीआई कार्यकर्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि उन्होंने 2015 में आरटीआई के माध्यम से यूजीसी से केंद्रीय विवि में एससी/एसटी और ओबीसी वर्ग के शिक्षकों का ब्योरा मांगा था।

आरटीआई (2015) के मुताबिक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल 6107 असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर के पद खाली हैं। इनमें 1135 एससी, 610 एसटी और 1041 ओबीसी कोटे के पद हैं। जबकि शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 16339 हैं।
आरटीआई से खुलासा

सोर्स : अपडेट मार्ट .कॉम 

Monday, 7 March 2016

देश में विरोध , भारतीय विदेशो में मांगते है ब्राह्मण आरक्षण ,देश में ही नहीं भगवा मानसिकता के लोग विदेशो में भी इस जहर को फैलाते है

जन उदय : देश में विरोध , भारतीय विदेशो में मांगते है आरक्षण ,देश में ही नहीं भगवा मानसिकता के लोग विदेशो में भी इस जहर को फैलाते है

कनाडा दुनिया की सभी संस्कृतियो का समावेश , एक खूबसूरत नज़ारा देखने को मिलता है , कनाडा दुनिया का शायद एकमात्र देश है जहां पर दुनिया की सभी हिस्सों के लोग रहते है , सभी भाषा और संस्कृतियो का एक साथ समन्वय और समावेश है
 .
कहने को भारत भी विविधता वाला देश है , यहाँ भी दुनिया के सभी धर्म , प्रजाति के लोग है लेकिन जो आदर सम्मान कनाडा में विदेशी मूल के लोगो को मिलता है वो शायाद कही नहीं . कनाडा में ६९ % लोग विदेशी मूल के है ये एक बहुत बड़ी संख्या है क्योकि ये नज़ारा भी आपको देखने को कही नहीं मिलेगा , लेकिन ऐसा नहीं की इन विदेशी मूल के लोगो को अपने नागरिक हको के लिए लड़ना नहीं पड़ा कोई आन्दोलन नहीं करना पड़ा . यहाँ भी अन्य देशो की तरह सामाजिक आन्दोलन हुए जो लोगो ने अपने हको के लिए लड़े .

कनाडा के सविंधान में इस बात की पूरी कोशिश की गई है की वहा रहने वाले लोग सामान रूप से नागरिक कहे जाए और सामान आदर प्राप्त करे .
सामाजिक उठान के लिए वहा सामान रोजगार अवसर १९९५ में बनाया गया और ये सिर्फ कानून नहीं है बल्कि इसका पालन किया जाता है यहाँ रहने वाले नागरिक चाहे वो चीन से हो अफ्रीका से हो या भारत से हो इस कानून का पूरा लाभ उठाते है और सरकार इस बात की पूरी कोशिस करती है की इस कानून का पालन हो .
कनाडा में रहने वाले भारतीय मूल के लोग इस कानून का पूरा फायदा उठाते है नौकरी में तो है ही इसे साथ साथ राजनीति आदि में भी भारतीयों की पूरी हिस्सेदारी होती है , यही कारण है की इस बार सामान्य चुनाव के बाद कनाडा में पहली बार एक सिख को रक्षा मंत्री बनाया गया है .
लेकिन भारतीय लोगो के चरित्र की एक ख़ास बात समझ नहीं आती की कनाडा और अन्य यूरोपीय देशो में ये लोग अपने लिए आरक्षण की मांग करते है समानता का हक मांगते है लेकिन यही लोग भारत के सन्दर्भ में जातिवादी बन जाते है , धार्मिक रूप से असह्ष्णु बन जाते है मार पिटाई और आतंकवाद पर उतर जाते है . इन्ही भारतीय लोगो की मदद से भारत में कुछ असामाजिक तत्वों ने आतंक मचाया हुआ है , कभी गाय के नाम पर .
भारत में धर्म के नाम पर दंगे कराने वाले केवल ब्राह्मण और बनिए संघठन ही होते है और ये जाती के लोग ही विदेशो में भी भारत की इस सामाजिक बिमारी को फैला रहे है , जिसके कारण इंग्लैंड में जातिविरोधी कानून बनाना पड़ा .
अगर इन लोगो को आरक्षण सामाजिक न्याय से इतना परहेज है तो यही लोग विदेशो में आरक्षण और सामाजिक न्याय की मांग क्यों करते है