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Wednesday, 6 December 2017

भारत में २०२४ का चुनाव एस सी /एस टी / ओ बी सी और आर्य ब्राह्मण - सवर्ण आतंकवाद के बीच होगा

 भारत में २०२४ का चुनाव मूलनिवासी और आर्य आतंकवाद के बीच होगा
जन उदय : पूना पैक्ट   को बाबा साहेब अम्बेडकर ने सिर्फ इसलिए स्वीकार किया क्योकि उस वक्त दलित किसी  भ तरह की सत्ता सम्भालने के लायक नहीं थे यानी आर्थिक रूप से शिक्षा के स्तर से समाजिक रूप से संघठित नहीं थे इसलिए उन्होंने पूना पैक्ट को स्वीकार किया और उसके बदले दलित यानी भारत के मूलनिवासी जिन्हें एस सी एस टी ओ बी सी  कहा गया उनके लिए नौकरी ,शिक्षा राजनैतिक प्रतिनिधित्व मिले , और इस प्रतिनिधित्व को पूरा करने के लिए आरक्षण की वाव्य्स्था की गई . यानी आरक्षण सबसे  पहले कोई खैरात नहीं  क्योकि यह पूना पैक्ट के जरिये बाबा साहेब द्वारा एक बहुत बड़ा बलिदान दे कर मिला यानी यह खुद भारत पर एक अहसान था और  और कोंग्रेसी   गाँधी की नौटंकी से भी निपट लिया गया . अगर आज आरक्षण स्म्पाप्त किया जता है तो भारत में सरकार द्वारा पूना पैक्ट को लागू  करना होगा . दूसरा यह की अब्बा साहेब द्वारा यह देश को  विकसित करने , सभी का विकास करने और एकता बनाए रखने की एक बहुत बड़ी पहल थी , जबकि इसके उल्ट गांधी नेहरु – सावरकर , और अन्य संघियो  ने न सिर्फ देश को तोड़ने की वकालत की बल्कि  अंग्रेजो की सत्ता बनाए रखने की भी वकालत की  .

यहाँ एक बात साफ़ कर देना बहुत जरूरी है कि आर्य विदेशी आक्रमणकारी  है   और इस देश में रोटी पानी की  तलाश में आये थे , कालन्तर में ये शिक्षा के दम पर राज्य की गतिविधिओ में  शामिल रहने लगे  और लगभग  १८० बी सी में एक ब्राह्मण सेनापति  पुश्मित्र शुंग ने व्रह्द्साथ की हत्या कर शासन पर कब्जा कर लिया इकसे बाद पुष्यमित्र शुंग ने बौध  लोग को हत्याए की यहाँ तक की गर्भवती स्त्री का पेट फाड़ बच्चे की ह्त्या की  चौरासी  हजार बौध  स्तूप  और विहारों को तोड़  उनके मंदिर बनवाये और  बौध को शिक्षा और सम्पति से वंचित कर दिया  और इसके बाद २३०  ईसा बाद  तक ऐसे ग्रन्थ लिख लिए जिसमे अपने आपको भगवान का प्रतिनिधि  बताया  और सभी लोगो को अपने से निचे बताया और समाज को जाती में विभाजित कर यहाँ के मूलनिवासियो को नीच / शुद्र  चंडाल घोषित कर दिया , इसके बाद इम्होने मुस्लिम राजाओं को निमन्त्रण दे कर बुलाया  उनके दरबारों में रहे उनसे अपनी बेटियो की शादी की
बाबा साहेब के सपने १९५६ से टूटने शुरू हो गए जब  वामपंथी , संघी औ कोंग्रेस के रूप में छिपे  ब्राह्मण भेडियों  ने अपने रंग दिखाना  शुरू कर दिया , हिन्दू कॉड बिल का विरोध , स्त्री शिक्षा और सम्पत्ति के अधिकार का विरोध और ओ बी सी आरक्षण का विरोध  हुआ तो बाबा साहेब ने इस्तीफा दे दिया


 ब्राह्मण तीन  तरीके से दलित / मूलनिवासियो  को बर्बाद करने के षड्यंत्र में लगे रहे , संघी  आक्शन का विरोध करते रहे लेकिन हिन्दू कह कर इन्हें अपने दंगो का ईंधन बनाए रखा  यह बाद दलित बिलकुल समझ ही नहीं पाए की  अगर ब्राह्मण / संघी  हिन्दू कैसे हुए जो हिन्दुओ को मिलने वाली बेसिक सुविदाओ  का विरोध करते है  यानी आरक्षण का  विरोध ,  जब की मुल्सिम मुस्लिम के खिलाफ  आन्दोलन नहीं करता , सिख सिख के विरोध में आन्दोलन नहीं खड़ा करता  तो ये ब्राह्मण  हिन्दू  होने के बावजूद दलितों का विरोध कैसे करते है ??
यानी डरपोक ब्राह्मण  जब मुस्लिम से डरता तो दलितों को आज भी हिन्दू कहता है

खैर वामपंथी समानता का सपना दिखा इन्हें मार्क्सवाद के नाम पर छलता  रहा यानि दलितों का अपना कोई आन्दोलन या पार्टी न खड़ी  हो हमेशा इस कार्य में लगे  रहे  और कोंग्रेस  ने आगजनी , हत्या , जैसे हथियार अपनाए रखे
अब जब २०१७ है वामपंथी , कांग्रेस  और संघी एक समान कार्य करने वाले लोगो के आतंक से सिर्फ दलित ही नहीं बल्कि मुस्लिम   सभी परेशान और आतंकित है , बाबरी मस्जिद विध्वंश ,  गुजरात दंगे गोदरा काण्ड , सहारन पुर काण्ड , रोहित वेमुला हत्या , डेल्टा  मेघवाल हत्या , अख़लाक़ हत्या  और ऐसे हजारो केस फेक एनकाउंटर के , और मोदी योगी के दौर में  लगातार  सपा बसपा के लोगो की रोज हत्या , दलित और प्रगतिवादी  लेखको की हत्या गौरी लंकेश ,  कलबुर्गी  हत्याओं का दौर जारी  है . सबसे बड़ी  बात संघी शासन में लोकतंत्र की हत्या हो चुकी है  लोकतंत्र के नाम पर ई वी एम् का इस्तेमाल   संघियो ने इसको एक ऐसा हथियार  बना लिया है जिसके जरिये  ये लोग अपने हक में जनमत दिखाते है लेकिन असल में इन लोगो ने लोकतंत्र की हत्या कर दी
जी एस टी  आर नोट्बंदी ने देश के आम आदमी  की कमर तोड़  दी है महंगाई , बेरोजगारी , गरीबी बेतहाशा  बढती जा रही है  अगर यह  कर्म और क्रम चलता रहा तो देश में आने वाले सम्स्य में ग्रह युद्ध लाज़मी  बन जाता  और और यही हलात है .

विदेशी  मूल के ब्राह्मण जिन्होंने  भारत पर कब्जा किया हुआ है ,इन्होने देश को विभिन्न जातिओ में  बांटा  हुआ है यह समझते है की इनके द्वारा फैलाए गए अंधविश्वास और  अज्ञानता हमेशा बना रहेगा  , ये सब कुछ खत्म हो जाएगा  और  अंतिम लोकतंत्रिक  चुनाव  २०१९ में या २०२४ में होगा और यह चुनाव  भारत के मूल निवासी  यानी एस सी एस टी ओ बी सी ,मुस्लिम और  विदेशी  आर्य आतंकी  ब्राह्मणों और सवर्णों  के बीच  होगा जो एक दम स्पष्ट रूप से होगा .

हलांकि इन्होने वक्त को समझते हुए हर चीज का भगवाकरण कर दिया है यहाँ तक की सेना , पोलिस , न्यायपालिका  जो हर तरीके से एससी  एस टी  ओ बी सी के खिलाफ काम करती है , लेकिन

इन लोगो ने भी जो वैचारिक क्रांति  के बीज डाले  है जल्द ही सामाजिक शान्ति , एकता भाई चारे और सबके विकास के लिए   ब्राह्मणों  का अंत जरूर कर देंगे  और तभी  भारत  सच में भारत बनेगा 
THE LAST DEMOCRATIC ELECTION IN INDIA ,  CIVIL WAR 

Tuesday, 5 December 2017

आरक्षण की भीख मांगते है ब्राह्मण विदेशो में , भारत में करते है विरोध :


जन उदय : सामाजिक , आर्थिक विषमता पुरी दुनिया में है चाहे वो साम्यवादी देश ही क्यों न हो कही प्रांत के नाम पर , कही लिंग के आधार पर विषमता आपको जरूर मिलेगी , लेकिन सामाजिक स्तर पर यह विषमता भेदभाव का कारण बनी , ताकतवर और अमीरों ने गरीबो और कमजोरो को अपना शिकार बनाया .

भारत में यह सामाजिक विषमता जाति के आधार पर आई , कुछ जाति समाजो ने अपने आपको भगवान का प्रतिनिधि घोषित कर दिया और बता दिया की उन्हें भगवान् ने भेजा है वो भगवान् की सन्तान है और ये भेदभाव भगवान् का आदेश है , सुनने से ही बड़ा बुरा लगता है , लेकिन इसी विचार के साथ समाज आगे बढता रहा और गरीब और गरीब होते रहे , कमजोर और भी कमजोर होते रहे , जाति के आधार पर बना अत्याचार बढता रहा यहाँ तक की अत्याचार की सारी हदे पार कर गया ,

आजादी के बाद भारत में इन जातिओ और पिछड़े समूहों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का इस्तेमाल किया लेकिन जो लोग पहले से ही सामाजिक राजनेतिक सत्ता में थे उन्होंने सामाजिक उत्थान के सारे प्रयासों को विफल कर दिया , व्यापम जैसे घोटाले पहले भी होते रहे लेकिन सामने न आये , इन अगड़े समाजो ने इमानदारी के नाम पर सबको लूट लिया भारत में आरक्षण आज भी है लेकिन फायदा न के बराबर है ..
भारत के समृद्ध उच्च जाति के लोग विदेशो में भी रह रहे है और हर साल लाखो के संख्या में नौकरी शिक्षा की खोज में भारतीय लोग विदेश जाते है , और यही नहीं भारी संख्या में वहा बस भी गए है , इंग्लैंड , कनाडा , अमरीका आदि देशो में भारतीय लोगो की संख्या भारी मात्रा में है , कनाडा में तो पंजाबी को तीसरी राजिकीय भाषा का दर्जा मिल गया है . लेकिन ये सब इतनी आसानी से नहीं हुआ है इसके लिए भारतीय लोगो ने संघर्ष किया है यानी यूरोपीय देशो में , अमरीका में , कनाडा में भारतीय लोगो ने डाइवर्सिटी या आरक्षण , एम्प्लॉयमेंट इक्विटी की मांग की , और अपने लिए तरह तरह के आरक्षण मांगते रहे है .


कमाल की बात है ये वही भारतीय है और उन्ही समाजो से आते है जो लोगो भारत में सदीओ से पिछड़ी , और सामाजिक रूप से उत्पीडित जातिओ के खिलाफ लागातार ज़हर उगलते है , आरक्षण को हटाने की मांग करते है , जाति के नाम पर हत्या गरीबो की हत्या अपना धर्म समझते है लेकिन वाही लोग विदेशो में जाकर आरक्षण की मांग क्यों करते है ??

किसी भी समाज या देश का भला तभी होगा जब उसका हर नागरिक आगे होगा उसका विकास होगा , केवल सेंक्सेस के उपर जाने से देश उपर नहीं जाता , केवल औसत आय के बड जाने से देश आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं हो जाता , ये समझने की जरूरत है


भारत में आरक्षण होते हुए भी केवल ब्राह्मण ही ७९ % सीट पर बैठा है जबकि इनकी संख्या केवल ३ % है , यह बात भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी है की ब्राह्मण विदेशी हमलावर है और इसने यहाँ के मूलनिवासियो को धार्मिक अंधविश्वास और धोखे से मानसिक गुलाम बना लिया . खैर आरक्षण का विरोध करने वाले जान ले की यही ब्राह्मण विदेशो में कैसे आरक्षण मांगते है और कैसे इनको दिया जाता है

दुनिया के निम्नलिखित देशो में मिलता है आरक्षण (Reservation/Affirmative Action):-
आजकल देश में दलित (OBC, SC & ST) आरक्षण के विरोध मे आंधी सी चल रही है। आरक्षण के खिलाफ बेहूदे और बेतुके तर्क किये जाते है। सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे देशो मे आरक्षण नहीं दिया जाता इसलिये वे देश हमसे ज्यादा प्रगितिशील है जो बिल्कुल गलत है। विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है और इसे ईमानदारी से दिया जाता है।

बाहरी देशों में आरक्षण को Affirmative Action कहा जाता है। Affirmative Action का मतलब समाज के "वर्ण " तथा "नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।
1961 को संयुक्त राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण, नस्लभेद व रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बनाया गया। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित वर्ग (दलित) की मदद करके उन्हें समाज की मुख्य धारा मे स्थापित करने का निर्णय लिया। इसी फैसले के तहत ही शोषितों और वंचितो को उठाने के लिए अलग अलग देशो ने अपने अपने तरीके से आरक्षण लागु किया है।

ऊपर कहे गए देश अमेरिका, जापान और भारत के अलावा अन्य देशो ने भी आरक्षण दिया है जिन मे से कुछेक निम्नलिखित हैं :-

1. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान मे बडी मुश्किल से 5% दलित हैं लेकिन उन्हें ईमानदारी से 6% आरक्षण दिया जाता है।
2. आरक्षण के कारण दक्षिण अफ्रीका टीम में 4 अश्वेत खिलाडियों का चयन जरूरी होता है।
3. अमेरिका में affirmative action) के तहत अश्वेतों को आरक्षण मिला हुआ है। वहां की पिक्चरों में भी अश्वेत कलाकारों का आरक्षण निर्धारित है। वहाँ कोई पिक्चर या विभाग ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें अश्वेत/काले न हो। अमेरिका ने तो आज से 155 साल पहले 4 मार्च, 1861 को दलित (अब्राहम लिंकन) को अपना राष्ट्रपति बना दिया था। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी एक अश्वेत, मुस्लिम और छोटे तबके के हैं।तभी तो अमेरिका तरक्की की दुनिया में अन्य देशों से काफी आगे हैं। भारत में तो सम्पूर्ण हिस्सेदारी पर कुछे लोग कुंडली मारकर कब्जा जमा रखा है.. इसीलिये वे समाज मे भ्रांति फैलाने के लिए आरक्षण/
हिस्सेदारी का आऐ दिन विरोध करते रहते हैं।
4. ब्राझील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है ।
5. कनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामान्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है ।
6. चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है ।
7. फिनलैंड मे स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है ।
8. जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
9. इसरायल में Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।
10. जापान जैसे सबसे प्रगतिशिल देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के हक वंचित दलित लोग हैं )
11. मॅसेडोनिया में अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।
12. मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत आरक्षण लागू हुआ है ।
13. न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
14. नॉर्वे के पीसीएल बोर्ड मे 40 % महिला आरक्षण हें।
15. रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
16. दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
17. दक्षिण कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
18. श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
19. स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण दिया जाता है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। भारत में तो लोग सबसे ज्यादा जातिभेद के ही शिकार हैं । भारतीय शुद्रो/दलितो को तो हजारों सालों से उनके मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर गुलाम बना कर रखा। तो फिर भारतीय दलितो को आरक्षण क्यों न मिले?
जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, सेना, सभी प्रकार की नौकरी, संसाधन तथा सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तक देश वांछनीय प्रगति नहीं कर पाएगा। अगर सभी देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहे हैं तो फिर भारत क्यों नहीं।




Sunday, 3 December 2017

लोकतंत्र लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी सेना : सेना का भगवाकरण यानी ब्राह्मणों द्वारा सेना का आतंकी इस्तेमाल :


जन उदय : सेना में भ्रष्टाचार  उबर कर सामने आ  चुका है लेकिन सिर्फ ये एक मुद्दा नहीं जिसकी  वजह से डर  लगे . बल्कि असली मुद्दा यही है की सेना  के  जवानो में एक ऐसा राष्ट्रवाद का जहर  घोला जा रहा है जिसके जरिये सेना एक जातिय और धार्मिक आहार पर कट्टर बनती जा रही है और इसके सामने अब दलित नक्सलवादी , मुस्लिम आतंकवादी है और इस देश में केवल सवर्ण  ही राष्ट्रवादी  है देशभक्त है  और  ये सवर्ण  भाजपा , संघी , भगवा पण्डे , ही है  जो देश को अंधविश्वास और अज्ञान के अँधेरे में रखना चाहते है .  इनके ये काम कोई आज दस बीस साल में नहीं आये है बल्कि इसकी  इतिहासिक वजह है , इनका मानना  है दलित यानि शुद्र को सिर्फ सेवा का अधिकार है , उसका अपना कोई मानवीय अधिकार नहीं है  और अगर वह इस अधिकार  की मांग करता है तो धर्म का विरोध करता है और धर्म किसी  भी हाल में बचना चाहिए .

यही कारण रहा की आरक्षण होने के बावजूद  ८५ % सीट  पर ब्राह्मण और सवर्ण  विराजमान है और अपनी इस धूर्तता को छिपाने के लिए दिन रात प्रपंच रचता रहता है और पुरे देश को आरक्षण के बहाने  दलित के  खिलाफ जहर  घोलता  है .  बड़ी समान्य  ज्ञान की बात है की अगर किसी संसदीय  क्षेत्र में स्कूल कॉलेज , सडक , बिजली , डिस्पेंसरी , अस्पताल खोलना हो तो कितना समय लगेगा  , और इस कार्य को पंचायत , विधायक , सांसद  तीन तरफ से फण्ड  आता है  ??  तो अप कहेंगे हद से हद दस साल जयादा समय लगा तो बीस साल ,. लेकिन इस देश में  साथ सालो में ऐसा नहीं हो पाया  कारण ब्राह्मण – सवर्ण इस बात को चाहते  ही नहीं थे , की गरीब दलित , आदिवासी , शुद्रो के इलाको को विकसित  किया जाए यानी ये देश के विकास का पैसा खा गए , लोगो के मूह से निवाला छिना , शिक्षा  छिनी  तो इनसे बड़ा  गद्दार कौन  हो सकता है ??/  ये देश के सबसे बड़े गद्दार  और देशद्रोही है  लेकिन इनकी धूर्तता देखो  दो चार राजनैतिक  धड़े बना कर कहते है भ्रष्टाचार  हो .. नहीं ये भ्रस्तचार  नहीं  देशद्रोह है

 खैर  भारत के जातिवादी लोग आरक्षण का विरोध सिर्फ इसलिए नहीं करते की इसके आधार पर सदीओ से पिछड़े लोग आगे आ जाएंये , बल्कि इसलिए करते है की अगर ये पिछड़े लोग आगे बढ़ गए , पढ़ लिख गए तो इन ब्राह्मणवादीओ के सारे झूठे ग्रन्थ , भगवान् की पोल खोल देंगे , पुरे दुनिया अपने हक की लड़ाई लड़ेंगे और सबसे बड़ा डर यह की ये दलित पीड़ित लोग अपने उपर हुए हर जुल्म का बदला लेंगे , इसलिए यह जातिवादी लोग हमेशा घबराए रहते है और इनकी घबराहट आरक्षण के विरोध में साफ़ झलती है , , इन्हें दरअसल डर है और इनके सभी काम इसी डर और भय के आधार पर होते है

जैसे इन्हें कोई चिंता नहीं की आरक्षण के आधार पर क्लर्क , चपरासी , की नौकरी दलितों को मिल जाए लेकिन ये नहीं चाहते की आरक्षण के आधार पर दलितों को शिक्षा मेडिकल , इंजीनियरिंग , विज्ञान और रिसर्च में नहीं अनाए देना चाहते . और हुआ भी यही है आरक्षण का रोना जितना मर्जी रोते रहे लेकिन इन क्षेत्रो में दलितों का प्रतिशत बहुत ही कम है या कहे न के बारबार है , हर जगह ब्राह्मण , बनिए घुसे है और यही कारण है की देश अब बरबादी के कगार पर पहुच गया है पूरी दुनिया में भारत की थू थू हो रही है लेकिन इन बेशर्मो को कोई फर्क नहीं पढ़ता


जातिवादियो में एक बहुत बढ़ा डर इस बात का है की इनसे दलित बदला लेगा सो इन लोगो ने सेना में आरक्षण के लिए मना कर दिया यह कह कर की ये देश की सुरक्षा का सवाल है , बिलकुल सही देश की सुरक्षा के नाम पर इस जातिवादी सेना ने क्या किया है ?? हर जगह पीटने का इनका रिकॉर्ड है , हाँ कश्मीर , और आदिवासी क्षेत्र जहा पर गरीब लोग रहते है निहत्थे रहते है उनकी हत्या बलात्कार के अच्छे रिकॉर्ड है और यह हम नहीं कहते दुनिया के मानवधिकार सन्घठन कहते है

इसके अलावा जब सेना में आरक्षण है ही नहीं तो नौकरी के प्राथना पत्र में जाति क्यों पूछी जाती है ?? इस बात का इनके पास कोई जवाब नहीं , होगा भी नहीं क्योकि ये सब एक षड्यंत्र के तहत है यानी दलित को नहीं आने देना ताकि भविष्य में अगर कुछ हो जाए जैसे गृह युद्ध तो दलित सेना में नहि होंगे तो सेना दलितों का संहार बड़ी आसानी से कर सकेगी

इसके अलावा जाति के नाम पर सेना में रजिमेंट है मराठा , जाट , सिख आदि तो ये सब क्यों ?? अगर आप इमानदार है और देशभक्त है तो कम से कम देश की सेना में ये जातिवादी दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए  

अब इस देश के हलात ऐसे है की आने वाले समय में एक गृहयुद्ध   लाजिम  है और ऐसा नहीं की ये जातिवादी  ब्राह्मणवादी  ताकते  इस बात को समझते नहीं  बल्कि ये लोग इतना समझते है की इन्होने सेना  में जातिवाद इतना भर  दिया है की अगर कोई भी खुनी  या रक्तहीन क्रान्ति होने लगी तो  उस वक्त सेना का इस्तेमाल इस  विद्रोह को दबाने  के लिए इस्तेमाल करेंगे .

लेकिन देश की सेना ऐसा क्यों करेगी ?? वो तो निष्पक्ष  है , नहीं बिलकुल नही बल्कि  इस देश में होने वाली समाजिक क्रान्ति को दबाने के लिए सेना के जवानो में फैला  ब्राह्मणवादी  राष्ट्रवाद का जाहर काम करेगा ,

सेना के जवान को बताया जाता है की मुस्लिम देश के लिए खतरा है , उनको बताया जाता है आरक्षण देश के लिए खतरा है आरक्षण मतलब  दलित देश के लिय खतरा है और ये जवान किसी ने किसी तरह से ग्रामीण  प्रष्टभूमि  से आते है , जहा पर इनका पता चलता है की अब दलित मैला  नहीं उठाता  , चमार अब उन्को सलाम नहीं करते बल्कि अच्छे अच्छे  कपडे पहन कर घूमते है  बल्कि उनसे अच्छे बस  इन जवानो को यानी जातिवादी  जवानो  को यह बर्दास्त  नहीं  होता  इस लिए  हम कह सकते है सेना का पूर्णरूप से भगवाकरण  हो चुका है , जिस सेना के जनरल  कश्मीर में मुस्लिम को मारते है , आदिवासिओ  को मरते है वो भी निर्दोष लोगो को और उनके जनरल भगाव पार्टी ज्वाइन करते है  इस बात के बहुत बड़े मतलब ही और बहुत बड़े खतरे  है 

indian army has become the weapon of Saffron terror and to control  and suppress civil war in india 

Friday, 24 November 2017

परशुराम / पुष्यमित्र शुंग विदेशो से आये ब्राह्मण इस देश पर कब्जा कर लिया जानिये कैसे


सम्राट अशोक ने अपने राज्य में पशु हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके कारन ब्राह्मणों की रोजगार योजना बंद को गई थी, उसके बाद सम्राट अशोक ने तीसरी धम्म संगती में ६०,००० ब्राह्मणों को बुद्ध धम्म से निकाल बाहर किया था, तो ब्राह्मण १४० सालों तक गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे थे, उस वक़्त ब्राह्मण आर्थिक दुर्बल घटक बनके जी रहे थे, ब्राह्मणों का वर्चस्व और उनकी परंपरा खत्म हो गई थी, उसे वापस लाने के लिए ब्राह्मणों के पास बौद्ध धम्म के राज्य के विरोध में युद्ध करना यही एक मात्र विकल्प रह गया था, ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए

 अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के पौत्र , मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट राजा बृहद्रथ मौर्य  की हत्या धोखे से उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग के नेतृत्व में ईसा.पूर्व. १८५ में रक्त रंजिस साजिश के तहत प्रतिक्रांति की और खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।
और इस प्रकार ब्राह्मणशाही का विजय हुआ।

 उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता था।




उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पर यूनानी राजा मिलिंद का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया, इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की शरण ली।

जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा खारवेल को पता चला तो उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र से यूनानी राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया।

 इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग राम ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी...

 राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग राम ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ  का कत्लेआम हुआ। राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे । इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये  सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा दता था।

 राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ  के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया।


 इसी "सरयू" नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया थ

Sunday, 19 November 2017

झांसी की कलंक गाथा , रियल स्टोरी ऑफ़ रानी लक्ष्मी बाई : महेंद्र यादव


बाल विवाह और बालिका पर हुए अत्याचार को महिमामंडित करने वाली इस कविता पर पाबंदी लगनी चाहिए।
7-8 साल की बच्ची की 40-50 साल के बूढ़े राजा के साथ हुई शादी को वीरता और वैभव की शादी बताया गया।
इस अनमेल जोड़ी में चित्रा-अर्जुन, शिव-भवानी के कौन से गुण परख लिए थे सुभद्रा कुमारी चौहान ने....
ये देखिए.....क्या ये कविता वीर रस की लगती है या झांसी की कलंक गाथा...

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

झांसी की कथित रियासत केवल नाम की रियासत थी। बहुत सीमित अधिकार अंग्रेजों ने दिए थे। निकम्मे राजा गंगाधर राव को ऐशोआराम की सुविधाएं और जनता से कर वसूलने का अधिकार ही मिला था।
1835 में 19 नवंबर को जन्मी लक्ष्मी बाई से 1842 में शादी की थी। जब डलहौजी ने ये रियासत भी हड़पने की कोशिश की तो ही जंग की नौबत आई। इस जंग में लक्ष्मीबाई की हमशक्ल झलकारी बाई ने अंग्रेज सेना से जमकर टक्कर ली और वीरगति को प्राप्त हुई। लक्ष्मी बाई छिपकर नेपाल भाग गई और लौटकर नहीं आई।
गोद लिया पुत्र दामोदर अंग्रेजों की पेंशन पर जिंदगी भर पलता रहा। 1908 में मरा।
सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कविता की बदौलत अंग्रेजों की पिट्ठू रही लक्ष्मी बाई का महिमामंडन वीरांगना और देशभक्त के रूप में फालतू में हो गया।


1857 के स्वाधीनता संग्राम की वीरांगना लक्ष्मीबाई नहीं, बल्कि झलकारी बाई थी, जिसका जन्म 22 नवम्बर 1830 को झांसी के भोजला गाँव में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था । उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन कोरी से हुआ था ।

पहली बार रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं ।
अप्रैल 1858 के संग्राम मे लक्ष्मीबाई ने झांसी के किले के भीतर से अपनी सेना का कथित नेतृत्व किया और अंग्रेज़ो द्वारा किये कई हमलों को नाकाम कर दिया। मुखबिरी के कारण किले का एक संरक्षित द्वार ब्रिटिश सेना के लिए खोल दिये जाने के बाद झलकारी बाई ने रानी को किला छोड़कर भागने की सलाह दी।

झलकारी बाई का पति पूरन किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गया था लेकिन मातम मनाने के स्थान पर झलकारी ने लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने और झांसी की सेना के साथ किले के बाहर निकल कर ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज़ से लड़ी और इसी युद्ध मे शहीद हो गईं । लक्ष्मीबाई चुपके से नेपाल भाग गई और वहां 1915 तक जीवित रही।

रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों से लड़ने के लिए निकली थी, ये बात तर्क से परे दिखती है। दत्तक पुत्र दामोदर राव का जन्म नवंबर 1849 में हुआ था, और मई 1857 में शुरू हुए 1857 के विद्रोह को दबाने में लगी रही लक्ष्मीबाई मार्च 1858 में इसमें शामिल हुई। तब तक दामोदर की उम्र तकरीबन साढ़े 8 साल की होगी। साढ़े 8 साल के बच्चे को 20-22 साल की बच्ची पीठ पर दुधमुंहे बच्चे की तरह कैसे लपेट सकी होगी, वो भी युद्ध के मैदान में।
झांसी के राजा के नाम से प्रचारित गंगाधर राव ने बुढापे में मनु तांबे नामक एक लडकी के साथ शादी रचाई और उसका नाम मनु से बदलकर लक्ष्मीबाई रखा ! झांसी स्वतंत्र राज्य नहीं था, यानी गंगाधर को जबरन राजा और लक्ष्मीबाई को जबरन रानी के रूप में प्रचारित किया गया। लक्ष्मीबाई एक साधारण महिला थी जबकि गंगाधर राव निवालकर नपुंसक और तमाम बीमारियों से पीड़ित था।

1857 के संग्राम मे लक्ष्मीबाई ने जख्मी ब्रिटिश सैनिकों की मरहमपट्टी करने का का काम किया था ! लक्ष्मीबाई ने कभी भी लड़ाई

लड़ी ही नहीं। लक्ष्मीबाई ने तो कैप्टन जॉरडन को माफीनामा लिखकर दिया था ! झांसी का किला बचाने का काम
कोरी समाज की झलकारीबाई ने अपने पति पूरन के साथ किया था !

लक्ष्मीबाई तो 1858 में प्रतापगढ के राजा की मदद से झांसी से नेपाल भागकर गई थी ! शोधकर्ताओं के अनुसार उसकी मौत 1915 में 80 साल की उम्र में हुई। इसका सबूत इतिहासकार शाम पाटील ने दिया है। लक्ष्मीबाई का पति ब्राह्मण
गंगाधर नपुंसक था। लक्ष्मीबाई इसलिए अपने एक खास मर्दानखाना रखती थी।
लक्ष्मीबाई बाई का कोई भी असली चित्र या फोटो उपलब्ध नहीं है। जो फोटो लक्ष्मीबाई के बताए जाते हैं, वो सब काल्पनिक हैं, और दरअसल झलकारी बाई के हैं। झलकारी बाई हूबहू लक्ष्मीबाई की तरह दिखती थीं और रानी की महिला सेना दुर्गा दलकी सेनापति थी।


झांसी की लक्ष्मीबाई के कैप्टन जॉर्डन को माफीनामा लिखने का प्रमाण महाराष्ट्र के लक्ष्मण शास्त्री जोशी ने महाराष्ट्र "मराठी भाषा न्यानकोश" में दिया है !

सुभद्रा कुमारी चौहान ने झूठी लयबद्ध कविता गढ़कर लक्ष्मी बाई का काल्पनिक और वीरतापूर्ण चरित्र चित्रण करके देश और इतिहास को भी गुमराह किया।

लक्ष्मी बाई के साथ जब शादी के नाम पर बलात्कार हुआ तब उसकी उम्र तकरीबन दस साल की थी। सुभद्रा कुमारी चौहान के मुताबिक, और आम धारणा के मुताबिक, तब तक वो बरछी भाला, तलवार चलाने और घुड़सवारी करने में माहिर हो गई थी।

जब कथित तौर पर रानी अपने दत्तक पुत्र दामोदर को पीठ पर दुधमुंहे बच्चे की तरह बांध कर घोड़े पर सवार होकर निकली, तब दामोदर की उमर तकरीबन उतनी ही थी जितनी उमर रानी की कथित शादी के समय थी।
या तो रानी के उस उमर में रणकौशल में दक्ष होने की बात झूठी थी, या दामोदर परम भोंदू थे।

दत्तक पुत्र दामोदर राव का जन्म 1849 में हुआ था, और मई 1857 में शुरू हुए 1857 के विद्रोह को दबाने में लगी रही लक्ष्मीबाई मार्च 1858 में इसमें शामिल हुई। तब तक दामोदर की उम्र तकरीबन 9 साल की रही होगी, जो 21-22 साल की लक्ष्मी बाई की पीठ पर बंधा रहा !!


महेंद्र यादव जी की फेसबुक वाल से 

Thursday, 9 November 2017

ब्राह्मण न तो हिन्दू है न भारतीय ,वैज्ञानिक खोजो ने किया खुलासा

जन उदय : वैसे तो जब से यह दुनिया बनी है तब से मानव सवभाव लालची ही रहा है और मानव अपने अपनों के लिए उनके फायदे के लिए ही काम करता है लेकिन सभ्यता के बढ़ते चरणों में जब देश समाज आता है तो हर इंसान देश को और देश की जनता को सर्वोपरी रखते है और वैसे भी जो लोग देश के नहीं होते वे लोग देशद्रोही कहलाते है . इस तरह के लोग हर देश में होते है और उनका इतिहास भी होता है भारत में ऐसे ही एक जाति है जिसे ब्राह्मण कहते ही 

ब्राह्मणों का इतिहास . 

ब्राह्मणों के अनुसार ये लोग किसी भगवान् के मूह से पैदा हुए है और उस भगवान् ने इन्हें सर्वोच्च स्थान दिया है , भगवान् ने सिर्फ इन्हें ही पढने का धिकार दिया इन्हें यह भी अधिकार दिए कि ये किसी भी स्त्री का बलात्कार कर सकते है , किसी भी दुसरे समुदाय के लोगो की स्मप्प्ती छीन सकते है क्योकि ऐसा इन्हें भगवान् ने कहा है ... अगर कोई सामान्य अक्ल का व्यक्ति इनकी इन बातो को सुने तो या तो हंस पढ़ेगा या इन्हें मुर्ख मानते हुए चला जाएगा , लेकिन कमाल की बात यह है की ये लोग इस बात पर अडिग है की ये लोग महान है सबसे बड़ी बात ये लोग इस जाति के आधार पर सबसे घृणा करते है और ऐसा वही लोग कर सकते है जो लोग उस समाज और देश के निवासी नहीं होते 

ब्राह्मणों के इतिहास में यह साफ़ साफ़ पता चलता है कि ये लोग यूरोप , इटली , जर्मन से भारत की और घुमन्तु जाति के रूप ,में आये थे और यहाँ के मूल निवासिओ की दया पर यहाँ रहने लगे बदले में इन्होने यहाँ के मूलनिवासी लोगो को अपनी बेतिया गिफ्ट दी और इनसे पैदा हुए लोग इंडो – आर्यन लोग कहलाये आर्य यानी ब्राह्मण विदेशी है इस बात के सारे वैज्ञानिक प्रमाण है और मिले है 

इन लोगो ने यहाँ के लोगो से जो दुश्मनी की है वह शायद मानव सभ्यता में कही भी नहीं मिलेगी यानी कुल मिला कर ये लोग एक आतंकवादी दस्ते के रूप में काम करते है 


री दुनिया में हम जिस आतंकवाद को जानते है वह है हिंसक आतंकवाद यानी इसमें या इसके मानने वाले सिर्फ हिंसा में विशवास रखते है यानी अल कायदा , आर एस एस , आइसिस ,लिट्टे जैसे संघठन इसमें आते है , दूसरा होता है सांस्कृतिक आतंकवाद जो दुनिया में सिर्फ आर एस एस चलाता है इसके पूरी दुनिया में बहुत सारे सन्घठन है जो लोगो को गुमराह करके अपनी संस्क्रती की और खींचते है और उन्हें अपने समाज और संस्क्रती की सच्चाई से दूर रखते है , आर एस एस के सन्घठन , अमरीका , यूरोप , कनाडा ,एशिया सभी देश में ये लोग काम करते है इसके कुछ मुख्या एजेंट है ब्रहम कुमारी , पतंजलि , आर्ट ऑफ़ लिविंग , विश्व हिन्दू परिषद , बजरंग दल आदि 

तीसरा है राजननीतिक आतंकवाद इसमें अमरीका रूस , चीन , कोरिया इसराइल आदि मुख्य देश है जो पूरी दुनिया में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए इन देशे में तरह तरह के आन्दोलन चलवाते है , इन देशो की अर्थ वाव्य्स्था पर कब्जा जमाते है और इन् देशो को वैसा ही चलाने की कोशिस करते है जैसा ये चाहते है 

भारत में एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रान्तियो के बारे में यानी रामायण और महाभारत कभी इस देश में हुए या नहीं या ये सिर्फ कोरी कल्पना है , इतिहास ने भी विज्ञान के नियमो को अपनाया है और इतिहास 
का लेखन वास्तुनिष्ट सामग्री पर लेखन के लिए ही जो डाला गया है , और जब हम वास्तुनिष्ट सबूतों या सामग्री की बात करते है तो उस पर रामायण और महाभारत खरी नहीं उतरती , आइये देखे कैसे 

कहानी रामयाण और महाभारत एक एपिक की तरह लिखे गए ज्सिका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक राजनितिक षड्यंत्र तय्यार करना था जिसका पहला उधाह्र्ण है 

1.कोई भी वास्तु /शिल्प सबूत नहीं : हर राजा , महाराजा , अपने लिए महल बनवाता है , भवन बनवाता है , बाग़ बगीचे बनवाता है और इन इमारतो को वह कुछ ख़ास तरीके से बनवाता है यानी हम अगर सम्राट अशोक का इतिहास देखे तो हमें सभी प्रकार के सबूत मिलते है वास्तु भी शिल्प भी लेकिन रामायण और महाभारत के इन अभिनेताओं का कुछ भी नहीं मिलता , कुछ संघटनो का कहना है की मंदिर मिले है भगवान् के तो कोई इनसे पूछे क्या भगवान् इन्हों मंदिरों से शासन करते थे ?? 

2 . हर शासक , राजा , महाराजा अपने शासन काल में अपने सिक्के यानी व्यापार के लिए सिक्के ,मुद्रा चलवाता है , जो निश्चित तोर पर उसकी सीमा और विदेश सीमा यानी उसके शासन के बाहर भी खुदाई में मिलते है लेकिन रामायण , महाभारत काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता 

३. विदेशो से सम्बन्ध एक राजा के लिए बड़े जरूरी होते है , युद्ध भी होते है संधिया भी होती है लेकिन इन दोनों काल के यानी रामायण और महाभारत काल का ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिलता 

४. विदेशो से व्यापार , यात्रिओ के लिए धर्मशाला , सुरक्षा वाव्य्स्था बाग़ बगीचे , सराय ये सब भी रहा बनवाता है लेकिन इन दोनों काल का कुछ भी नहीं मिलता 

५. संस्कृति – कला ,किसी भी इतिहास में या शासन में अपनी कला और संस्कृति जन्म लेती है , लेखक ,कवी आदि जन्म लेते है लेकिन न तो किताबो के स्तर पर कुछ भी नहीं मिलता , शिल्प , पेंटिंग , नक्काशी , वाल राइटिंग, वाल कार्विंग , भित्ति चित्र आदि इस काल का कुछ भी नहीं मिलता 

६. कालखंड . सबसे बड़ी बात होती है कि कोई भी घटना किसी कालखंड में ही होती है यानी उसका अपना एक समय होता है लेकिन इन ग्रंथो का कोई भी कालखंड नहीं है कहने को तो हर धार्मिक संघठन अपनी अपनी दलील देता रहता है , कोई कुछ काल बताता है तो कोई कुछ 

इसके अलावा जो ग्रन्थ या किताबे मिली है उनकी भी कार्बन डेटिंग से कोई सबूत नहीं मिलता की ये ग्रन्थ बहुत पुराने है बल्कि इसमें भी घपला है .. 
सो विज्ञान धारणा या कल्पना से शुरू हो सकता है लेकिन हमने उड़ने की कल्पना की लेकिन उड़े कैसे ? इसलिए विज्ञानिक कोई भी तत्थ्य आज तक नहीं है और न ही आयगा 

इतिहास बदला समय बदला लेकिन ये लोग नहीं बदले ये लोग आज भी इस वैज्ञानिक युग में अपना जातीय आतंक फैलाने पर तुले है