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Saturday, 30 December 2017

भारत में नहीं थी जाति मेगास्थनीज़ की पुस्तक इंडिका से खुलासा :

 जन उदय : भारत में जातिवाद पूर्ण रूप से  ब्राह्मणों के षड्यंत्र के रूप में विकसित हुई  क्योकि इसका विवरण भारत के पोरानिक  इतिहास में कही नहीं मिलता  बल्कि  इसका  प्रमाण ब्राह्मण अपने ग्रंथो में जो दिखाते  है वह तकनिकी  और वैज्ञानिक  रूप से बोगस  है और झूट है  . अपने आपको  सर्व्श्रेस्थ और भगवान् का प्रतिनिधि बना कर पेश करना और सबसे ज्यादा अधिकार अपने पास रखना  और धार्मिक  ग्रंथो की रचना कर उनके माध्यम से अपने आपको   सभी लोगो पर अत्याचार करने का अधिकार खुद को ले लेना  ये सब  षड्यंत्र के रूप में ही सामने आये  इनके द्वारा लिखे गए रामायण , महाभारत झूठे और काल्पनिक  ग्रन्थ है

अब सवाल आता है भारत में एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रान्तियो के बारे में यानी रामायण और महाभारत कभी इस देश में हुए या नहीं या ये सिर्फ कोरी कल्पना है , इतिहास ने भी विज्ञान के नियमो को अपनाया है और इतिहास
का लेखन वास्तुनिष्ट सामग्री पर लेखन के लिए ही जो डाला गया है , और जब हम वास्तुनिष्ट सबूतों या सामग्री की बात करते है तो उस पर रामायण और महाभारत खरी नहीं उतरती , आइये देखे कैसे
कहानी रामयाण और महाभारत एक एपिक की तरह लिखे गए ज्सिका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक राजनितिक षड्यंत्र तय्यार करना था जिसका पहला उधाह्र्ण है


1.कोई भी वास्तु /शिल्प सबूत नहीं : हर राजा , महाराजा , अपने लिए महल बनवाता है , भवन बनवाता है , बाग़ बगीचे बनवाता है और इन इमारतो को वह कुछ ख़ास तरीके से बनवाता है यानी हम अगर सम्राट अशोक का इतिहास देखे तो हमें सभी प्रकार के सबूत मिलते है वास्तु भी शिल्प भी लेकिन रामायण और महाभारत के इन अभिनेताओं का कुछ भी नहीं मिलता , कुछ संघटनो का कहना है की मंदिर मिले है भगवान् के तो कोई इनसे पूछे क्या भगवान् इन्हों मंदिरों से शासन करते थे ??

2 . हर शासक , राजा , महाराजा अपने शासन काल में अपने सिक्के यानी व्यापार के लिए सिक्के ,मुद्रा चलवाता है , जो निश्चित तोर पर उसकी सीमा और विदेश सीमा यानी उसके शासन के बाहर भी खुदाई में मिलते है लेकिन रामायण , महाभारत काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता
३. विदेशो से सम्बन्ध एक राजा के लिए बड़े जरूरी होते है , युद्ध भी होते है संधिया भी होती है लेकिन इन दोनों काल के यानी रामायण और महाभारत काल का ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिलता
४. विदेशो से व्यापार , यात्रिओ के लिए धर्मशाला , सुरक्षा वाव्य्स्था बाग़ बगीचे , सराय ये सब भी रहा बनवाता है लेकिन इन दोनों काल का कुछ भी नहीं मिलता

५. संस्कृति कला ,किसी भी इतिहास में या शासन में अपनी कला और संस्कृति जन्म लेती है , लेखक ,कवी आदि जन्म लेते है लेकिन न तो किताबो के स्तर पर कुछ भी नहीं मिलता , शिल्प , पेंटिंग , नक्काशी , वाल राइटिंग, वाल कार्विंग , भित्ति चित्र आदि इस काल का कुछ भी नहीं मिलता 

६. कालखंड . सबसे बड़ी बात होती है कि कोई भी घटना किसी कालखंड में ही होती है यानी उसका अपना एक समय होता है लेकिन इन ग्रंथो का कोई भी कालखंड नहीं है कहने को तो हर धार्मिक संघठन अपनी अपनी दलील देता रहता है , कोई कुछ काल बताता है तो कोई कुछ
इसके अलावा जो ग्रन्थ या किताबे मिली है उनकी भी कार्बन डेटिंग से कोई सबूत नहीं मिलता की ये ग्रन्थ बहुत पुराने है बल्कि इसमें भी घपला है
सो विज्ञान धारणा या कल्पना से शुरू हो सकता है लेकिन हमने उड़ने की कल्पना की लेकिन उड़े कैसे ? इसलिए विज्ञानिक कोई भी तत्थ्य आज तक नहीं है और न ही आयगा
खैर यहाँ पर बात चल रही है  जातिवाद की तो हम यहाँ पर किसी भारतीय ग्रन्थ के माध्यम से नहीं बल्कि एक विदेशी  सैलानी  मेगास्थिज़ के माध्यम से ही सम्झंगे की भारत में जातिवाद  या जाति का अस्तितिव  ही नहीं था
मेगस्थनीज (Megasthenes, 350 ईसापूर्व - 290 ईसा पूर्व) यूनान का एक राजदूत था जो चन्द्रगुप्त के दरबार में आया था। यूनानी सामंत सिल्यूकस भारत में फिर राज्यविस्तार की इच्छा से 305 ई. पू. भारत पर आक्रमण किया था किंतु उसे संधि करने पर विवश होना पड़ा था। संधि के अनुसार मेगस्थनीज नाम का राजदूत चंद्रगुप्त के दरबार में आया था। वह कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। उसने जो कुछ भारत में देखा, उसका वर्णन उसने "इंडिका" नामक पुस्तक में किया है।

इंडिका में मेगास्थिज़  ने भारत में यानी चन्द्रगुप्त के समय में समाज में सात वर्ग बताये  यह बात ध्यान में रहे  मेगास्थिज़ ने सात वर्ग की बात की है , की जाति की  इसमें  उसने एक पुरोहित  वर्ग बताया जो  लोगो को पूजा कराता  था  और लोगो के पैसे से या समान से अपना जीवन चलाता था   लेकिन वह सबसे उपर  था ऐसा बिलकुल नहीं था , बल्कि इसको कार्य करने से रोका जा सकता  था और वही आदमी फिर समान्य वग में आ जाता था
दूसरा वर्ग किसान का था   जो खेती  करते थे , तीसरा  ग्वाले , का था जो लोग भेड़  बकरिया  चराते थे चोथा वर्ग दुकानदार  और शिल्पकारो  का था जो दूकान चलाते  थे   ये लोग टेक्स पे करते  थे 
पांचवा वर्ग सैनिको  का था  और सबसे बड़े और इज्जतदार  लोग यही होते  थे  ये लोग युद्ध करते  थे और शांतिकाल में आराम करते  थे 

छटा वर्ग   सुपरवाइजर  का था जो देश समाज में हो रहे हर काम पर निगरानी रखते थे  और इन कामो  के बारे में राजा को जानकारी   देते थे .
सातवा  और अंतिम   वर्ग  मंत्रियो का था जो राज्य से सम्बन्धित  हर कार्य में राजा से मंत्रणा  करते  थे और नीतिया  बनाते थे . मेग्स्थिज़  ने एक ही  परिवार  और वंश में पैदा  हुए लोगो को हर तरह के काम करते  देखा  यानी कोई भी  वेग निश्चित  और स्थाई  नहीं था बल्कि योग्यता के अनुसार  अपने वव्साय को चुन सकते  थे
अब चूँकि  मेगास्थिज़  ३००  बी सी में  था  और जाति  नहीं थी  तो  ब्राह्मण  कैसे कामयाब हो गए इस तरह के समाज का निर्माण  करने में

वैज्ञानिक  रूप से यह बात प्रमाणित  है की ब्राह्मण  विदेशो  से आय  कार्य  घुमन्तु   लोग थे और यहाँ आकर   इन्होने शरण मांगी  जो इन्हें दे दी गई
इन्होने कई बार इस देश और समाज से गद्दारी करने की कोश्सी  की लेकिन ये लोग कामयाब १८० बी सी में हो गए परशुराम / पुष्यमित्र शुंग इसे ब्राह्मण भगवान् भी मानते है क्योकि इसने  मौर्य सम्राज्य को धोखे से समाप्त कर ब्राह्मण शासन स्थापित  किया इसके अशोक के पोते व्रह्द्स्थ को धोखे से मार दिया था और लाखो  बौध  लोगो की ह्त्या की  और चोरासी  हजार  बौध विहारों को तोड़  मंदिरों में बदल दिया यह बात सनद  रहे कि  इससे पहले मंदिर  नहीं थे  लेकिन लोगो  के कुल देवी देवताओं के पूजा गृह थे

इसके बाद इन्होने इन्होने जातिवाद  यानी अपने आपको सव्र्श्रेस्थ रखने के लिए ऐसे ग्रंथो की रचना की जिनके जरिये देश में असमानता  , बर्बरता , आज भी बरकरार  है , और इसी कारण  देश का सबसे बड़ा वर्ग तरक्की नहीं कर पाया शिक्षित नहीं हो पाया और यही कारण देश की बदहाली  के कारण ये ही लोग है

Megasthene  traveler visited India during the reign of Chandergupta , his account book Indika  revealed  that there was no caste system in India instead  seven class of workers  were there .
Later on caste was created by the Brahman / Aryan Invaders as a part of conspiracy against the aboriginals along with Ramayan , Mahbharat , Manusimriti  and other fake scriptures .

Carbon dating of these books has confirmed   these books age and are not ancient book but were written during the 180 BC to 230 AD 

अम्बेडकर की फोटो लगाने की नौटंकी जबकि दलितों की हत्या , बलात्कार लगातार हो रहे है यु पी में

अम्बेडकर  की फोटो लगाने की नौटंकी जबकि  दलितों की हत्या  , बलात्कार लगातार हो रहे है  यु पी में
जन उदय : वैसे तो पुरे देश में भारत के मूलनिवासी  जिन्हें दलित भी कहा जाता है उनका जातीय  हिंसा और उत्पीडन से बुरा हाल है रोहित वेमुला , जीशा , डेल्टा  मेघवाल ,उना काण्ड , अख़लाक़  काण्ड हुए  है और ऐसे ही रोज हो रहे है लेकिन  भाजपा शासित  राज्यों में ब्राह्मण आतंकवाद  जिसे भगवा आतंकवाद भी कहा जाता है वह इस कद्र  बढ़  रहा है की लोग सांस  नहीं ले पा रहे .

उत्तर प्रदेश में जबसे  ई वी एम् घोटाले से बनी सरकार  आई है तब से जातीय  नरसंहार  जोरो पर रोज हत्या  बलात्कार  हो रहे है  और सहारनपुर की जातीय हिंसा और    ऐसी घटना है   जिनसे पुरे विश्व को हला कर  रख दिया है  पूरी दनिया के मानवाधिकार संघठन  भी हिल गए है . क्योकि  इसमें योगी सरकार ने   ठाकुरों  को पोलिस    का साथ दे कर राज्य के चमारो  पर हमले करवाए   उनकी हत्याए की  और उनके घर लुटे

कमाल की बता की  ठाकरो पर कार्यवाही करने की जगह दलितों को ही  जेल में डाल दिया गया और उनकी जमानत  तक नहीं होने दी जा रही ई  भीम आर्मी के चीफ  चंदर शेखर  को एल में ही मारने की साजिश  रची जा रही है


 “””” सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा का सचजाकिर चौधरी

उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा की सरकार आई है तब से ऐसा लगता है जैसे सहारनपुर क्षेत्र को किसी की नज़र लग गयी हो। कुछ दिन पहले चिलकाना में सैनी समाज के कुछ उपद्रवी लोगों ने  दलितों पर हमला बोला। होली के अवसर पर राजपूतों और दलितों के बीच झगड़े की खबर आई थी। ताज़ा घटना को ध्यान में रखें तो सहारनपुर के ग्राम शब्बीरपुर में दलित, बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा लगाना चाह रहे थे। इस स्थान पर क़ानूनी तौर पर अधिकार दलितों का ही है। इस गाँव के राजपूतों को दलितों द्वारा अम्बेडकर की प्रतिमा को लगाने तथा प्रतिमा का चबूतरा ज़्यादा ऊंचा बनवाए जाने से आपत्ति थी। इस कार्य को राजपूतों ने रुकवा दिया। दलितों में सहमति बनी कि इस कार्य को प्रशासन की अनुमति लेने के बाद ही शुरू कराया जाये। इसलिए कार्य वहीं  ठप्प हो गया।

इसके कुछ दिन बाद राजपूतों ने बिना अनुमति के महाराणा प्रताप के जन्मदिन यानि 9 मई को शौर्य दिवसका जूलुस निकाला। शौर्य दिवस मनाने की अनुमति तो प्रशासन ने एक पार्क में दी थी लेकिन जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी क्यूंकि कहीं न कहीं प्रशासन को भी किसी अनुचित घटना घटित हो सकने का अंदेशा था। शौर्य दिवस मनाने के लिया हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के राजपूत समुदाय के लोग इकठ्ठा हुए थे. गैरकानूनी ढंग से जलूस निकालने के बाद राजपूत समुदाय के लोगों ने संत रविदास के मंदिर के सामने ऊँची और तेज़ आवाज़ में गाने बजाये। शोर शराबे पर जब दलितों ने आपत्ति जताई तो कहासुनी और झड़प हुई। उसके फलस्वरूप राजपूत समुदाय के लोगों ने संत रविदास मंदिर के अन्दर जाकर संत रविदास की प्रतिमा को क्षति पहुंचाई। इन सभी हरकतों और घटनाओं से आप अंदाजा लगा सकते है कि किस तरह से राजपूत समुदाय के लोग दलितों को डराने और उकसाने का प्रयास कर रहे थे।


इसी बीच जब झुण्ड का एक व्यक्ति प्रतिमा को तोड़कर मंदिर से बाहर आ रहा था तभी वह अचानक से चक्कर खाकर ज़मीन में गिरा और उसकी मृत्यु हो गई। यह बात पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट में भी साबित हुई कि उस व्यक्ति की मृत्यु स्वतः हुई और उसके शरीर पर किसी भी प्रकार की चोट का कोई निशान नहीं पाया गया है।

एक स्थानीय निवासी के अनुसार झड़प शुरू होने के थोड़ी देर बाद लगभग दो हज़ार राजपूत इकठ्ठा हो गए। राजपूत समुदाय के लोग फ़ोन पर फ़ोन किये जा रहे थे और सभी लोग लाठी, तलवार और अन्य हथियारों से लैस थे। उनहोंने शब्बीरपुर के गरीब, असहाय और निहत्थे दलितों पर धावा बोल दिया और लगभग 30 घरों को जलाकर नष्ट कर दिया। इसी बीच दलितो में हाहाकार मच गया और वह किसी तरह अपनी जान बचा कर सुरक्षित स्थानों पर भागे। राजपूत समुदाय की जो भीड़ दलितों पर आक्रमण कर रही थी उसमें लोग जय राजपूतानाके नारे लगा रहे थे साथ ही साथ यह भी कह रहे थे कि जय भीम नहीं जय राजपूताना बोलना होगा।””””

 अब  चुकी  हर जगह दलितों  की  अनदेखी  की जा रही है   नौकरी में ब्राह्मण आयोग बना  सिर्फ ब्राह्मणों  को ही भारती इया जा रहा है  नर्सिंग घोटाला सामने आया है जिसमे ३ अंक और ८ अंक पाने वाले ब्राह्मणों  को  नौकरी  दी गई जबकि ५० अंक पाने वाले   दलितों  को नहीं  मिली

जब से भाजपा सरकार में आई है तब से गैर ब्राह्मणों  पर आतंक  की तलवार लटकी हुई  है
अब योगी ने एक सगुफा छोड़ा  है की  हर सरकारी  दफ्तर में अम्बेडकर  की मूर्ति लगेगी  यह ब्यान  अंत कुमार  हेगड़े  एक ब्राह्मण आतंकवादी के जिसने यह कहा था हम आये ही सविंधान बदलने है

वैसे भी अम्बेडकर की मूर्ति या तस्वीर लगाने से क्या होगा , एक तरफ  आप तस्वीर लगायंगे  दूसरी तरफ  दलितों की हत्या   और उनके हको  को छिनेंगे  इसे दोग्लापंती  कहते है    भाजपा और आर्य आतंकवादियो  का यह  डरपोक वाला ब्यान है ,  दरसल  ब्राह्मण  और  उसके समर्थक  विदेशी आतंकवादी  है जिन्हें जब तक देश से निकाला  नहीं जाएगा तब तक इस देश का भला नहीं होगा

After genocide of dlit in saharanpur , up yogi govt order to keep ambedkar photo in every govt office
Saharanpur  or any other place yogi  is the mastermind of saharanpur  caste riot wherein he permitted supported  the thakurs 


Wednesday, 27 December 2017

भारत का नैतिक पतन और ब्राह्मणवाद : संजय झोटे


भारत का दार्शनिक और नैतिक पतन आश्चर्यचकित करता है. भारतीय दर्शन के आदिपुरुषों को देखें तो लगता है कि उन्होंने ठीक वहीं से शुरुआत की थी जहां आधुनिक पश्चिमी दर्शन ने अपनी यात्रा समाप्त की है. हालाँकि इसे पश्चिमी दर्शन की समाप्ति नहीं बल्कि अभी तक का शिखर कहना ज्यादा ठीक होगा. कपिल कणाद और पतंजली भी एक नास्तिक दर्शन की भाषा में आरंभ करते हैं, महावीर की परम्परा भी इश्वर को नकारती है. इन सबसे आगे निकलते हुए बुद्ध न सिर्फ इश्वर या ब्रह्म को बल्कि स्वयं आत्मा को भी निरस्त कर देते हैं. एक गहरे नास्तिक या निरीश्वरवादी वातावरण में भारत सैकड़ों साल तक प्रगति करता है. लेकिन वेदान्त के उभार के बाद भारत का जो पतन शुरू होता है तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है.

पश्चिम में आधुनिक समय में खासकर पुनर्जागरण के बाद जो दर्शन मजबूत हुए या शिखर पर पहुंचे हैं और जिन्होंने विज्ञान, तकनीक, लोकतंत्र आदि को संभव बनाया है वे भी ईश्वर और आत्मा को नकारते हैं. कपिल, कणाद और बुद्ध की तरह वे भी एक सृष्टिकर्ता और सृष्टि के कांसेप्ट को नकारते हैं और प्रकृति या सब्सटेंस को ही महत्व देते हैं. इसके बाद चेतना, रीजन और विलको अपनी खोजों और विश्लेषण का आधार बनाते हैं.

ये मजेदार बात है. भारत के प्राचीन दार्शनिकों ने जहां से शुरू किया था वहां आज का पश्चिमी दर्शन पहुँच रहा है. लेकिन भारत में उस तरह का विज्ञान और सभ्यता या नैतिकता नहीं पैदा हो सकी जो आज पश्चिम ने पैदा की है. ये एक भयानक और चकरा देने वाली सच्चाई है.

इसका एक ही कारण नजर आता है. प्राचीन भारतीय दार्शनिकों की स्थापनाओं को सामाजिक और राजनीतिक आधार नहीं मिल पाया. उनकी शिक्षाओं को institutionalise नहीं किया जा सका, किसी संस्थागत ढाँचे में (सामाजिक या राजनीतिक) में नहीं बांधा जा सका. कुछ प्रयास हुए भी अशोक या चन्द्रगुप्त के काल में लेकिन वे भी ब्राह्मणी षड्यंत्रों की बलि चढ़ गये. कपिल, कणाद महावीर या बुद्ध से आ रहा एक ख़ास किस्म का भौतिकवाद और इस भौतिकवाद पर खड़ी नैतिकता भारतीय समाज और राजनीति का केंद्र नहीं बन पाई. बाद के आस्तिक दर्शनों और वेदान्त ने इश्वर-आत्मा-पुनर्जन्म की दलदल में दर्शन और समाज दोनों को घसीटकर बर्बाद कर दिया.


कपिल कणाद के बाद बुद्ध और महावीर की परम्पराओं में भी भीतर से ही परलोकवाद और वैराग्यवाद उभरता है और अपने ही स्त्रोत को जहरीला करके ब्राह्मणवादी पाखंड के आगे घुटने टेक देता है. फिर सुधार की रही सही संभावना भी खत्म हो जाती है. इसीलिये आश्चर्य की बात नहीं कि ओशो रजनीश जैसे धूर्त बाबा अपने परलोक और पुनर्जन्मवादी षड्यंत्र को बुनते हुए बुद्ध और महावीर सहित कबीर को भी अपनी चर्चाओं में बड़ा ऊँचा मुकाम देते हैं. इन्हें अपनी प्रेरणाओं का स्त्रोत बताते हुए इनके मुंह में फिर से वेद-वेदान्त का जहर ठूंसते जाते हैं और सिद्ध करते जाते हैं कि बुद्ध महावीर कपिल कणाद कबीर आदि सब इश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को मानते थे.

गौर से देखें तो पश्चिमी देशों में प्राचीन शास्त्रों और प्राचीन दर्शन के साथ ऐसी गहरी चालबाजी करने की कोई परंपरा नहीं है. वहां हर दार्शनिक अपनी नई बात लेकर आता है. दयानन्द,अरबिंदो या विवेकानन्द या राधाकृष्णन, गांधी या महाधूर्त ओशो की तरह वे वेद-वेदान्त से समर्थन नहीं मांगते बल्कि पश्चिमी दार्शनिक अपने से पुराने दार्शनिकों को कड़ी टक्कर देते हुए आगे बढ़ते हैं. भारत के ओशो रजनीश और अरबिंदो घोष जैसे पोंगा पंडित इसी काम में लगे रहते हैं कि उनका दर्शन किसी तरह वेद वेदान्त या अन्य प्राचीन शास्त्रों से अनिवार्य रूप से जुड़ जाए.

इस एक विवशता के कारण उनका जोर स्वयं दर्शन या समाज को बदलने पर नहीं होता बल्कि समाज के मनोविज्ञान और उपलब्ध या ज्ञात इतिहास को मनचाहे ढंग से बदलने पर होता है. यही इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. इसी कारण भारतीय दार्शनिक कितनी भी ऊँची उड़ान भर लें, वे प्राचीन ग्रंथों से अपने लिए समर्थन मांगने की विवशता के कारण समाज की रोजमर्रा की नैतिकता और जीवन की व्यवस्था को बदलने की कोई बात नहीं करते, वहां वे बहुत सावधान रहते हैं.

उधर पश्चिम में कोई भी दर्शन हो वो तुरंत समाज और जीवन का हिस्सा बन जाता है. आधुनिक काल में जन्मा भौतिकवादी दर्शन वहां समाज, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, साहित्य आदि में तुरंत ट्रांसलेट होता है और इस दर्शन को सुरक्षित गर्भ देकर विकसित होने के लिए सामाजिक राजनीतिक वातावरण बनाता है. डार्विन, फ्रायड और मार्क्स के आते ही पश्चिमी दुनिया बदल जाती है, उनके सोचने का ढंग उनकी जीवनशैली, उनकी राजनीति, व्यापार सब बदल जाता है. इधर भारत में कोई भी आ जाए, कुछ नहीं बदलता, एक सनातन पाषाण सी स्थिति है औंधे घड़े पे कितना भी पानी डालो, भरता ही नहीं. भारत में दर्शन सिर्फ खोपड़ी में या शास्त्रों में रहता है. वो समाज की रोजमर्रा की जीवन शैली को बदलने में बिलकुल असमर्थ रहता है.

भारत में दार्शनिक उड़ान एक भांग के नशे जैसी स्थिति है, उस नशे की उड़ान में कल्पनालोक में या शास्त्रार्थ के दौरान आप जमीन आसमान एक कर सकते हैं लेकिन सामाजिक नियम और सामाजिक नैतिकता में रत्ती भर का बदलाव नहीं आने दिया जाता. यहाँ पंडितों के रोजगार को सुरक्षित रखने के लिए कर्मकांडीय नैतिकता का जो जाल बुना गया है वो असल में दार्शनिक नैतिकता के उभार की संभावना की ह्त्या करने के लिए ही बुना गया है. इसीलिये भारत में दर्शन या विचार के क्षेत्र में भी कोई बदलाव हो जाए, लेकिन समाज में मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं होता.

ये बदलाव रोकने के लिए ही भारत में शिक्षा, विवाह, राजनीति, व्यापार आदि को एक लोहे के ढाँचे में बांधा गया है. यही लोहे का ढांचा वर्ण, आश्रम और जाति के नाम से जाना जाता है. पश्चिम में ये ढांचा नहीं था, ये लोहे की दीवारें नहीं थीं. इसलिए वहां के भौतिकवादी दार्शनिकों ने पांच सौ साल में वो कर दिखाया जो भारत में हजारों साल तक नहीं हुआ. जिस तरह से परलोकवादी बाबाओं का बुखार छाया हुआ है उसे देखकर लगता है कि आगे भी होने की कोई उम्मीद नहीं है.

भारतीय समाज के कर्मकांड और इनसे जुड़ी परलोकवादी धारणाएं जब तक चलती रहेंगी भारत में सभ्यता और नैतिकता की संभावना ऐसे ही क्षीण होती रहेंगी.

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संजय जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

सविंधान नहीं ब्राह्मणों के ग्रंथो को जलाना होगा


जन उदय : आजकल एक नया सगूफा  भगवा आतंकियो ने छोड़ दिया है की   ये लोग सत्ता में सिर्फ सविंधान बदलने के लिए आये है क्योकी  देश की सारी  समस्याओं की जड   सविंधान है .

कमाल की बात यह है की १९४७  से देश के सविंधान जलाने वाले  तिरंगा  झंडा  जलाने वाले  औ देश में  दंगे कराने वाले जातिवाद  के जनक  रक्षक  और पोषक जिन्होंने देश की हर समस्या को जन्म दिया है ये कहते है की देश की समस्या सविंधान की वजह से है . जबकि उसके उल्ट देश की हर हर समस्या सिर्फ इन्ही जैसे लोगो की वजह से है इनके दिमाग की गंदगी , देशद्रोही भावना ने देश की हर समस्या को जन्म दिया है .

आईये  देखते है क्यों  है ये लोग देश के सबसे बड़े दुश्मन  एक उधाह्र्ण  लेते है   कि  एक संसदीय  क्षेत्र में  जहा पर त्रि स्तरीय  फंड  आता  है उस इलाके में स्कूल ,कॉलेज,  बिजली ,सडक  पानी , डिस्पेंसरी , अस्पताल  बनाने में कितना समय  लगेगा ??  आप कहेंगे   पांच साल , दस साल  .. आप हद से हद कहंगे बीस साल “ लेकिन आजादी के सत्तर सालो में यह नहीं हो पाया  , सोचिये क्यों , किसकी वजह  से .. ?? देश की  ८५ % सीट पर बैठा  ब्राह्मण बनिया  यह नहीं बताता  और आरक्षण को दोष देता है  जबकि ८५ % सीट पर बीतने वाला   नेता उच्च अधिकारी  ही   जिम्मेदार होगा न की आरक्षण या दलित 
अपने आपको  हमेशा  योग्यता वाला बताने वाला ब्राह्मण बनिया  का रिकॉर्ड ऐसा है की  हजारो सालो में  आज तक किचन से लेकर आसमान तक कोई चीज नहीं बनाई   गैस , बिजली , बल्ब , फोन , टीवी  , रेल जहाज , हथियार  कुछ भी नहीं .  तो देश का सबसे बड़ा दुश्मन कौन हुआ और क्या इस देश में  सविंधान कैसे जिम्मेदार  हुआ .  यानी एक ऐसी मानसिकता के लोग  जिन्होंने इस देश को सिर्फ लूटा  है और आज की तारीख में देश के  के लोकतंत्र  की ह्या कर ई वी एम् घोटाले के जरिये सत्ता पर काबिज भगवा आतंकी   कह रहे है की सविंधान जिम्मेदार है
देश में कितने कानून है  गरीबो के लिए  अपराधो को रोकने के लिए , बलात्कारो  को रोकने के लिए  तो क्या इनसे अपराध रुके  , नहीं रुके  वो सिर्फ  इसलिए  क्योकि ये देश के कानून  की इज्जत नहीं करते  देश के सविंधान की इज्जत नहीं करते  क्योकि ब्राह्मणवादी   संस्कृति को फैलाने वाले लोग  और इस  संस्कृति में अपराध को  उत्पीडन को महिला उत्पीडन  और हत्याओं को मान्यता  दी गई है और ये लोग इसी संस्कृति  को फैलाते है   तो असल में तो इनके ग्रन्थ और ये लोग ही जिम्मेदार है

 बाबा साहेब ने कहा था सविंधान चाहे जितना मर्जी खराब हो अगर उसका पालन करने वाले सही है तो वो सविंधान बेहतर ही साबित होगा  और सविंधान चाहे जितना मर्जी अच्छा  हो अगर उसके पालन करने वाले  सही नहीं  तो वह सविंधान खराब ही साबित होगा


देश में फ़ैल रहे  गेंगरेप , गोआतंक ,दंगे , लव जिहाद ,  ई वी एम् घोटाले अपराध है और इनको करने वाले  अपराधी . और ये अपराध करने वाले लोग भगवा आतंकी है . और इन अपराधियो  को खत्म करने के लिए इनकी किताबो  को इनकी संस्कृति  को  इस देश से खत्म करना होगा 

दीनदयाल हत्याकांड से बचने को अटल विहारी वाजपेयी ने इन्दिरा गांधी को ‘दुर्गा’ कह कर खुश किया था ... कीर्ति कुमार

दीनदयाल हत्याकांड में अटल विहारी वाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी, मोदी सरकार जांच कराने से क्यों बच रही?
दीनदयाल की हत्या की जांच कराने के बजाए जन्मशती मनाकर किस रहस्य को छुपा रही है मोदी सरकार-रिहाई मंच
जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक ने दीनदयाल हत्याकांड में अटल बिहारी और नाना देशमुख की भूमिका पर उठाए थे सवाल...

मधोक ने लिखा अटल ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है
दीनदयाल का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, संघियों के अलावा कोई नहीं जानता
लखनऊ । रिहाई मंच ने कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती पर करोड़ों रूपया खर्च करके जश्न मनाने वाली मोदी सरकार द्वारा अपने इस विचारक की हत्या की जांच पर मौन रहना इस लोकधारणा को पुख्ता करता है कि उनकी हत्या में अटल बिहारी बाजपेयी की भूमिका संदिग्ध थी और इसीलिए मोदी सरकार हत्याकांड की जांच नहीं कराकर अटल बिहारी को बचाना चाहती है।

मंच ने यह भी कहा है कि दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति, समाज और सस्कृति में क्या योगदान था, इसे पूरे देश में संघियों के अलावा कोई नहीं जानता। मंच ने कहा है कि जनता के पैसे से दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों को प्रतिष्ठित करने का यह भोंडा प्रयास भाजपा और संघ परिवार के नायकत्व विहीन होने की कुंठा से निपटने का हास्यास्पद नुस्खा है।

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि सुभाष चंद्र बोस की हत्या की जांच की मांग तो भाजपा करती है लेकिन अपने कथित दाशर्निकनेता दीन दयाल उपाध्याय की 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर संदेहास्पद स्थिति में हुई हत्या की कभी जांच की मांग नहीं करती।
शाहनवाज आलम ने कहा कि समाज में यह धारणा व्याप्त है कि संघ और भाजपा दीन दयाल हत्याकांड की जांच की मांग इसलिए नहीं करती है कि इसमें खुद अटल बिहारी वाजपेयी और नाना जी देशमुख की भूमिका संदिग्ध थी। जिसका आधार पूर्व जनसंघ अध्यक्ष बलराज मधोक द्वारा अपनी पुस्तक जिंदगी का सफरके तीसरे खंड में दीनदयाल हत्या कांड के संदर्भ में किए गए रहस्योद्घाटन हैं।


गौरतलब है कि पुस्तक में मधोक ने बताया है कि उन्हें अपने सूत्रों से पता चला था कि हत्या में जनसंघ के ही कुछ वरिष्ठ नेता शामिल थे और ये पार्टी पर नियंत्रण के लिए चल रहे आंतरिक संघर्ष का नतीजा था। पुस्तक में उन्होंने यह भी रहस्योद्घाटन किया था कि तत्कालीन सरकार द्वारा इस हत्या कांड की की जारी जांच को अटल बिहारी बाजपेयी और नाना जी देषमुख ने बाधित किया और उसे ठंडे दिमाग से किए गए हत्या के बजाए एक दुखद दुघर्टना के बतौर प्रचारित किया।

मधोक ने अपने दावे के समर्थन में इस तथ्य को भी पुस्तक में दर्ज किया है कि 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब सुब्रह्मणियम स्वामी ने तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से दुबारा जांच की मांग की लेकिन जनसंघ के मंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने इस प्रयास को बाधित कर दिया।
रिहाई मंच प्रवक्ता ने कहा कि जनमानस में एक धारणा यह भी है कि दीनदयाल की हत्या के पीछे एक कारण अवैध सम्बंधों से भी जुड़ा था जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख की भूमिका मास्टरमाइंड की थी और इस धारणा का आधार भी मधोक की पुस्तक में उजागर किए गए तथ्य ही हैं।

गौरतलब है कि अपनी पुस्तक के तीसरे खंड के पृष्ठ संख्या 25 पर मधोक ने लिखा है ‘‘मुझे अटल बिहारी और नाना देशमुख की चारित्रिक दुर्बलताओं का ज्ञान हो चुका था। जगदीश प्रसाद माथुर ने मुझसे शिकायत की थी कि अटल (बिहारी वाजपेयी) ने 30, राजेंद्र प्रसाद रोड को व्यभिचार का अड्डा बना दिया है। वहां नित्य नई-नई लड़कियां आती हैं। अब सर से पानी गुजरने लगा है। जनसंघ के वरिष्ठ नेता के नाते मैंने इस बात को नोटिस में लाने की हिम्मत की। मुझे अटल के चरित्र के बारे में कुछ जानकारी थी। पर बात इतनी बिगड़ चुकी है, ये मैं नहीं मानता था। मैंने अटल को अपने निवास पर बुलाया और बंद कमरे में उससे जगदीश माथुर द्वारा कही गई बातों के विषय में पूछा। उसने जो सफाई दी बात साफ हो गई। तब मैंने अटल (बिहारी वाजपेयी) को सुझाव दिया कि वह विवाह कर ले अन्यथा वह बदनाम तो होगा ही जनसंघ की छवि को भी धक्का लगेगा।
’’
मंच के नेता अनिल यादव ने दावा किया है कि इंदिरा गांधी सरकार में हुई दीनदयाल हत्याकांड की जांच में सीबीआई और जस्टिस चंद्रचूड़ आयोग, दोनों ने ही अटल बिहारी और नाना देषमुख की भूमिका को संदिग्ध पाया था और उस रिपोर्ट को जल्दी ही इंदिरा गांधी सरकार सार्वजनिक करने वाली थी। जिसे रोकने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने बांग्लादेश के निमार्ण में निभाई गई भूमिका के लिए इंदिरा गांधी को सदन में दुर्गाकह कर सम्बोधित कर दिया। जिससे चापलूसों को पसंद करने वाली इंदिरा गांधी ने खुश होकर रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

अनिल यादव ने कहा कि अगर इंदिरा गांधी ने दीनदयाल उपाध्याय के हत्यारों को इंसाफ देने का साह
स दिखाया होता तो अटल बिहारी वाजपेयी और नाना देशमुख को इस जघन्य हत्याकांड में फांसी या उम्र कैद की सजा हो गई होती।

Sunday, 17 December 2017

चुनाव आयोग ने माना गुजरात में हुई है ई वी एम् हेक :सबूत के साथ सबसे बड़ा खुलासा,

जन उदय  जिस तरह सभी विपक्षी पार्टिया  यह कह रही है भाजपा ई वी एम् हैकिंग  का सहारा लेकर चुनाव जित रही है  जो न सिर्फ   गैर-कानूनी है बल्कि लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा  है , भगवा  गुंडों  के होंसले इतने बढ़ते  जा रहे है की उत्तर प्रदेश में पुलिस वालो  की पिटाई  हो रही है  उनकी हत्याए  की जा रही है बल्कि दिन रात गेंग  रेप  , हत्या , बलात्कार जैसी  घटनाए  बढती जा रही  है
हाल में  राजेस्थान में एक भगवा आतंकी शम्भु  नाम के युवक ने एक मुस्लिम युवा की हत्या कर उसको आग लगा दी और इसी क्रम  में आगे बढ़ते  हुए उसके समर्थको  ने कोर्ट  की  बिल्डिंग पर ही भगवा लहरा दिया  इस तरह की घटनाओं  ने लोकतंत्र  को  शर्मशार  कर  दिया है और कमाल की बात यह है इन दोनों घटनाओं में राज्य  की भाजपा सरकार ने कोई भी कड़ी  कार्यवाही  नहीं की है हां

  अगर गलित से य घटना किसी  ब्राह्मण   या राजपूत के साथ हुई होती  तो पुरे राज्य में इस वक्त सरकार द्वारा समर्थित  उत्पात  मचा  होता  और इन सब की  जड़  में है ई वी एम्
ई वी एम्  हैकिंग  की वजह से भाजपा आज २०१४  के चुनाव के जरिये केंद्र में  काबिज  है  और इसी कारण  देश में भगवा आतंक बढ़ता  जा रहा है लेकिन गुजरात चुनाव के दौरान खुद चुनाव आयोग ने यह स्वीकार कर लिया  है की चुनाव  में ई वी एम् मशीन हैक  की जा रही है और यही कारण रहा की राज्य में जहा जहा चुनाव  हो रहे थे  वहा पर चुनाव आयोग ने इन्टरनेट  सेवाए  बंद कर दी


इस बात का खुलासा  श्री के एल परमार   जो उप  चुनाव आयुक्त  है गुजरात  के उनके एक खत के लीक  होने के बाद हुआ है   और  इस खत की एक प्रति  जन उदय  के हाथ भी लगी  है  ,
यह खत  असली  है या नकली   खुद चुनाव आयोग ने इस बात की पुष्टि  नहीं की है हमारे सहयोगियो  द्वारा  पुष्टि  के प्रयास किये गए यकीन चुनाव आयोग से कोई जवाब नहीं मिला

Thursday, 14 December 2017

दलित /मूलनिवासी आन्दोलन की समस्याए और समाधान : सुरेंदर सागर


जन उदय : भारत के मूलनिवासी , ब्राह्मणों ने जिन्हें शुद्र का दर्जा दे कर अपने  कपोल  कल्पित  ग्रन्थ और भगवानो  की रचना के माध्यम से शुद्र  बनाया और इन्हें जीवन जीने के सभी अधिकारों से वंचित रखा , इनके अंदर समाज को बदलने की और अपने अधिकारों की जागरूकता  मध्यकाल से आनी  शुरू हो गई  थी . लेकिन ये  आन्दोलन  और सामाजिक चेतना की धाराए  महात्मा  ज्योतिबा फुले , माता सावित्री बाई फुले  जिन्होंने भारत में महिलाओं को शिक्षा  देना प्रारम्भ  किया  और उसके बाद अंग्रेजो  के शाशन काल  और उनके दुवारा किये गए हुए कानूनी , सुधार  और समाजिक सुधारों के जरिये जो चेतना  शुद्र / दलित / एस सी एस टी के बीच  आई  उसी परम्परा  के रहते बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के जरिये  मूनिवासियो ने अपना हक अंग्रेजो से प्राप्त कर लिया , लेकिन धूर्त  गाँधी ने  चाल चली और  अपने पाखंड  के जरिये  बाबा साहेब से पूना पैक्ट करवा लिया लेकिन बाबा साहेब  चूँकि  ब्राह्मणों के चरित्र को बाखूबी समझते  थे इसलिए उनकी  दूरदर्शिता  ने  शुद्रो  को  बचा  लिया  और बाबा साहेब ने इस फैसले में एस सी  एस टी के लिए आरक्षण की मांग की  जिसे मान लिया गया  , सो आरक्षण पूना पैक्ट का  परिणाम  बन  गया .

लेकिन ब्राह्मणों  की धूर्तता से जितना  इतना आसान नहीं था  बाबा साहेब या बात जानते थे  और उनके दलित / बहुजन  लोग इतने  पढ़े  लिखे  समझदार , सामाजिक और आर्थिक रूप से भी सक्षम  नहीं थे इस करके बाबा साहेब के लिए यह लड़ाई  और भी ज्यादा  मुश्किले  थी  इसलिए बाबा साहेब हमेशा   बहुजन युवाओं से कहते थे  कि “”अगर आप मेरा कारवा   आगे न ले जा सको  तो इसे पीछे  मत जाने देना”” 
बाबा साहेब  के जाने के बाद  इतना वक्त गुजरा  , दलितों  पर अत्याचार  कम  होने  की जगह बढ़ते  गए   ब्राह्मणों  का पुरोहितवाद  , आतंकवाद  किसी  न किसी शक्ल में सामने आता ही रहा  है   आरक्षित वर्ग पर  ब्राह्मण बैठ  गया , दलितों के हिस्सों को खा गया उनकी जमीने , अनाज , विकास का फण्ड  खा गया , उनको शिक्षा  के अधिकारों  को खा गया   और यही कारण रहा है की आज २०१७  में भी  लगभग  ७५ % सीट पर केवल ब्राह्मण विराजमान है और उन तमाम सीट पर विराजमान  है जो  सत्ता  की चाबी  होते है  , न्यायपालिका , आदि सब में घुसे बैठे है .

हालांकि  दलित उत्थान  और दलित राजनीति के नाम पर सबसे बड़ी पहल देश में मान्वर कांसीराम जी ने की बसपा  के रूप में   बसपा ने  इतना जी तोड़  काम किया की देश में राजनीती  को एक अलग मोड़  दे दिया  और आलम यह हो गया की किसी  वक्त   डंडे के जोर  पर वोट  ले लिए जाते  थे  अब उन्ही दलित वोटो  को  एक समीकरण  के रूप में देखा जाने लगा  और वो भी उनकी अपनी मर्जी से , वरना  खाने पिने , रहने की मर्जी  क्या होती है  ये दलित जानता ही नहीं था , लेकिन इसके बावजूद दलित राजनीति  में जो परिवर्तन आने चाहिए थे , दलित  राजनीती से जो परिवर्तन आने चाहिए  थे ,वो नहीं आये  आज २०१७ अलविदा  होने जा रहा है  लेकिन दलित लडकियो  के बलात्कार , हत्या , लूट , , सहारनपुर ,  रोहित वेमुला , डेल्टा मेघवाल , उना काण्ड हमारे माथे  पर अपमान के टीके  बन कर लगे है , और हम कुछ नहीं कर सके  और न ही कुछ कर सकते
ऐसा क्यों इसके कारणों  के कारण  और निवारण  नहीं हो जाता  तब तक इस देश में दलित / मूलनिवासी  उत्पीडन  ऐसे ही चलता  रहेगा

इसके मुख्य कारण में है


१.       दलित युवा आज के दौर में बहुत आक्रोशित है  और अपने अपने स्थान पर ऐसा लगता है कि वह एक ऐसी  मिसाइल  है  जो समाजिक परिवर्तन के चलाई  जा रही  है लेकिन इसकी ख़ास बात यह है कि इस मिसाइल  के पास कोई दिशा निर्देश नहीं है  यानी  ये युवा एक अनगाइडेड मिसाइल  है और  सही दिशा न मिलने के कारण ये मिसाइल अंत में  फूस हो कर गिर जाती है , यानी जब इनके द्वारा किये गए कार्य से कोई परिणाम नहीं निकलता  तो लोग हताश व् निराश हो कर  बैठ जाते है  जबकि  दलित आन्दोलन में शामिल  संस्था  और राजनैतिक पार्टियो को चाहिए की उनको एक सूत्र में बांधे
२.        दूसरा कारण  है दलित प्रतिनिधिओ का बिकायु  होना  या अवसरवादी  निकल जाना  , यानी ऐसा नहीं  है की दलित आन्दोलन में कोई संस्था बिलकुल ही काम नहीं कर रही है   काम तो हो रहे है लेकिन इनके प्रतिनिधि   इन युवाओं की उतेजन का लाभ अपने निजी फायदे के लिए उठा लेते  है  और  संघी  जैसी पार्टियो के हाथो  बिक जाते है , जैसे उदित राम हुआ , रामदास अठावले , , रामविलास पासवान , आदि आदि  ये लोग दलितों  की रहनुमाई के नाम पर दलितों  की दलाली करने लग जाते है , हलांकि ठीक ऐसा ही फायदा  आजादी से पहले से लेकर वामपंथी  पार्टियो ने उठाया और समाजिक बराबरी के नाम पर इन युवाओं को  गुमराह किया
३.       दलितों  का सूचना तंत्र : एक राजनैतिक  आन्दोलन के लिए एक सूचना का फ्लो  बड़ा जरूरी  होता है  यानी किसी  विषय पर क्या स्टैंड  होगा यह बहुत जरूरी है , लेकिन दलितों में ऐसा कोई तंत्र नहीं  जो जिसके मन में आता है वह बोल देता है कर देता है .

४.       खुद दलित नेताओं के द्वारा दलितों का शोषण राजनीतिक  रूप से होता है  यानी खुद दलित नेता दल के अंदर ऐसे दलित नेता को आगे नहीं बढ़ने देते  जो काफी तेज  हो  , क्योकि ऐसे युवा को आगे बढ़ने  दिया गया तो ऐसे बहुत से दलित बुद्धिजीवी  है जो साइड लाइन हो जाएंगे , ऐसा बसपा  में बहुत है और अन्य पार्टी में हद से जयादा है
५.       आर्थिक –समाजिक रूप से कमजोर :  दलित आन्दोलन में एक समस्या यह बहुत है की  दलित आर्थिक रूप  से और समाजिक रूप से बहुत कमजोर है यानी अगर किसी समस्या पर आन्दोलन करना  हो तो शायद ही हजार दो हजार  दलित सामने आ पाए उसका कारण  अगर आनोद्लं करेंगे तो खायंगे क्या ?? दुसरा अन्य जाति के लोगो ने देखा तो जब वो लोग इकट्ठे हो कर हमला करेंगे  ऐसी हालत में दलित इकट्ठा  हो कर मुकाबला करने में असमर्थ होंगे
६.       हिन्दू  बनाम शुद्र : अपनी सत्ता  बनाए रखने के लिए ब्राह्मण वर्ग लगातार कार्यशील  है ये लोग फिल्मो , साहित्य , सोशल नेट वोर्किंग , आदि के जरिये  समाज में भ्रान्तिया फैलाते रहते है  यानी दलितों को हिन्दू बनाए रखने के लिए  ( हिन्दू यानी शुद्र , शुद्र यानी ब्राह्मणों  के गुलाम ) हिन्दू – मुस्लिम का  दंगा लगाए रखते है

७.       आर्थिक विषमता और अनिश्चिता  भगवान् को जन्म देती है : भारत में  लोग जल्द विशवास करने वाले , कार्टून जैसी चीजो से डरने वाले , वीभत्स  इमेज से डरने वाले होते है लेकिन अगर आर्थिक रूप से कोई समाज  विषम हो और जीवन में खाने पिने , रहने , स्वास्थ और जीवन जैसी किसी  भी चीज पर कोई निश्चितता न हो  तो वहा एक भगवान् का जन्म हो जाता  है , धर्म को मानने का मतलब है जैसा है उसमे गुजरा करो तकलीफों से जूझो और उस परम , असीम कृपा वाले भगवान् को मानो , अब ये भगवान् के मालिक  और  रिश्तेदार कौन है ?? यह समझने की बात है
८.       प्रबुद्ध वर्ग की अनदेखी : दलित वर्ग में एक ऐसा बहुत बड़ा वर्ग ही जो आरक्षण का लाभ  उठा एक शीर्ष स्तर पर पहुच गया गया है लेकिन  अपनी जाति  को ही अपमानित समझता है  और और अपने समाझ के लोगो से दूर हो जाता है वह न तो इस समाज के कुछ काम आता है बाकायदा   ब्राह्मणवाद को यानी अपने दुश्मनों  के खेमो  को मजबूत करता  है

९.       आन्दोलन को  क्रिएटिव  और रोचक न बनाना :  दलित लोग प्रोटेस्ट के सिर्फ पुराने  तरीको पर टिका है जबकि   देश दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए हमेशा  अपने आन्दोलन को क्रिएटिव  बनाना  होता है , वही सोंग , वही नाटक , वही लोग लेकिन इर भी अलग लगे ,जो लोग तेलंगाना  आन्दोलन से जुड़े है या उन्होंने दिल्ली में उनके धरने पदर्शन देखे है उनको यह बात अच्छी  तरह याद होगा की ऐसा कोई प्रोटेस्ट  नहीं रहा होगा जिसको मीडिया ने कवर न किया हो , कवर करने की वजह में क्रिएटिविटी  एक बहुत बड़ा कारण रहा था

१०.   कला संस्कृति के माध्यम से चेतना बड़े : कला संस्कृति  एक बहुत बड़ा हथियार है इसलिए  इन दोनों माध्यमो  को  काफी मजबूत करना होगा और मूलनिवासी वर्ग को अपनी ब्राह्मण से पूर्व अपनी संस्कृति  को  आगे बढाए


अगर दलित समाज  सिर्फ   संघठित हो जाए  और अपने सुचना तंत्र को सही बना ले  तो वो दिन दूर नहीं की जब दलित पहले की तरह इस देश के राजा होंगे और ब्राह्मण  इस देश को छोड़ भागेंगे