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Wednesday, 21 March 2018

SC/ST एक्ट में परिवर्तन कही षड्यंत्र तो नहीं ? महिला उत्पीडन कानून भी खत्म हो


 SC/ST एक्ट में परिवर्तन कही षड्यंत्र तो नहीं ? महिला उत्पीडन कानून भी खत्म हो
देश में अपराधो को कम करने के लिए  सभी लोग कड़े   से कड़े कानून बनाने की बात करते हैं , महिलाओं पर अत्याचार ,बलात्कार रोकने के लिए निर्भया  कानून बना दिया गया तो एस सी और एस टी   उत्पीडन कानून को क्यों  न कडा  किया जाए जब की  गुजरात के उना जैसी  घटनाएं  देश में रोज होती है  कही न कही देश में किसी न किसी  एस सी / एस टी  पर जुल्म होता है जाति  सूचक गाली  तो आम बात है  और उनकी हत्याए  मार पीठ  नियमित  कर्म काण्ड  बन गया है सवर्णों का . हालात यह है की मोदी  काल में  दलित उत्पीडन  के मामलो में ६०० %  से जयादा  वृद्धि  हुई है तो फिर ऐसी  क्या बात है की दलित  उत्पीडन से जुड़े कानून को एक दम कमजोर कर दिया है ?? वह भी यह कह  कर की इसका दुरूपयोग  हो रहा है . जब की ऐसा न के बराबर है .अगर ऐसा है तो हम महिला   कानून को क्यों नहीं खत्म करते ?? जबकि सवर्ण महिलाए  तो इस कानून का जम कर दुरपयोग  करती है ??

जब की दलित तो समाजिक , आर्थिक और शेक्षिक  रूप से काफी पिछड़े  है और इनके पास सिर्फ यह कानून ही एक सहारा था जिसके जरिये वो अपनी लड़ाई   लड़ सकते थे और अब इसको भी छीन लिया गया .
आइये इस कानून की उप्योगियता को इस उधाह्र्ण से समझते ही



1.एक गरीब दलित अपनी फरियाद लेकर तहसील जाता है और वँहा जग्गा ठाकुर नाम का अधिकारी मिलता है, उसे जग्गा ठाकुर फरियाद सुनकर उसे उल्टा एक थप्पड़ मारकर यह कहता है की भाग साले चमार/भँगी के इन्हा से, उसके बाद जब पुलिस में शिकायत होगी तब पुलिस जग्गा ठाकुर को गिरफ्तार करने से पहले जग्गा ठाकुर के अधिकारी जो की पक्का आईएएस, आईपीएस की रैंक का होगा से यह परमिशन लेगी की जग्गा को गिरफ्तार करे या नहीं। अब अगर उच्च अधिकारी भी ठाकुर, श्रीवास्तव, शर्मा, अग्रवाल होगा तो समझ जाए की उस गरीब दलित को एक थप्पड़ और मार दिया जाता तो भी कुछ नहीं होगा।




2.दूसरी व्यवस्था यह की गयी है की जग्गा ठाकुर दलित को सार्वजनिक स्थान पर थप्पड़ बजाता है, जातिसूचक शब्द कहे जाते है, खूब पिटाई की जाती है तो भी भी एफआईआर दर्ज होने के बाद पहले डिप्टी एसपी जांच करेगा, उसके बाद ही केस आगे बढ़ पायेगा। अब डिप्टी एसपी की मानसिकता पर यह निर्भर करेगा की केस दर्ज होना चाहिए या नहीं।

3.तीसरी व्यवस्था यह की गयी की जग्गा ठाकुर दलित को थप्पड़ व गालिया देने के बाद न्यायलय में जाकर अग्रिम जमानत ले सकता है, जिसके बाद आराम से बाहर घूमेगा व जांच को प्रभावित कर सकता है।

अत: अब एससी एसटी एक्ट का कोई औचित्य नहीं रहा ऐ।  चलो मान लिया की दुरूपयोग हो रहा था, लेकिन इसका यह मतलब नही की एक्ट को एक तरह से निष्प्रभावी ही कर दिया जाए।

 इसलिए दलितों को अब समझ लेंना चाहिए की पूजा करने या व्रत रखने के बाद भी हजारो सालो से कोई भगवान बचाने नही आया है आपको अपनी सुरक्षा स्वयं करनी पड़ेगी। इसलिए अब मन्दिर में घण्टा वजाने की जगह, शोषण करने वाले के सर पर घण्टा बजाने का जज्बा लाइये।  तभी एट्रोसिटी कम होगी। नही तो "ओ साले चमार के, ओ साले भँगी के" सुनते रहे।

Saturday, 7 May 2016

दलितों करे ब्राह्मणों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार


जन उदय : दुनिया   चाँद पर पहुच गई लेकिन संघी ब्राह्मणों के दिमाग अभी भी गटर में ही रह्तेहाई ये लोग चाहे जितना भी पढ़ लिख  लिख ले लेकिन लेकिन ये लोग जाहिल ही रहेंगे .

ये ही दुनिया की एक ऐसी जाति है जो जहा   जाते है वही अपनी दिमाग की  गंदगी वहा वहा फैलाते है
हाल ही में कुम्भ में दलितों के लिए अलग स्थान   बनाया और उसका कारण संघी गधे ये बता रहे है ये लोग गंदे होते है

हमारे देश में सामाजिक परिवर्तन की लहर चल पढ़ी  है और इसको आगे जभी  बढाया जा सकता है जब दलित लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से जयादा शक्तिशाली होंगे  और इसके लिए एक सामाजिक स्तर पर दलितों को एक मुहीम चलानी होगी यानी  रोज मर्रा के सारे  सामान  सभी लोग सिर्फ दलितों की दूकान से ही खरीदे , अगर यह सम्भव न हो तो तो सभी लोग पैसा इकट्टा कर थोक में ले आये

इसके अलावा दलित लोगो को सवर्ण लोगो के खेतो  और फक्ट्री में काम नहीं करना चाहिए
ये कुछ लोगो को बढ़ा  अजीब लगेगा  लेकिन एक बार अगर दलित इन ब्राह्मणों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार शुरू कर देंगे तो बाजी जल्द ही दलितों के हाथो में आ जाएगी ,


रही मन्दिरों में और भगवानो की बात तो जिनको जरूरत है वो अपने मंदिर बना ले और खुद ही चढ़ावा  खुद अपने सामाजिक की भलाई के लिए लगाए  या फिर इतनी ताकत रखे अगर कोई इस तरह की हरकत करे की जाति  के नाम से उन्हें मन्दिर में न जाने दे   या जो कुम्भ में हुआ  तो जूता  लेकर उसकी पिटाई  करो


इसके अलावा  दलित इन ब्राह्मणों  से कोई भी सामाजिक  रिश्ता  न रखे  इनके आने पर  थूके  और अपने  पास ही न  आने दे

Thursday, 21 April 2016

सिर्फ गरीब कमजोर को मार कर बहादुर बनते है ब्राह्मणवादी ,असल में इनका इतिहास डरपोक ,देशद्रोह और गद्दारी का है

जन उदय : भारत का पूरा इतिहास उठा कर देख ले वो भी वो जो सच है न की काल्पनिक कहानिया ,सवर्ण ,ब्राह्मणवादी लोग जो बहादुर बनते है और अपनी  बहादुरी गरीब ,कमजोर निहत्थे लोगो को मार कर दिखाते है ये दरअसल एक नम्बर के डरपोक , देशद्रोही और गद्दार रहे है ,

इनकी बहादुरी के किस्से  पृथ्वीराज चोहान  की काल्पनिक कहानियाओ से शुरू होती है जिसमे ये अपने आपको बहादुर बताते है , लेकिन इसका सच यह है की  गौरी ने बिना देर किये चोहान की गर्दन काट दी थी और उसको ले जाकर दीवार में चिनवा  दिया था
इसके बाद मुस्लिम शासको का सिलसिला जारी रहा जिनके चलते  ये बहादुर लोग  उनके दरबारों में नौकरी करने लगे और ब्राह्मणों ने अपना पूरा पूरा साथ मुस्लिम शासको को दिया और उनसे बदले में मांग की वो भी यानी ब्राह्मण भी उनकी तरह विदेशी हमलावर है इसलिए इनको ज़जिया कर से मुक्त किया जाए , और उनसे मांग की  शुद्र उनके गुलाम है  इसलिए इस ताने बाने को बना रहने दिया जाए . सो मुस्लिम शासको को इस बात से कोई सरोकार न था इसलिए उन्होंने समाज के इस ताने बाने पर कोई ध्यान न दिया  , इसकी एक वजह यह भी रही की ये ब्राह्मण और अन्य सवर्ण मुस्लिम  राजाओं को  मनोरंजन और शादी के लिए अपनी समाज की और परिवार की लडकियो को पेश करते थे .

और यह सिलसिला फिर सैंकड़ो साल चलता रहा हर म्सुलिम शासक , मुग़ल शशक के दरबार में  ब्राह्मण और अन्य स्वर्ण मजे करते रहे मानसिंह ,  पुरनिया पंडित ऐसे   हजारो नाम है

एक नाम और आता है राणा प्रताप का मुग़ल काल में जिसे  ब्राह्मण और जातिवादी लोग बहुत बहादुर बताते है यहाँ तक की उसके घोड़े को भी महान बताते है ,जब असल में यह हुआ की एक हिन्दू  यानी मानसिंह को अकबर ने भेजा और यह बहादुर  डर कर जंगलो में छिप  गया और जब तक बहार नहीं आया जब अकबर ने मेवाड़ की तरह ध्यान देना छोड़ दिया , और राणा आकर   चार सैनको को मार कर   वहा शासन करने लगा

अंग्रेजो के आने के बाद ब्राह्मण इनके भी समीप रहे  और शासन करने में इनकी मदद करते रहे  मात्र  ६५ हजार अंग्रेज  ४० करोड़ से जयादा की जनसंख्या वाले इस देश  पर शासन इसलिए करते रहे क्योकि यहाँ केलोग यानी ब्राह्मण और स्वर्ण इनके साथ थे , पुलिस , प्रशासन , आदि में  १७ आई सी एस अफसरों में  हर बार  १६   अफसर  ब्राह्मण ही होते   थे , और बाकी जातिओ के लोग सेना  और अन्य सेवा में


ब्राह्मण देश देश चिल्लाते  रहे लेकिन देश के नाम पर देश को ये आजादी के नाम पर भी ठगते  आ रहे है ,जातिके नाम पर हर साल हजारो कत्ल , बलात्कार  ये लोग करते है , आदिवासिओ का जीना मुस्ल्किल  किया हुआ है



सरकार कानून इनके लिए कुछ भी नहीं ये सिर्फ आतंक फैला  रहे है अपना और वो भी सिर्फ उन्ही लोगो को मारते है जहा पर दलित लोग कमजोर और  गरीब  है अनपढ़ है , गरीबो की जमीने छीन ले रहे है ,टोला  बथानी ,  और ऐसी  हजारो घटनाए है अहा पर पुरे के पुरे गाव दलितों के जला दिए गए लेकिन कोई सुनवाई  नहीं 

Saturday, 26 March 2016

जानिये क्यों नहीं कामयाब होंगे दलित आन्दोलन : रहेगी ऐसी ही स्थिति हमेशा

 जन उदय : हाल ही में रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या ने पुरे देश को ही नहीं पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है , पूरी दुनिया में इसका विरोध चल रहा है , लेकिन सरकार रोहित वेमुल को  न्याय देना  तो दूर  बल्कि और भी जयादा दमनकारी  रवेय्या  अपना रही है ,  आंदोलनकारी   छात्रो पर जितना हो सके उतनी  क्रूरता  से प्रहार कर रही है  , कानून क्या है  सविंधान क्या है  न्याय क्या है सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है  उसका एक ही उदेश्य है दलित छात्रो  को और दलित बुधिजीविओ  को भयभीत कर देना  , डरा  देना   ताकि वो इस आन्दोलन में किसी  भी तरह से शामिल न हो पाए !

इतिहास गवाह है  जब जब  जनता  ने विद्रोह किया है शासन ने इसी तरह से उनका दमन किया है  और अंत में जीत जनता की हुई है , लेकिन यहाँ दलित आन्दोलन में कुछ पेच है जिनकी वजह से दलित छात्र  या आन्दोलनकारी हमेशा मरते  रहेंगे , पिटते  रहेंगे  लेकिन कोई उनकी वजा नहीं सुनेगा


जिसके मुख्य कारण यह है  ,

दलित आन्दोलन या दलित पुरे देश में एक नहीं है  इनकी मानसिक शक्ति का बिखराव बहुत है  थोडा बहुत भी जो दलित चेतन हो जाता है या तो वह ब्राह्मणों की तरह ही अपने समुदाय से भेदभाव करने लग  जाता है या  उनसे पूरा अलग हो जाता है और ऐसी मानवता की बात करने लग जाता है जो  प्रभुतत्व  वर्ग यानी ब्राह्मण इन्हें सिखाता है  , यानी वह खुद अपनी कौम की जड़े काटने लग जाता है

दूसरा ऐसे भी दलित है जो अपना जीवन संघर्ष  दलितों के नाम से शुरू करते है और दलितों के नाम पर  खाते कमाते है  लेकिन जैसे ही इन दलित नेताओं की शक्ति काफी बढ़ने लग जाती है वैसे ही दमनकारी लोग इन्हें अपनी गोद  में बिठा लेते है यानी इन्हें पैसे , सत्ता  या कुर्सी का लालच दे कर अपने साथ मिला लेते है  इनमे से उदित राज ,मीरा कुमार , कृष्णा तीर्थ , शैलजा , जगजीवन  राम  आदि सभी लोगो ने   अपने स्वार्थ के लिए दलितों की बली चडाई  है .
इन लोगो की सबसे बड़ी बात यह है की ये लोग अपनी कौम की भलाई तो नहीं कर पाते हाँ इनका सर्वनाश करने  में लग जाते है , हाल ही में रोहित वेमुला को लेकर उदित राज , पुनिया आदि के रवैया ने ये ही दरसाया है


इतनी बड़ी शक्ति दलित फिर भी कमजोर   संघटित क्यों नहीं
आज जितने भी दलित उपर आये है पढ़ लिख गए है ये उन सबकी जिम्मेदारी बनती है की वो अपने समाज के लोगो को संघटित  करे और उन्हें एक प्लेटफोर्म पर लाये लेकिन ऐसा नहीं हो पा  रहा  है कारण अपने अपने स्वार्थो के लिए  जी रहे है ये लोग , न जाने दलितों के नाम पर कितनी पार्टी  , कितने दल है  जो दलितों को एकता और समानता के नाम पर बेवकूफ बनाते है  लेकिन फिर भी इन्हें एक मंच पर नहीं ला पाते  यह सबसे बढ़ा कारण है

 इसमें एक बड़ा कारण यह भी है की ये खुद बाबा साहेब या दलितों के नाम की राजनीती करते है ये खुद बाबा साहेब की आदर्शो पर नहीं चलते खुद की जेब में पैसा आ गया  , पढ़ लिख गए अब ये ब्राह्मण , बनिए बन जाते है , समाज में ब्याह शादियो में समस्त सामाजिक कुरितियो के साथ पेश आते है बल्कि ये इन कुरूतियो को आगे बढ़ाना  अपना फर्ज समझते है

दुश्मन के षड्यंत्र :  अन्य पार्टिया यह तो चाहती ही है जिसके पीछे दलित वोट बैंक आ जाय  या हो वो उनकी शरण में आ जाए इसके लिए पैसा ,  ताकत सब लगा देते है ,मीडिया का रुख हमेश से दलितों के विरुद्ध रहा है  रोहित वेमुला की हत्या और यूनिवर्सिटी में पुलिस द्वारा  छात्रो की पिटाई  और दमन कही नहीं छिपे है लेकिन इनको न तो मीडिया दिखा रहा है और न ही बता रहा है , लेकिन यह सच में हो सकता है ?? 

अगर एक बार देश के सारे दलित बुद्धिजीवी  और नेता , पार्टी  सांसद , अफसर दिल्ली की सडको पर सामने आ जाए तो क्या  रोहित को  न्याय नहीं मिल पायेगा ??  मिलेगा जरूर मिलेगा 

लेकिन ऐसा नहीं हो पायेगा  कारण  कौम के दलाल बहुत है , गद्दार बहुत है , पीछे से टांग खीचने वाले लोग बहुत है

याद रहे  जब किसी ब्राह्मण को कुछ हो जाता है तब ये लोग मानवता की बाते करते है इंसानियत की बाते करते है और पुरे देश को अपने साथ गुमराह करके अपने साथ ले आते है  लेकिन दलितों का तो दुःख भी सच्चा ,  उनकी पीड़ा सच्ची  लेकिन फिर भी ये लोग आपके साथ नहीं  है , ज़रा बगल में बैठे दोस्त से पूछना  की क्या वो दलितों के लिए , रोहित वेमुला के लिए लडेगा  , वो नहीं आएय्गा  , मूह पर कह कर चला जाएगा  , लेकिन इसके बाद आपका विरोध करेगा  वो भी छुप छुप के

लेकिन  कसूर इनका नहीं दलितों का  है क्योकि  ये ही दुकानदार हो गए है , तिलक लगा रहे है और कौम को बेच  रहे है 

Tuesday, 22 March 2016

होली है ब्राह्मणों की दलितों पर विजय और गुलामी का जश्न


क्यों मनायें हम अपने ही लोगों की ह्त्या का जश्न. होलिका मेरी ही तरह बहुजन थी, मूल निवासी थी. वह असुर कन्या थी , जिसे वैष्णव आर्यों ने मारा, ज़िंदा जला दिया, फिर हम उसे जलाये जाने का जश्न हर वर्ष क्यों मनायें’, यह कहना है औरंगाबाद ( बिहार ) की शिक्षिका बेबी सिन्हा का. बेबी सिन्हा वीरांगना होलिका शाहदत दिवस में शामिल होने आये थीं. वे स्त्रियों को संगठित कर होलिका दहन के खिलाफ मुहीम चलाना चाहती हैं.

20 मार्च को सम्राट अशोक विजय चौक स्थित महाराजा सयाजीराव गायकवाड सभागार में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ की ओर से होलिका शाहदत दिवस मनाया गया. होलिका शहादत दिवस का आयोजन उन आयोजनों में से एक है , जो देश भर में गैर –ब्राह्मण जातियां और जनजाति समूह ब्राह्मणवादी संस्कृति का विरोध करते हुए अपनी संस्कृति की खोज और स्थापना के लिए मना रही हैं. हाल में बजट सत्र में संसद के दोनो सदनों में एन डी ए की मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्याल में ‘महिषासुर शहादत दिवस’ मनाये जाने पर काफी हंगामेदार हमला किया था. ईरानी या तो खुद होमवर्क करके नहीं गई थीं या देश भर में बहुजन परम्परा की पुनर्स्थापना के प्रयासों को जानबूझकर निशाना बना रही थीं. देशभर में ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ के साथ त्योहारों के नये स्वरुप बन रहे हैं , औरंगाबाद जिले में पिछले पांच साल से मनाया जाने वाला ‘ वीरांगना होलिका शाहदत दिवस’ उसी कड़ी का हिस्सा है .



20 मार्च को ‘वीरांगना होलिका शहादत दिवस’ के अवसर पर ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की गई. वक्ताओं ने कहा कि ‘ मूलनिवासियों की संस्कृति, उनके पर्वों –त्योहारों का ब्राह्मणीकरण किया गया है.’ औरंगाबाद के जिला मुख्यालय में मनाये जाने के पहले ‘ वीरांगना होलिका शहादत दिवस’  का आयोजन 13 मार्च को होलिका नगर महिषासुर चौक ( चिल्ह्की मोड़ ) अम्बा में किया गया. यहाँ भी आयोजन में राष्ट्रीय मूल निवासी बुद्धिजीवी संघ के अलावा आम्बेडकर चेतना परिषद् की सहभागिता थी. 13 मार्च के आयोजन में भी ‘मूल निवासी संस्कृति : पर्व एवं पूर्वज’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई.

बहुजन विचारक विजय कुमार त्रिशरण ने इस विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि ' मूल निवासी प्रकृति की पूजा करते थे , उनका मौसम आधारित , फसल आधारित पर्व था. ब्राह्मणवादियों ने होलिका की ह्त्या करके उसे हमारे पर्व पर प्रतिस्थापित कर दिया. और अपनी खुशी भी मूलनिवासियों पर प्रतिष्स्थापित कर दी. इसलिए 'होलिका दहन' भी मूलनिवासियों पर थोपा गया पर्व है .'

 ब्राह्मणवादी मिथकों के पुनर्पाठ और लोकमिथों के समन्वय से आयोजकों ने ‘ होलिका दहन’ का अपना आख्यान भी पेश किया है. जिसके अनुसार ‘ राजा बली के पिता का नाम विरोचन था, विरोचन के पिता का नाम प्रहलाद था, प्रहलाद के पिता का नाम हिरण्यकश्यप था. हिरण्यकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका थी . वीर और युवा होलिका आर्यों के खिलाफ हिरण्यकश्यप के सामान ही लडती थी. वह अविवाहित थी . हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को आर्यों ने अपने साथ मिला लिया था, वह आर्यों का भक्त ( दास) बन गया था. राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को बस्ती से बाहर रहने का आदेश दे दिया था. पुत्रमोह के कारण प्रहलाद की माँ अपनी ननद होलिका से उसके लिए भोजन भिजवा दिया करती थी, एक दिन होलिका शाम के समय जब उसे भोजन देने गई तो आर्यों ने उसके साथ बदसलूकी की और उसे जलाकर मार डाला. सुबह जब होलिका घर न पहुँची तो राजा को बताया गया . राजा ने पता लगवाया तो मालूम हुआ कि शाम को होलिका आर्यों की ओर प्रहलाद के लिए खाना लेकर गई थी, लेकिन वापस नहीं आई. तब राजा ने उस क्षेत्र के आर्यों को पकडवाकर उनके मुंह पर कालिख पुतवाकर माथे पर कटार या तलवार से चिह्न बनवा दिया और घोषित करवा दिया कि ये कायर लोग हैं . ‘ वीर’ शब्द का अर्थ है , बहादुर या बलवान. वीर के आगे अ लगाने पर ‘ अवीर’ हो जाता है , जिसका अर्थ होता है , कायर. होली के दिन माथे पर जो लोग लाल –हरा पीला रंग लगाते हैं , उसे ‘अवीर’ कहते हैं , यह कायरता का चिह्न है .’


साभार  : स्त्रीकाल  

Monday, 7 March 2016

रोहित वेमुला की हत्या ध्यान हटाने के लिए रचाया जे एन यु का स्वांग ,संघ ने : ब्राह्मण शासन है अंतिम लक्ष्य

देश में हो  रही दलित  हत्याए आदिवासिओ की हत्याए  लगातार हो  रही है और बाकायदा इनकी संख्या  लगातार बढती जा रही  है , उड़ीसा से लेकर मध्य प्रदेश , छतीसगढ़ ,महारष्ट्र में कोंग्रेस  बी जे पी दोनों एक साथ मिल कर आदिवासी हत्याओं में शामिल है ,

ये बात जानकार सबको हैरानी होगी की दलित हत्या के मामले में ये दोनों दल एक है , एकमत है


फिलहाल ही  एक आदिवासी महिला सोनी सोरी के मूह पर तेज़ाब फेंका गया  इससे  पहले  उसके निजी अंग में पथ्तर  भर दिए थे पुलिस वालो ने , इस कार्य की वजह से उन पुलिस वालो को राष्ट्रपति का वीरता पुरूस्कार भी मिला था
 दलित हत्या के क्रम में संघियो ने धीरे धीरे उन सस्न्थाओ को और उन छात्रो को निशाना बनाना शुरू किया किया  जहा पर दलित छात्र उनके उपर हो  रहे है जुल्मो के खिलाफ आवाज उठाते है ,

और इस प्रक्रिया में  दक्षिण भारत को चुना गया और  वहा पर आई आई टी मद्रास  को सबसे पहले निशाना  बनाया गया  जहा पर बीफ को लेकर संघियो ने उन्माद मचाया  और दलित छात्रो को प्रताड़ित किया गया .

इसके बाद हैदराबाद  केन्द्रीय विश्विद्यालय  को चुना गया  जहा पर झूटा इल्जाम लगा कर रोहित वेमुला और  अन्य  छात्रो को  जबरदस्ती  होस्टल से निकाला गया  और  ये  छात्र सडक पर रात बिताने के लिए मजबूर किया गया , इसके साथ साथ इनकी स्कोलरशिप भी रोक दी  गयी यानी की मानसिक , आर्थिक और शारीरक तीनो तरह से इनको प्रताड़ित  किया गया ,  हैदराबाद केन्द्रीय  विश्वविध्यालय के इस दलित आन्दोलन  का अंत रोहत वेमुला की संस्थानिक हत्या से हुआ जिसका पुरे देश में ही नहीं दुनिया में विरोध होने लगा  सारे देश  की भावना रोहित और उसके परिवार से जुड़  गुई  संघियो को लगा जैसे ये उनकी एक राजनेतिक हार है  रोहित के मामले को दबाने के लिए एक नया षड्यंत्र  रचा गया और ये  षड्यंत्र जे एन यु षड्यंत्र के नाम से जाना गया जहा पर  संघियो ने पूरी प्लानिंग के साथ अपने ही लोगो से देश विरोधी नारे लगवाये और पुलिस  और मीडिया की मदद से जे एन यु छात्रो को गिरफ्तार  करवाया गया वो भी देशद्रोह के आरोप में

इन छात्रो की भी गलती यही  थी की ये भी ब्राह्मणवाद , सामन्तवाद , जातिवाद के खिलाफ नारे लगाते थे , जे एन यु की घटना के जरिये  संघियो/ भाजपा  ने  पुरे देश का ध्यान दलितों  के उपर हो  रहे अत्याचार से हटाने की एक नाकाम कोशिस  की जो की हो नहीं पाया



घटना सिर्फ ये नहीं  है  इतिहास में भाजपा / संघ इसी तरह के कार्यो में लिप्त रहे है