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Monday, 14 March 2016

अनफेयर एंड लवली : रंग भेद के खिलाफ अमरीका में शुरू हुआ आन्दोलन



 टेक्सास,  14 मार्च  जन उदय  भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों में सांवली लड़की लोगों को नहीं भाती। सांवला होना भारत में अभिशाप की तरह है। सांवली लड़कियों को तरह तरह के ताने सुनने पड़ते हैं। इस वजह से वह कई बार अवसाद में आ जाती हैं। गोरी चमड़ी की मानसिकता का पता कॉस्मैटिक बाजार से लगा सकते हैं। टीवी में गोरा बनाने के एड चलते हैं व डॉक्टर्स सर्जरी की की भी बात करते हैं। लोगों की गोरी और सांवले रंग के प्रति लोगों की सोच बदलने के लिए 


अब टेक्सास यूनिवर्सिटी की तीन स्टूडेंट्स ने बेड़ा उठाया है। गहरा सांवला रंग भी खूबसूरत होता है, इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए तीन दोस्तों ने ऑनलाइन कैम्पेन शुरू किया है। नाम है अनफेयर एंड लवली। इसमें रंग की वजह से खुद को कम आंकने वाली या बेइज्जती की शिकार लड़कियों को सेल्फी भेजने को कहा गया है। यह कैम्पेन तेजी से आगे बढ़ रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के 21 साल के छात्र पॉक्स जोन्स ने बताया कि उन्होंने अपनी दो दोस्तों की कहानी सुनकर इस कैम्पेन को शुरू किया। उन्होंने बताया कि उनकी दोस्त मिरुशा और यानुशा श्रीलंका की हैं। उन्होंने बताया उनकी फोटो पर कैसे उनके रंग को लेकर गंदे कमेंट किये जाते थे। इसके बाद उन्होंने उनकी फोटो खींची और उसके नीचे दोनों बहनों ने लिखा- रंगभेद सामाजिक बुराई है। उनकी फोटो सोशल मीडिया पर डाली और देखते ही देखते सांवले रंग की महिलाएं उनसे जुड़ने लगीं। इसके बाद हम तीनों ने मिलकर सोशल मीडिया पर हैशटैग अनफेयर एंड लवली कैम्पेन शुरू किया।

विनायक दामोदर सावरकर सावरकर मानते थे कि गाय की पूजा करना मानव जाति का स्तर गिराना है


‘हिंदुत्व’ के विचार की बुनियाद रखने वाले विनायक दामोदर सावरकर का मानना था कि मुसलमानों ने हिंदुओं को नहीं हराया बल्कि वे गाय की पूजा करने से हारे.

सावरकर मानते थे कि गाय की पूजा करना मानव जाति का स्तर गिराना है
विनायक दामोदर सावरकर द्वारा मराठी भाषा में लिखी गई किताब ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ भाग 1 और भाग 2, स्वातंत्र्यवीर सावरकर राष्ट्रीय स्मारक प्रकाशन, मुंबई ने प्रकाशित की थी. इस किताब के अध्याय 1.5 का शीर्षक है – गोपालन हवे, गोपूजन नव्हे. हिंदी में इसका अनुवाद होगा - गाय की देखभाल करिये, लेकिन पूजा नहीं. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित इस अध्याय के अग्रेजी अनुवाद का हिंदी रूपांतरण.

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह स्वाभाविक ही है कि लोगों को गाय अच्छी लगे. गाय लंबे समय से हमारे साथ रही है. वह हमें कई चीजें उपलब्ध करवाती है. उसका दूध, अनाज के साथ मिलकर हमारे शरीर का विकास करता है. जो गायें रखते हैं उनके लिए ये परिवार के किसी सदस्य जैसी ही बन गई हैं. हिंदूओं का करुणापूर्ण मन और हृदय गायों के प्रति कृतज्ञता महसूस करता है.
हम गाय के प्रति समर्पित हैं क्योंकि वह इतनी उपयोगी है. यह हमारा कृतज्ञता बोध है जो उसे दैवीय बना देता है. जो लोग गाय की पूजा करते हैं यदि उनसे आप पूछें कि गाय पूजनीय क्यों है तो वे सिर्फ यह बताते हैं कि वह कितनी उपयोगी है.

ईश्वर सर्वोच्च है, फिर मनुष्य का स्थान है और उसके बाद पशु जगत है. गाय को दैवीय मानना और इस तरह से मनुष्य के ऊपर समझना, मनुष्य का अपमान है.

यदि गाय की पूजा इसलिए की जाती है कि वह इतनी उपयोगी है तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी देखभाल इतनी अच्छी तरह से हो कि उसकी उपयोगिता ज्यादा से ज्यादा बढ़ सके? यदि गाय का सबसे अच्छा उपयोग करना है तो सबसे पहले आपको उसकी पूजा बंद करनी पड़ेगी. जब आप गाय की पूजा करते हैं तो आप मानव जाति का स्तर नीचे गिराते हैं.

ईश्वर सर्वोच्च है, फिर मनुष्य का स्थान है और उसके बाद पशु जगत है. गाय तो एक ऐसा पशु है जिसके पास मूर्ख से मूर्ख मनुष्य के बराबर भी बुद्धि नहीं होती. गाय को दैवीय मानना और इस तरह से मनुष्य के ऊपर समझना, मनुष्य का अपमान है.

गाय एक तरफ से खाती है और दूसरी तरफ से गोबर और मूत्र विसर्जित करती रहती है. जब वह थक जाती है तो अपनी ही गंदगी में बैठ जाती है. फिर वह अपनी पूंछ (जिसे हम सुंदर बताते हैं) से यह गंदगी अपने पूरे शरीर पर फैला लेती है. एक ऐसा प्राणी जो स्वच्छता को नहीं समझता उसे दैवीय कैसे माना जा सकता है?

ऐसा क्यों है कि गाय का मूत्र और गोबर तो पवित्र है जबकि अंबेडकर जैसे व्यक्तित्व की छाया तक अपवित्र? यह एक उदाहरण दिखाता है किस तरह हमारी समझ खत्म हो गई है.

ऐसा क्यों कि गाय का मूत्र और गोबर तो पवित्र है जबकि अंबेडकर जैसे व्यक्तित्व की छाया तक अपवित्र? यह एक उदाहरण दिखाता है किस तरह हमारी समझ खत्म हो गई है.
यदि हम ये कहते हैं कि गाय दैवीय है और उसकी पूजा हमारा कर्तव्य है तो इसका मतलब है कि मनुष्य गाय के लिए बना है, गाय मनुष्य के लिए नहीं. यहां उपयोगितावाद की दृष्टि जरूरी है : गाय की अच्छी देखभाल करें क्योंकि वह उपयोगी है. इसका मतलब है कि युद्ध के समय, जब यह अपंग हो सकती है, इसे न मारने की कोई वजह नहीं है.

यदि हमारे हिंदू राष्ट्र के किसी अभेद्य नगर पर हमला होता है और रसद खत्म हो रही है तो क्या हम नई रसद आने तक इंतजार करेंगे? तब राष्ट्र के प्रति समर्पण, सेना की कमान संभाल रहे नेता के लिए यह कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह गोवध का आदेश दे और गोमांस को खाने की जगह इस्तेमाल करे. यदि हम गाय की ऐसे ही पूजा करते रहे तो हमारे सैनिकों के सामने फिर यही विकल्प होगा कि वे भूख से मर जाएं और नगर पर दूसरों का कब्जा हो जाए.

यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है कि गाय पूज्य है, जैसी मूर्खतापूर्ण और सरल धारणा ने देश को हानि पहुंचाई है. इतिहास बताता है कि हिंदू साम्राज्यों को इस मान्यता की वजह से हार का मुंह देखना पड़ा है. राजाओं को अक्सर युद्ध हारने पड़े क्योंकि वे गाय की हत्या नहीं कर सकते थे. मुसलमानों ने गाय को ढाल की तरह इस्तेमाल किया क्योंकि उन्हें भरोसा था कि हिंदू इस पशु को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.

गाय पूज्य है, जैसी मूर्खतापूर्ण और सरल धारणा ने देश को हानि पहुंचाई है. इतिहास बताता है कि हिंदू साम्राज्यों को इस मान्यता की वजह से हार का मुंह देखना पड़ा है.
जो बात गायों के लिए सही है, वही मंदिरों के लिए भी कही जा सकती है. जब एक शक्तिशाली हिंदू सेना ने मुल्तान पर आक्रमण किया तो वहां के मुसलमान शासक ने पवित्र सूर्य मंदिर तोड़ने की धमकी दे दी. इसके तुरंत बाद हिंदू सेना वहां से लौट आई. ठीक यही तब हुआ जब मल्हारराव होलकर काशी को स्वतंत्र करवाने वहां पहुंचे. लेकिन जब मुसलमानों ने वहां मंदिर तोड़ने, ब्राह्मणों की हत्याएं करने और जो भी हिंदुओं के लिए पवित्र है उसे अशुद्ध करने की धमकी दी तो उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए.

कुछ गायों, ब्राह्मणों और मंदिरों को बचाने जैसी मूर्खता के कारण देश का बलिदान हो गया. इसमें कुछ भी गलत नहीं था यदि  देश के लिए उनका बलिदान किया जाता. हर एक मुसलमान आक्रमणकारी को युद्ध जीतने दिया गया क्योंकि हिंदू गाय और मंदिर बचाना चाहते थे. इस तरह पूरा देश हाथ से चला गया.

विकल्प दो हैं जिनमें से एक को चुनना है. उपयोगितावादी दृष्टि और धर्मांधता की जकड़न. धार्मिक ग्रंथ और पुजारी सिर्फ यही कहते हैं कि यह पाप है और यह पवित्र है: वे यह नहीं बताते कि क्यों. विज्ञान धर्मांधता से अलग है. वह चीजों की व्याख्या करता है और हमें सही या गलत जानने के लिए वास्तविकता का परीक्षण करने की अनुमति देता है. विज्ञान हमें बताता है कि गाय उपयोगी है इसलिए हमें उसे नहीं मारना चाहिए – लेकिन यदि वह मनुष्य की भलाई के लिए अहितकर सिद्ध हो तो वह मारी भी जा सकती है.
सोर्स : satyagrah. scroll.in


“पाकिस्तान जिंदाबाद “ का नारा अगर किसी और ने लगाया होता तो .... क्या अब संघ के गुर्गे मीडिया देशद्रोह पर चर्चा करेंगे ??


 श्री श्री रवि शंकर ने विश्व संस्कृति महोतसव में राजनाथ की मोजुदगी में लगाया पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा , सारे अखबार , मीडिया  जो की बहुत बड़े देशभक्त है , ज्ञानी  है है पुरोहित  है , महान है  सब या तो चुप है  या  इसकी चर्चा बोधिक स्तर पर कर रहे है , भारत पाक रिश्ते की कर रहे है , इंसानियत की कर रहे है , देश में एक अच्छा  राजनैतिक  माहोल बन रहा है  ये बात भोली भाली जनता को समझाने की कोशिस कर रहे है ,  इन मीडिया के संघी गुर्गो को लगता है की जनता तो बेवकूफ है  क्योकि जो संघी जैसे  लोगो के हाथो में सत्ता दे सकती है वह जनता तो निरी मुर्ख ही होगी

खैर  थोडा बौधिक  हो कर सोचते है और यह सोचते है की पाकिस्तान जिंदाबाद क्यों न हो ??  रहे वो भी रहे , जिंदाबाद रहे , खुशहाल रहे , बंगलादेश भी रही रहे है तभी सही मायने में विश्व संस्कृति फले फूलेगी , यही मायने में यही मानवता है इंसानियत है ,
लेकिन सवाल यह है की  जब यही नारे कश्मीर में लगते है तो वहा की जनता का स्वागत गोलिओ से होता है  अगर यु पी में लग जाए , जे एन यु में लग जाए तो सारे के सारे संघी बुद्धिजीवी कुत्ते के तरह एक  कतार में लग कर  उसके उपर भोंकते रहे है , उसो देशद्रोही बताने लगते है  उनके उपर देशद्रोह  के आरोप लगते है , जे एन यु के छात्र कन्हिया एंड कम्पनी के उपर इसी वजह से देशद्रोह का आरोप लगा है  , तो इस बात से क्या मतलब निकाले जाए ???  जनता  खुद ही सोचे

दरअसल संघ एक दोमुहा   जहरीला नाग है  ये जो कहते है करते है  बस वाही सची है और सही है लेकिन दुसरा जब करने लग जाए  तो वह गलत है देशद्रोही है  , विश्व संस्कृति महोत्सव दरअसल एक बहाना  है ब्राह्मणवाद को विश्व स्तर पर बढ़ावा  देने के लिए कमाल की बात है है की ये लोग इस ब्राह्मणवाद को बढ़ावा भारतीय संस्कृति के बधावे के नाम पर देते है , रवि शंकर   संघ का एक गुर्गा है और संघियो के लिए काम करता है विश्व संस्कृति के नाम पर इसने जय श्री राम का नारा लगवाया  ये भी एक बहुत बढ़ा अपराध है 

Sunday, 13 March 2016

संघ ड्रेस नहीं अपनी आतंकी और देशद्रोह वाली सोच बदले

संघ ड्रेस नहीं अपनी आतंकी और देशद्रोह वाली सोच बदले
संघ ने त्यागा खाकी निक्कर ,लेकिन नहीं बदली मानसिकता और देशद्रोही चरित्र
अपनी राष्ट्रीय मीटिंग में आर एस एस ने अपनी वर्दी को बदलने का फैसला किया है  आर एस एस का मानना है की यह वक्त की मांग है एक हम अपनी वर्दी बदले ,  गैर तलब है की आजकल के माहोल में आर एस एस अपने आपको अपने सभी देशद्रोही वाले कामो के बावजूद , अपने सभी अनैतिक कामो के बावजूद , अपने  सभी अपराधिक कार्यो के बावजूद अपने आपको देशभक्त  साबित करना चाहे है

और यह कदम इसी राह में है , अब इनसे कोई ये पूछे  की आप दलितों के पुरे गाव जला देते है सिर्फ उनकी जमीने हडपने के लिए  , आप दलित छात्रो को पढने से रोकते है  आप गोमांस के नाम पर दंगे कराते है , लोगो के घरो में जबरदस्ती घुस कर आपके गुंडे उनकी हत्या कर देते है , देश की दौलत पूंजीपतियो के हाथो  लूटवाते है , आपके गुर्गे  लोगो ने पुरे देश में आतंक का माहोल  बनाया हुआ है  और अपने आपको देशभक्त कहते है

वैसे ये बात जान लेते है की संघियो ने इस तरह की ड्रेस कोड कहा से लिया तो बताया  जाता है की १९२० के कोंग्रेस अधिवेशन से प्रभावित हो कर  जिसे  कार्यकर्ताओं  ने इस तरह की ड्रेस पहनी थी संघ  ने भी इसी तरह की ड्रेस के अपनाया
इसके बाद १९४० और १९७३ में इसे फिर से परिवर्तित किया गया  , सवाल इस बात  का है क्या कोई व्यक्ति एक ख़ास तरह की पोशाक पहनने से देशभक्त बन जाता है ??  जवाब है नहीं


संघ एक ऐसा दल है जो संस्कृति के नाम पर इस देश में आतंक मचाये हुए है ,  अंधविश्वास , जातिवाद सम्प्रद्यवाद ये ही इनके हथियार है . चलिए ड्रेस आपने बदल ली लेकिन ड्रेस बालने के बाद ब्यान  क्या आया , ?? आरक्षण खत्म करो .. क्या संघ को ये नहीं मालूम की ७९ % सीट सिर्फ ब्राह्मण चट  करे बैठा है  ??  क्या अपने आपको  यानी ब्राह्मणों  को नौकरी  के एग्जाम देने से हटायेगा   संघ  ताकि बाकी सभी जातिओ के लोगो को नौकरी मिल सके ??  और आरक्षण का लाभ सही मायने में  लोगो तक पहुचे , शायद नहीं  क्योकि  ये लोग सिर्फ  ब्राह्मणों की पार्टी है और किसी भी  तरह सिर्फ  ब्राह्मणों  का ही भला करते है 

Saturday, 12 March 2016

संस्कृति महोत्सव तो बहाना है असल मकसद यमुना किनारे की जमीन को हडपना है लैंड माफिया भी है श्री श्री रवि शंकर


संस्कृति  महोत्सव के नाम पर   श्री श्री रवि शंकर ने  एकड़ो जमीन पर लगभग एक साल से कब्जा किया हुआ है , बहाना ये की इस जमीन पर विश्व संस्कृति महोत्सव नाम का सेट बन रहा है ,  की इस महोत्सव में इस्तेमाल होने वाली सुविधायो को इंतजाम किया जा रहा है ,ये  जमीन हजारो  एकड़ में है ,

सम्बन्धित  विभागों ने श्री श्री रवि शंकर पे केस भी किया लेकिन जो भी फैसला कोर्ट आदि  दिया ये भी बेहद चोंकाने वाला है  सवाल यह है की क्या महोत्सव खत्म होने के बाद श्री श्री रवि शंकर इस जमीन को खाली कर देगा , ??

अगर हम  श्री श्री रवि शंकर का इतहास देखे तो यह  एक नम्बर का जमीन हड्पू  इंसान है यानी धर्म के नाम पर गैर कानूनी रूप से कब्जा करने वाला  बंगलोर में भी नदी किनारे इसने  ऐसी ही एक बहुत बड़ी जमीन पर गैर कानूनी कब्जा किया हुआ है
अब ये भी सवाल है की की दिल्ली में यमुना के दूसरी तरफ अक्षरधाम मंदिर भी इसी तरह हिंदूवादी संघठनो ने गैर कानूनी रूप से कब्जे में किया हुआ है  हलांकि कुछ लोगो ने इस बारे में आवाज उठाई लेकिन कुछ फायदा नहीं हुआ   अक्षर धाम मंदिर की जगह भी यमुना नदी की जमीन पर है


जब अक्षरधाम की जमीन कब्ज़ा करने  वालो को का कुछ नही हुआ  तो श्री श्री रवि शंकर का कुछ कैसे हो सकता है ??  वो भी जब , जब वह संघ सरकार का विशेष  कृपापात्र हो  यानी  अब यह जमीन खाली नहीं होने  वाली ,


इसके लिए यह हो सकता है की खाली करते करते कोई दुसरा कार्यक्रम आ जाए और जमीन पर रवि शंकर का कब्जा बरकरार    रहे 

जनता ने नकारा और राष्ट्रवादी मीडिया ने किया अघोषित बहिष्कार श्री श्री रवि शंकर के विश्व सांस्कृतिक महोत्सव का


श्री श्री रवि शंकर ने सत्ता के करीब होने का भरपूर फायदा उठाया इसलिए संघियो के साथ मिलकर सरकारी ताम झाम की मदद से ब्राह्मण संस्कृति को फैलाने का  काम कर रहे है .

लेकिन जैसे ही इस महोत्सव पर विवाद हुआ और यह साबित हो गया उसी समय राष्ट्रवादी लोगो ने इस महोत्सव का बहिष्कार करने का मन बना लिया क्योकि जो साधू संत कहने को अपने आपको  साधू संत कहता है लेकिन इसके कार्य  समाज विरोधी तत्वों जैसे है  , उधाहरण के लिए इसके उपर कोर्ट ने पांच करोड़ का जुर्माना लगाया लेकिन रवि शंकर ने कहा की वो जुर्माना  नहीं  भरेगा

अब रवि शंकर से कोई ये पूछे की जब आप अपने  देश के कानून की इज्जत नहीं करते तो आप कैसे महान हो गए , इस बात से तो पुरे देश में ये संदेश जा रहा है की ये धर्म और संस्कृति के नाम पर कुछ भी करेंगे और आपको कुछ  नहीं होगा .


मीडिया के लोगो ने सिवाय कुछ पिछलग्गू मीडिया  ने इस महोत्सव और रवि शंकर का बहिष्कार कर दिया है  और  वहा जिस मात्रा  में  कहा जा रहा था  वहा पर लोग हजारो की संख्या में भी नहीं है  कुल  मिला कर  यह  अरबो रूपये का खेल है  जो संघ और रवि शंकर मिल कर खेल  रहे है 

दलित गरीब ही नक्सली आतंकवादी बनते है श्री श्री रवि शंकर

दलित गरीब ही  नक्सली आतंकवादी बनते है श्री श्री रवि शंकर


 श्री श्री रवि शंकर  जो आज    दिल्ली में  यमुना नदी के किनारे विश्व संस्कृति महोत्सव मना रहे है दरअसल  एक नम्बर का  धूर्त ब्राह्मणवादी ,जातिवादी है
यही नहीं इसने सरकार 

यानी कोर्ट के आदेश की अवेहलना कर यह भी जता दिया है की इस देश में  धर्म के नाम पर कुछ भी अनैतिक , किया जा सकता है वह भी विशेषकर   हिन्दू धर्म के नाम पर , ऐसा इसलिए है की हिन्दू धर्म के नाम से  जाना जाने वाला धर्म  दरअसल धर्म है ही नहीं बल्कि ब्राह्मणों द्वारा   फैलाई जा रही विषैली  संस्क्रती है , जो इंसानियत को श्रम सार करती है .

दुनिया में  सिर्फ ब्राह्मणों द्वारा फैलाई जा रही संस्कृति ही ऐसी संस्क्रती है की इसका कोई भी सूत्र पुरे देश में  एक जैसा , हो  और यही एक ऐसा धर्म है को कुरूतियो को बढ़ावा और वैधता  प्रदान करता है


 श्री श्री रवि शंकर एक ऐसा विषैला नाग है जो  जातिवादी मानसिकता से भरा है ,
यही कारण है की एक बार इसने  २१ मार्च २०१२ को जयपुर के एक कार्यकर्म में कहा था की सरकारी स्कूलों में पढ़ कर बच्चे नक्सली बनते है , तो सरकारी स्कूलों में कौन से बच्चे  पढ़ते है  ?? 

जाहिर है गरीब लोग और गरीब लोग कौन  है यानी दलित  तो नक्सली कौन बनेगा ?? यानी दलित  क्योकि किसी और समाज के उपर तो जुल्म होते नहीं है  भारत में सिर्फ जातिवाद  के नाम पर जितने जुल्म होते है  उसकी कोई गिनती ही नहीं है

एक अध्यात्मिक गुरु  जो अपने आपको दुनिया में यह दिखाता है की वह सबके  लिए एक है , सभी मानव एक है लेकिन ये सिर्फ कहने भर के लिए है हकीकत में यह नहीं है