Apni Dukan

Sunday, 1 May 2016

, जानिये क्यों सुलगती है ब्राह्मणों की लार्ड मैकाले से : भारत में आधुनिकता के पितामाह है

जन उदय : क्या आप जानते है ब्राह्मणों ने जातिवाद को बढाने के लिए जितने ग्रन्थ लिखे  और सामाजिक वाव्य्स्था को बनाने के लिए इन्होने बौध लोगो की हत्याए की बौध विहार  और मठ तोड़ कर इन्होने मंदिर बनाए  इन मौध मठो  के अलावा  ब्राह्मणों के भगवानो का और कोई भी सबूत  इतिहास में नहीं मिलता  .
ब्राह्मण इस देश में पश्चिमी देशो से रूस  जर्मन , इटली  आदि से आये    और इनको यहाँ  रहने की जगह मिली लेकिन ये लोग जाहे रहे वही उसी देश से समाज से गद्दारी करते रहे . भारत में इसका पूरा इतिहास है . मुस्लिम  राजा जब आये  तब ये उनके साथ हो गए  इस बात के प्रमाण भी मिलते है की इन पर जजिया कर नहीं  लगता था , ब्रिटिश काल में जब अंग्रेजो ने इनकी नहीं सुनी और अंग्रेजो ने पाया की ये इनके किसी काम के नहीं है तो अंग्रेजो ने इनको दरकिनार कर दिया  और  अपनी शासन वाव्य्स्था  चलाने के लिए भारत में आधुनिक शिक्षा  और आधुनिक वाव्स्य्था की नीव डाली  . जिसमे  सभी जातिया  शामिल थी

बस   ये बात इनको मंजूर न थी  ये चाहते थे  जातिवाद  सलामत   रहे और इनकी  पुरोहित  गिरी  भी सलामत रहे  लेकिन अंग्रेजो ने ऐसा नहीं होने  दिया  और इन विदेशी गद्दार ब्राह्मणों . जो काम  ब्राह्मण अपनी योग्यता से  कभी नहीं कर पाए आइये  देखते है  की अंग्रेजो ने कैसे आधुनिकता की नीव डाली  इस देश में

1- अंग्रेजो ने 1795
में अधिनयम 11 द्वारा
शुद्रों को भी सम्पत्ति
रखने का कानून बनाया।

2- 1773 में ईस्ट इंडिया
कम्पनी ने रेगुलेटिग एक्ट
पास किया जिसमें न्याय
व्यवस्था समानता पर
आधारित थी।6 मई 1775
को इसी कानून द्वारा
बंगाल के सामन्त ब्राह्मण
नन्द कुमार देव को फांसी हुई थी।
3- 1804 अधिनीयम 3 द्वारा कन्या हत्या पर रोक
अंग्रेजों नेलगाई (लडकियों
के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपकाकर, माँ के
स्तन पर

धतूरे का

लेप लगाकर, एवम्

गढ्ढाबनाकर उसमें दूध डालकर डुबो कर मारा
जाता था

4- 1813 में ब्रिटिश सरकार
ने कानून बनाकर शिक्षा
ग्रहण करने का सभी
जातियों और धर्मों के
लोगों को अधिकार दिया।

5- 1813 में ने दास प्रथा
का अंत कानून बनाकर
किया।

6- 1817 में समान नागरिक
संहिता कानून बनाया
(1817 के पहले सजा का
प्रावधान वर्ण के आधार
पर था। ब्राह्मण को कोई
सजा नही होती थी ओर
शुद्र को कठोर दंड दिया
जाता था। अंग्रेजो ने सजा
का प्रावधान समान कर
दिया।)

7- 1819 में अधिनियम 7
द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शुद्र
स्त्रियों के शुद्धिकरण पर
रोक लगाई। (शुद्रोंकी शादी
होने पर दुल्हन को अपने
यानि दूल्हे के घर न जाकर
कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक
सेवा देनी पड़ती थी।)

8- 1830 नरबलि प्रथा पर
रोक
( देवी -देवता को प्रसन्न
करने के लिए ब्राह्मण शुद्रों,
स्त्री व् पुरुष दोनों को मन्दिर
में सिर पटक पटक कर
चढ़ा देता था।)

9- 1833 अधिनियम 87
द्वारा सरकारी सेवा में भेद
भाव पर रोक अर्थात
योग्यता ही सेवा का
आधार स्वीकार किया
गया तथा कम्पनी के
अधीन किसी भारतीय
नागरिक को जन्म स्थान,
धर्म, जाति या रंग के
आधार पर पद से वंचित
नही रखा जा सकता है।

10-1834 में पहला भारतीय विधि आयोग
का गठन हुआ। कानून
बनाने की व्यवस्था जाति,
वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11-1835 प्रथम
पुत्र को गंगा दान पर रोक (ब्राह्मणों ने नियम बनाया
की शुद्रों के घर यदि पहला
बच्चा लड़का पैदा हो तो
उसे गंगा में फेंक देना
चाहिये।
पहला पुत्र ह्रष्ट-पृष्ट एवं
स्वस्थ पैदा होता है।यह
बच्चा ब्राह्मणों से लड़ न
पाए इसलिए पैदा होते ही
गंगा को दान करवा देते थे।

12- 7 मार्च 1835 को
लार्ड मैकाले ने शिक्षा
नीति राज्य का विषय
बनाया और उच्च शिक्षा
को अंग्रेजी भाषा का
माध्यम बनाया गया।

13- 1835 को कानून
बनाकर अंग्रेजों ने शुद्रों
को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14- दिसम्बर 1829 के
नियम 17 द्वारा विधवाओं
को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15- देवदासी प्रथा पर
रोक लगाई।ब्राह्मणों के
कहने से शुद्र अपनी
लडकियों को मन्दिर की
सेवा के लिए दान देते थे। मन्दिर के पुजारी उनका
शारीरिक शोषण करते थे।
बच्चा पैदा होने पर उसे
फेंक देते थे।और उस
बच्चे को हरिजन नाम
देते थे।
1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़
23 लाख थी जिसमें 2
लाख देवदासियां मन्दिरों
में पड़ी थी।
यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मन्दिरो में चल
रही है।

16- 1837 अधिनियम
द्वारा ठगी प्रथा का अंत
किया।

17- 1849 में कलकत्ता
में एक बालिका विद्यालय
जे ई डी बेटन ने स्थापित
किया।

18- 1854 में अंग्रेजों ने
3 विश्वविद्यालय कलकत्ता
मद्रास और बॉम्बे में
स्थापित किये। 1902 मे
विश्वविद्यालय आयोग
नियुक्त किया गया।

19- 6 अक्टूबर 1860
को अंग्रेजों ने इंडियन
पीनल कोड बनाया।
लार्ड मैकाले ने सदियों
से जकड़े शुद्रों की
जंजीरों को काट दिया
ओर भारत में जाति, वर्ण
और धर्म के बिना एक
समान क्रिमिनल लॉ
लागु कर दिया।

20- 1863 अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक
पूजा पर रोक लगा दिया (आलिशान भवन एवं पुल
निर्माण पर शुद्रों को
पकड़कर जिन्दा चुनवा
दिया जाता था इस पूजा
में मान्यता थी की भवन
और पुल ज्यादा दिनों
तक टिकाऊ रहेगें।

21- 1867 में बहू विवाह
प्रथा पर पुरे देश में
प्रतिबन्ध लगाने के
उद्देश्य से बंगाल सरकार
ने एक कमेटी गठित
किया ।

22- 1871 में अंग
्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारम्भ की। यह जनगणना 1941 तक
हुई । 1948 में पण्डित
नेहरू ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर
रोक लगा दी।

23- 1872 में सिविल
मैरिज एक्ट द्वारा 14
वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवम् 18 वर्ष
से कम आयु के लड़को
का विवाह वर्जित करके
बाल विवाह पर रोक
लगाई।

24- अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर
इन जातियों को सेना में
भर्ती किया लेकिन 1892
में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गयी।

25- रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को
भूमि का स्वामी स्वीकार
किया।

26- 1918 में साऊथ
बरो कमेटी को भारत मे
ं अंग्रेजों ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी
जातियों का विधि
मण्डल (कानून बनाने
की संस्था) में भागीदारी
के लिए आया था। शाहू
जी महाराज के कहने पर पिछङो के नेता भाष्कर
राव जाधव ने एवम्
अछूतों के नेता डा
अम्बेडकर ने अपने लोगों
को विधि मण्डल में
भागीदारी के लिये
मेमोरेंडम दिया।

27- अंग्रेजो ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया ।

28- 1919 में अंग्रेजो ने ब्राह्मणों के जज बनने प
र रोक लगा दी थी और
कहा था की इनके अंदर
न्यायिक चरित्र नही
होता है।

29- 25 दिसम्बर 1927
को डा अम्बेडकर द्वारा
मनु समृति का दहन किया।

30- 1 मार्च 1930 को
डा अम्बेडकर द्वारा काला
राम मन्दिर (नासिक)
प्रवेश का आंदोलन
चलाया।

31- 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शुद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर
जाने का अधिकार दिया।

32- नवम्बर 1927 में साइमन कमीशन की
नियुक्ति की।जो 1928 में
भारत के लोगों को
अतिरिक्त अधिकार देने
के लिए आया। भारत के
लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके इसलिए इस कमीशन के भारत पहुँचते ही गांधी ने
इस कमीशनके विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन
चलाया। जिस कारण
साइमन कमीशन अधूरी
रिपोर्ट लेकर वापस
चला गया। इस पर
अंतिम फैसले के लिए
अंग्रेजों ने भारतीय
प्रतिनिधियों को 12
नवम्बर 1930 को लन्दन गोलमेज सम्मेलन में
बुलाया।

33- 24 सितम्बर 1932
को अंग्रेजों ने कम्युनल
अवार्ड घोषित किया
जिसमें प्रमुख अधिकार
निम्न दिए----

A--वयस्क मताधिकार

B--विधान मण्डलों और
संघीय सरकार में
जनसंख्या के अनुपात
में अछूतों को आरक्षण
का अधिकार

C--सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह
अछूतों को भी स्वतन्त्र
निर्वाचन के क्षेत्र का
अधिकार मिला। जिन
क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि
खड़े होंगे उनका चुनाव केवल अछूत ही करेगें।

D--प्रतिनिधियोंको चुनने
के लिए दो बार वोट का
अधिकार मिला जिसमें
एक बार सिर्फ अपने
प्रतिनिधियों को वोट देंगे
दूसरी बार सामान्य
प्रतिनिधियों को वोट देगे।

34- 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्
ध डा अम्बेडकर ने मुम्बई
विधान परिषद में आवाज
उठाई। जिसके बाद
अंग्रेजों ने इस प्रथा को
समाप्त कर दिया।

35- अंग्रेजों ने 1 जु
लाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डाॅ अम्बेडकर को वायसराय
की कार्य साधक
कौंसिल में लेबर मेंबर
बनाया। लेबरो को डा अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत आरक्षण दिलवाया।

36-- 1937 में अंग्रेजों
ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव
करवाया।

37-- 1942 में अंग्रेजों
से डा अम्बेडकर ने 50
हजार हेक्टेयर भूमि को
अछूतों एवम् पिछङो में
बाट देने के लिए अपील
किया ।
अंग्रेजों ने 20 वर्षों की
समय सीमा तय किया था।

38- अंग्रेजों ने शासन प्रसासन में ब्राह्मणों की भागीदारी को 100% से 2.5% पर लाकर खड़ा
कर दिया था।

इन्ही सब वजाह से ब्राह्मणों
ने अन्ग्रेजो के खिलाफ़
क्रांति शुरू कर दी क्योकि
अन्ग्रेजो ने शुद्रो को सारे अधिकार दे दीये थे और
सब जातियो के लोगो को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी मे लाकर खडा किया।


Wednesday, 27 April 2016

कसीदे पढने होंगे मोदी सरकार के पी.एचडी के नाम पर :: गुजरात सरकार ने कहा जो विषय हमने दिए है उसी पर होगी पी एच डी

जन उदय :   हिंदी साहित्य को काल के  हिसाब से विभाजित किया गया है , इसमें एक काल था  वीरगाथा काल इस काल में नवाब छोटे मोटे राजा अपने दरबार में  कवि और लेखक रखते थे , इन कविओ और लेखको का काम था नवाब साहेब की शान में कसीदे पढने . यानी उनकी शासन के बारे में अच्छी अच्छी बाते लिखना , यह बताना की नवाब साहेब कितने बढे दानी और उदार  थे , , 

ये लेखक अपने डरपोक राजा या नवाब  की बहादुरी के गीत लिखते थे कविताएं लिखते थे , ऐसे ही एक कविता आपने सबने पढ़ी होंगी , खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी , जबकि सच्चाई यह है की झांसी की रानी लक्ष्मी बाई युद्ध का मैदान छोड़ भाग गई थी और उसकी जगह युद्ध का मैदान  झलकारी बाई ने संभाला था ,

 इसी तरह रन बीच चोकड़ी भर भर चेतक बन गया निराला था राणा प्रताप के घोड़े को पड़ गया  हवा का पाला  था , यानी चेतक के जरिये राणा प्रताप की बहादुरी बता रहे है कवी , जबकि असलियत  में राणा प्रताप भी दुम दबा कर भाग गया था जंगलो में .

इतिहास गवाह है की जो भी विदेशी हमलावर और राजा आया उसने आकर यहाँ के लोगो को न सिर्फ मारा बल्कि यही राज किया वो भी ऐसे ही लोगो के दम  से जो आज भारत माता की जय और देशभक्त बने फिरते है .

अब दुबारा से उसी तरह का वीरगाथा काल संघी भगवा सरकार ने शुरू कर दिया है देश के हर कॉलेज , यूनिवर्सिटी में अपने भगवा आतंकी छोड़  दिए है जो प्रोफसर , वी सी के भेष में है   और ये लोग देश के हर कॉलेज यूनिवर्सिटी के माहौल को दूषित और जहरीला कर रहे है .
गुजरात सरकार ने तो एक ऐसा तुगलकी फरमान जारी ही नहीं किया है बल्कि आदेश ददिया है की राज्य में पी एच डी सिर्फ गिने चुने टोपिक पर ही हो

जैसे   Prime Minister Narendra Modi's pet project 'Swachh Bharat Abhiyan', and Gujarat's model schemes like Kanya Kelavani, Gunotsav and MA Yojana. Among the topics imposed on the students are: 'Comparative study of Sardar Patel Awas Yojna and Indira Awas Yojana'; 'Education of minorities — A critical study'; 'Gujarat: Good governance for growth, scientific management and development — A critical study of existing pattern and future course —A policy suggestions (sic)'; 'Mutual cooperation among states' action plans and comparative analysis of strategies for development — A Gujarat Model'; and 'Comprehensive analysis of growth of water in seven reservoirs of Saurashtra through SAUNI Yojana'.

अब इन बातो से साफ़ पता चलता है की ये सरकार और इसके लोग किस तरह की प्रवर्ती के है जो देश में हर चीज विशेषकर शिक्षा  को बर्बाद करना  चाहते है , अब इनसे कोई पूछे की क्या पी एच डी उस विषय पर की जाएगी जिसमे छात्र की रूचि होगी या जो ये चाहेंगे



दिल्ली ने कहा दिल से नहीं चाहिए केजरीवाल नौटंकी फिर से : दिल्ली की जनता का सर्वे

जन उदय : दिल्ली में सत्ता परिवर्तन बड़ा ही स्वाभाविक था ,कांग्रेस की भ्रष्टाचार की पोटली इतनी बड़ी हो गई थी की दिल्ली वाले अब उसको उठा नहीं सकते थे अपने कंधो पर महंगाई ,उस पर और कमर तोड़ रही थी , बिजली कम्पनिया अपनी मनमानी कर रही थी  इसलिए दिल्ली ने सोचा कांग्रेस को विदा किया जाए .

चुनाव के वक्त दिल्लिवासियो के पास विकल्प बहुत कम थे , लेकिन आम आदमी पार्टी एक ऐसा विकल्प नजर आ रहा था जो शायद दिल्ली वाले के दर्द को समझ सकता था , हलांकि एक बार पहले ही बहुमत को केजरीवाल नकार चूका था लेकिन फिर जनता ने एक बार फिर केजरीवाल को बहुमत दिया और यह बहुमत इतिहासिक बहुमत था ,  और केजरीवाल को मुख्यमंत्री बना दिया
लेकिन केजरीवाल अपनी प्रक्रति ने अनुसार  वही करता आ रहा है जो वह पहले से करता आया है यानी काम की जगह भाषण जयादा देना और गन्दी राजनीती करना , जब से केजरीवाल आया है कोई भी एक ऐसा काम नहीं किया है जो दिल्ली की जनता को फायदा पहुचा सके , बात अगर सिर्फ बिजली के बिल की है तो यह बात सनद रहे की केजरीवाल   सरकार ने जो बिजली के बिल में सब्सिडी दी है वह दरसल दिल्ल्ली सरकार का बकाया पैसा है बिजली कम्पनियो के पास उसी पैसे से बिजली पर सब्सिडी दी जा रही है यह पैसा लगभग साडे चार हजार करोड़ है और जिस दिन यह पैसा खत्म हो जाएगा उसी दिन सब्सिडी खत्म , जब तक केजरीवाल अपना सिक्का जमा चुके होंगे ,  और लोगो को पता भी नहीं चलेगा की उन्ही की जेब का ऐसा एक हाथ से उठा कर दुसरे हाथ में खैरात के रूप में पकड़ा दिया  गया ,

रहा सवाल पानी का तो लगभग सभी लोग जानते है की एक घर मर जहा चार सदस्य है वहा पानी एक हजार लिटर से जयादा लगता है तो यह भी एक धोखा है ,  पानी के बकाया बिल माफ़ करना भी वही साबित होगा यानी कही न कही जनता की जेब पर डाका ,

इसके अलावा दिल्ली सरकार ने कोई कम नहीं किया है न तो दिल्ली में  अपराध रुके है और न ही भ्रष्टाचार  तो सिर्फ ये दो काम करने के लिए दिल्ली में आम आदमी की सरकार क्यों ??
इसके अलावा शिक्षको की भारत आज तक पूरी नहीं हो रही इसलिए शिक्षा का बुरा हाल है , यही नहीं रहे सहे टीचर्स को भी निकाला जा रहा है , सबसे बड़ी बात की दलित शिक्षको को चुन चुन कर निकाला जा रहा  है , दिल्ली के स्कूलों में लगभग १२ हजार  शिक्षको की भर्ती तत्काल रूप से होनी चाहिए लेकिन कुछ नहीं हो रहा है , इसके अलावा अन्य भर्तियो के केजरीवाल अपनी रिश्तेदारों या मित्रो को ही भर्ती कर रहा है , एक तरफ हमेशा आरक्षण का विरोध करने वाला  केजरीवाल अपने रिश्तेदारों को किस आधार पर भर्ती कर रहा है यह पता नहीं चल रहा है . एक नम्बर  का जातिवादी और दलित विरोधी केजरीवाल का वश चले तो दलितों को गोली से भून दे

दूसरी बात रही स्वास्थ सेवाए तो वो सभी जहा है वही है हाँ सुधार के नाम पर केजरीवाल के हर हस्पताल और डिस्पेंसरी के आगे पोस्टर जरूर लगे है बाकी कुछ नहीं बदला , लम्बी कतारे , डॉक्टर की कमी नर्सो की कमी सब वही है ,

एक नौटंकी की तरह अपने विज्ञापन पर जनता का पैसा खर्च करने वाला केजरीवाल यह नहीं जानता की दिल्ली की जनता ने दिल बना लिया है की अब इस नौटंकी को दुबारा नहीं आने देंगे


Tuesday, 26 April 2016

यू एन ने लगाईं भारत को फटकार , कहा बंद करो जाति के नाम पर दलितों की हत्या ; मोदी सरकार ने मांगी माफ़ी

 भारत की ब्राह्मणी सरकारें हमेशा ही जाति और जातिवाद  के खिलाफ उठती हर आवाज का विरोध करती रही हैं. और यदि  यह मुद्दा विश्व के सामने उठे तब तो इनका विरोध देखते ही
बनाता है.  गोलमेज कान्फरेन्स में पहली बार बाबासाहब ने जाति और  जातिवाद के कारण देश की बहुत बड़ी आवादी की नरक बनी  जिंदगी से विश्व को रुवरु कराया था. जिसका विरोध गांधी,
मालवीय सबने किया था. गांधी ने अपने अखबार 'हरिजन' के  माध्यम से भी पुरे विश्व को गुमराह किया. भारत में  वर्णव्यवस्था के कारण बहुजन के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार
की कभी अपने अखबार में चर्चा नहीं की. ये सिलसला रुका  नहीं. अब भी जब जातीय भेदभाव और छुआछूत का मुद्दा संयुंक्त  राष्ट्र संघ में उठाया जाता है तो भारत सरकार तुरंत विरोध
करती है. 

अभी भी यही हुआ है. 28 जनवरी 2016 को एक विस्तृत रिपोर्ट  'अल्पसंख्यक मामलों पर' UN में रखी गई है. इसमें 'जातीय  भेदभाव' को 'वैश्विक त्रासदी' बताया है. इसमें कहा गया है कि जाति व्यवस्था (भारत में वर्ण व्यवस्था), मानवीय गरिमा,  समानता और बंधुत्व के खिलाफ है. रिपोर्ट में यह सवाल उठाया  गया है कि कैसे, क्यों एक जाति में पैदा लोग पूज्यनीय हो सकते
हैं जबकि दूसरी जाति में पैदा लोग अस्पृशय. 


लेकिन भारत की ब्राह्मणी सरकारें इस बात को मानने के लिए  तैयार नहीं है. जबकि देश में हालात ऐसे हैं कि -  " बहुजन है तो समझो जान से गया" बहुजन यदि छू ले सवर्ण की बाल्टी,  तो बहुजन हाथ-पैर से गया.  बहुजन यदि मूत दे किसी ठाकुर के खेत में,  तो बहुजन जान से गया.  बहुजन प्रतिबन्धित हैं नहीं ले सकते,सर्वनाजिक कुओं, नलों, नदी से पानी,यदि ले लिया तो समझो जान से गया.

 यदि कोई बहुजन मुख्यमंत्री,बाबासाहब के नाम से बनाये कोई  प्रेरणा स्थल,तो समझो सरकार से गया.  नया सवर्ण अफसर जब संभाले आफिस,तो पहले शुद्धिकरण  करवाता है,यदि पिछला बहुजन अफसर तबादले पर गया.  यदि प्रतिनिधित्व कानून से बहुजन तरक्की करें,  तो निजीकरण की आड़ में प्रतिनिधित्व कानून गया.  यदि एकलव्य अपनी स्वयं की प्रतिभा से,तीरंदाज बन किसी  अर्जुन के लिए चुनौती बन जाये,तो एकलव्य का अंगूठा गया.

यदि कोई बहुजन 

देखिये संघ समर्थक जे एन यु के संघी प्रोफसर कैसे दे रहे है आतंकवाद को बढ़ावा


जन उदय : जे एन यू काण्ड , यानी बी जे पी के छात्र विंग  के साथ मिलकर जो षड्यंत्र मीडिया के कुछ न्यूज़ चैनल ने  चलाया था .

यह बात संसद रहे की देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी जहा पर वाम विचारधारा का वर्चस्व है उसको बर्बाद करने के लिए संघ , भाजपा ने अपने छात्र विंग के साथ एक षड्यंत्र  चलाया  था जिसमे एक डॉक्टरेड विडियो सभी संघी चैनल पर चलाया गया जिसमे दिखाया गया की जे एन यु के वामपंथी छात्र देशद्रोही  नारे लगा रहे है , जो विडियो बाद में जब जांच हुई फर्जी साबित हुआ
यह घटना  देश के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी  और इस घटना ने देश को पूरी दुनिया में बदनाम किया

इसी घटना के सन्दर्भ और उसी से जुडी घटनाओं के लिए
9 फरवरी को जेएनयू में हुई घटना को लेकर एक जांच पैनल ने उमर खालिद और कन्‍हैया कुमार को अलग अलग सजा दी है. उमर खालिद को एक सेमिस्टर के लिए सस्पेंड कर दिया गया है साथ ही 20 हजार रुपए जुर्माना भरने को कहा है. जबकि जेएनयू स्‍टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार को दस हजार रुपए जुर्माना भरने को कहा गया है.

दोनों ही छात्र नेता यूनिवर्सिटी नियमों के तहत अनुशासनहीनता के दोषी पाए गए हैं. बता दें कि इस मामले में मुजीब गट्टू को भी एक सेमेस्टर के लिए निलंबित किया गया है. अनिर्बान भट्टाचार्य को 15 जुलाई तक निलंबित किया गया है. साथ ही अनिर्बान 23 जुलाई से अगले पांच साल तक जेएनयू से कोई भी कोर्स नहीं कर सकेंगे.

इसमें कमाल की बात यह है की  जो दोषी छात्र थे यानी ए बी वी पी के छात्र  , बी जे पी के नेता   और न्यूज़ चैनल उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई है , जबकि कॉलेज  प्रशासन को चाहिए  था की वो इन संघी छात्र समेत सभी न्यूज़ चैनल पर भी कार्यवाही करे  लेकिन ऐसा न हो कर उलटा पीड़ित  छात्रो को ही और प्रताड़ित  किया जा रहा है


इसमें बताया  जा रहा है  जांच कमिटी का अध्यक्ष  भटनागर  संघ समर्थक और आरक्षण विरोधी  है जो इसी तरह की अन्य देशविरोधी घटनायो में शामिल रहता है 

जानिये किस किस कम्पनी ने लगाया है चुना देश को देशभक्ति के नाम पर : आर टी आई से खुलासा :: राज आदिवाल


आप एक विजय माल्या की बात करते हैं.. मैं आपको बता दूँ अभी हाल में एक आरटीआई आवेदन के ज़रिये इस बात का खुलासा हुआ कि 2013 से 2015 के बीच देश के सरकारी बैंकों ने एक लाख 14 हज़ार करोड़ रुपये के कर्जे माफ़ कर दिये। इनमें से 95 प्रतिशत कर्जे बड़े और मझोले उद्योगों के करोड़पति मालिकों को दिये गये थे।

यह रकम कितनी बड़ी है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर ये सारे कर्ज़दार अपना कर्ज़ा लौटा देते तो 2015 में देश में रक्षा, शिक्षा, हाईवे और स्वास्थ्य पर खर्च हुई पूरी राशि का खर्च इसी से निकल आता।

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। पूँजीपतियों के मीडिया में हल्ला मचा-मचाकर लोगों को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि अर्थव्यवस्था में घाटे के लिए आम लोग ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने पूरे टैक्स नहीं चुकाते, बिल नहीं भरते, या शिक्षा, अस्पताल, खेती आदि में सरकारी सब्सिडी बहुत अधिक है, आदि-आदि। ये सब बकवास है। देश की ग़रीब जनता कुल टैक्सों का तीन-चौथाई से भी ज़्यादा परोक्ष करों के रूप में चुकाती है। मगर इसका भारी हिस्सा नेताशाही और अफ़सरशाही की ऐयाशियों पर और धन्नासेठों को तमाम तरह की छूटें और रियायतें देने पर खर्च हो जाता है। इतने से भी उनका पेट नहीं भरता तो वे बैंकों से भारी कर्जे लेकर उसे डकार जाते हैं।

ग़रीबों के कर्जे वसूल करने के लिए उनकी झोपड़ी तक नीलाम करवा देने वाली सरकार अपने इन माई-बापों से एक पैसा नहीं वसूल पाती और फिर कई साल बाद उन्हें माफ़ कर दिया जाता है। दरअसल इस सारी रकम पर जनता का हक़ होता है। करोड़ों लोगों की छोटी-छोटी बचतों से बैंकों को जो भारी कमाई होती है, उसी में से वे ये दरियादिली दिखाते हैं।
आइये अब ज़रा देखते हैं कि इन चोरों में से 10 सबसे बड़े चोर कौन हैं।

1. टॉप टेन में सबसे ऊपर हैं, अनिल अम्बानी का रिलायंस ग्रुप जो 1.25 लाख करोड़ रुपये का कर्ज़ दबाये बैठा है।
2. दूसरे नंबर पर है अपने कारखानों के लिए हज़ारों आदिवासियों को उजाड़ने वाला वेदान्‍ता ग्रुप जिस पर 1.03 लाख करोड़ कर्ज़ है।
3. एस्सार ग्रुप पर 1.01 लाख करोड़ कर्ज़ है।
4. मोदी के खास अडानी ग्रुप ने बैंकों के 96,031 करोड़ रुपये नहीं लौटाये हैं। इसके बाद भी उसे 6600 करोड़ रुपये के नये कर्ज़ की मंजूरी दे दी गयी थी लेकिन शोर मच जाने के कारण रद्द हो गयी।
5. जेपी ग्रुप पर 75,163 करोड़ का ऋण है।
6. सज्जन जिन्दल (जो मोदी की पाकिस्तान यात्रा के समय वहाँ पहुँचे हुए थे) के जे.एस.डब्ल्यू. ग्रुप पर 58,171 करोड़ का कर्ज़ है।
7. जी.एम.आर. ग्रुप पर 47,975 करोड़ का ऋण है।
8. लैंको ग्रुप पर 47,102 करोड़ का ऋण है।
9. सांसद वेणुगोपाल धूत की कंपनी वीडियोकॉन पर बैंकों का 45,405 करोड़ का ऋण है।
10. जीवीके ग्रुप कुल 33,933 करोड़ दबाये बैठा है जो 2015 में मनरेगा के लिए सरकारी बजट (34000 करोड़) से भी ज़्यादा है।
डियर जनता आप अभी व्यस्त रहिये अपनी धर्म और जाति पात की गूढ़ ज्ञान गंगा में और अपने अपने नेताओं की जिंदाबाद मुर्दाबाद में लड़ते मरते रहिये आपस में.. देश और देश की संपत्ति का क्या है वो तो आपके यही महान नेता, धर्म गुरु और पूंजीपति मिल बाँट कर जल्द ही चट कर लेंग।.

बस आप अपनी देशभक्ति भारत माता की जय तक सिमित रखिये।