Apni Dukan

Wednesday, 6 April 2016

इस देश में असली देशद्रोही और गद्दार सिर्फ विदेशी ब्राह्मण है


जन उदय : हमारे देश में ऐसे बहुत सारे कानून है जो १५० साल से भी जायदा पुराने है जिन्हें अंग्रेजो ने बनाया था और हो सकता है वो कानून उस वक्त में सार्थक हो क्योकि ये कानून अंग्रेजो की जरूरतों को पूरा करते थे , लेकिन आज ये कानून बेकार हो चुके है इन्हें न सिर्फ बदलने की जरूरत है बल्कि अपराधो की फिर से व्याख्या करने की जरूरत है

पिछले दिनों  जे एन यु के छात्रो को जिस तरह इस कानून की आड़ में प्रताड़ित किया गया  इस बात ने इस बात पर जायदा जोर दाल दिया है की इस कानून को बदला जाए
 हमें सबसे पहले इस बात को पुनर्भाषित करना होगा की आखिर देशद्रोह क्या है ?
देश के खिलाफ किसी षड्यंत्र में शामिल होने के अलावा भ्रस्टाचार को भी देशद्रोह में शामिल किया जाना चाहिए इसका एक मुख्य कारण है की जो बदहाली आज हमारे देश की है उसमे भ्रष्टाचार मुख्य वजह है

इसके लिए हम एक उधाहरण लेते है की एक संसदीय क्षेत्र में स्कूल , कोलेज , सडक स्कूल अस्पताल , डिस्पेंसरी बनाने के लिए हद से हद सिर्फ पांच साल लगेंगे , लेकिन आज ६८ साल बाद भी ये सब नहीं हो पाया है कारण के जाति के लोग जिन्होंने इस देश पर कब्जा किया हुआ है उन्होंने जानबूझ कर विकास नहीं होने दिया अगर कही कुछ हुआ तो तो वो भी सिर्फ सवर्णों के इलाको में


तो सिर्फ भ्रष्टाचार ने लोगो के मूह का निवाला छिना , कपडा छिना शिक्षा छिनी , स्वास्थ छिना कुल मिलाकर देश का विकास छीन लिया तो इस लिहाज से सबसे बड़ा देशद्रोह यही है और ये काम उन लोगो का है जिन्होंने देश की ८५ % सीट पर कब्जा किया हुआ है

महाराष्ट्र में सुखा : सरकार सिर्फ दलित बाहुल्य इलाको में पानी नहीं , सवर्णों को कोई कमी नहीं है पानी की , ,पानी बांटने में खूब पसरा है जातिवाद

जन उदय : महाराष्ट्र के कई इलाको में पानी की इस हद तक कमी है लोगो को कई कई दिनों तक लोगो को पिने का पानी नसीब नहीं हो  रहा है , हर साल ९००० हजार से जयादा किसान आत्महत्या कर रहे है जिसका  मुख्य कारण किसान की फसल की बर्बादी  जिसके कारण कर्ज की वापसी नहीं

ये बात गौरतलब है की महाराष्ट्र में पानी का भारी संकट है जिसका कारण है की कई बाँध और जलाशय में पानी की काफी कमी है लेकिन पानी की कमी से जयादा प्रभवित  इलाके लातूर , वर्धा , अमरावती  ऐसे इलाके है जहा पर दलित बाहुल्य लोग रहते है , बाकी इलाको में पानी की वैसी कमी नहीं है जैसी की इन दलित इलाको में

कमाल की बात यह है की इन्ही इलाको में पानी के टैंकर के माफिया छाये हुए है उसमे भी कमाल की बात यह है की ये पानी के टैंकर  सिर्फ और सिर्फ स्वर्ण चला रहे है ,  जिन पर कोई कार्यवाही नहीं हो रहे है  और ये लोग अपने धडल्ले से चला  रहे है
हालांकि पानी की कमी से महारष्ट्र के कई इलाको में धारा १४४ तक लगानी पड़ी है लेकिन बावजूद इसके कोई सुधार नहीं हो पा रहा है , 

इसके कई मुख्य कारण है की आजादी के बाद से ही इन इलाको में पानी की कोई सही वाव्स्था  स्थापित जानबूझ कर नहीं की गई इसका मुख्य कारण यही है की पानी की कमी से प्रबावित होने वाले इलाके जयादातर दलित है , जिनसे सरकार को कोई सरोकार नहीं है , कोई मरे या जिए

इसकी एक और बात यह  है की महाराष्ट्र में पानी की सही वाव्स्य्था को सही करने के लिए यूनाइटेड नेशन ने लाखो  डॉलर  फण्ड  दिया लेकिन नेताओं ने जानबूझ कर इस फण्ड का इस्तेमाल नहीं किया  क्योकि इसका फायदा सिर्फ दलितों को था , सो हार कर यूनाइटेड  नेशन ने ये फण्ड  बंद कर दिया


Tuesday, 5 April 2016

शेर अली आफरीदी’-गवर्नर जनरल Lord Mayo को मौत घाट उतार कर देश के लिये फांसी पर झूलने वाले अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी को आज़ाद भारत ने भुला दिया

शेर अली आफरीदी’-गवर्नर जनरल Lord Mayo को मौत घाट उतार कर देश के लिये फांसी पर झूलने वाले अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी को आज़ाद भारत ने भुला दिया
अज़ीम मुजाहिद-ए-आज़ादी शेर अली आफरीदी जिन्होंने उस समय भारत के वाइसराय लार्ड मायो को कत्ल किया था याद रहे की उस समय वाइसराय की हैसियत एक राष्ट्रपति जैसी होती थी वो पुरे मुल्क का एक तरह हुक्मरान होता था जो सिर्फ ब्रिटेन की महरानी के मातहत काम करता था।

एक छोटा सा गांव जमरूद (अफगानिस्तान से सटे) का रहने वाला बहादुर इंसान जिसका नाम शेर अली ख़ान था 30 साल के उम्र मे ही काला पानी का सज़ा हुई।


जुर्म सिर्फ़ यह था कि देश के आज़ादी के लिए अंग्रेज़ो के खिलाफ बागवात की और भारत के इतिहास के सुनहरे पन्नो मे वह पहला व्यक्ति था जिसने किसी गवर्नर जनरल को मौत तक पहुचाया अर्थात उस वक़्त के Lord Mayo को इतना ज़ख्मी किया की कोलकात्ता आते आते उस की मौत हो गयी।

2 april 1767 को Colonel Pollock, Commissioner of Peshawar ने काला पानी का फ़ैसला सुनाया था।
देश को अंग्रेज़ो से छुटकारा दिलाने और यहा से खदेड़ने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया। मकसद सिर्फ़ यह था कि अंग्रेज़ो भारत छोड़ो ।कराची और मुंबई होते हुए उनको अंडमान के जेल(1869 ) मे पहुचा दिया गया था।
वहा पर नाई बन कर जिंदगी गुजारने लगे और उस पल का इन्तेज़ार करने लगे कि कब यहा पर लॉर्ड मायो का आना है ताकि में उसका क़त्ल कर सकु और भारत को अंग्रेज़ो से छुटकारा मिल सके।
उन्हे अच्छी तरह मालूम था अगर मे नाई का काम करूँगा तो अंग्रेज़ो के करीब जाने का मौका मिल सकेगा और मेरे उपर अंग्रेज़ो का शक नही होगा।
1869 से इन्तेज़ार करते करते वह वक़्त भी आया जब Lord Mayo Feb 8 1872 को अंडमान निकोबार पहुँचा. Hope Town नाम के जजीरे के पास जा कर वह छुप गये और उसी के पास से Lord Mayo का गुजर हुवा और पल भर गवाए बिना उन्होने ने देश पर ज़ुल्म करने वाले गवर्नर जनरल Lord Mayo को अपने चाकू का निशाना ,इस तरह बनाया कि समुद्र के पानी मे गिर गया और उसको कोलकात्ता लाते लाते मृत्यु हो गयी।
उनसे जब पूछा गया कि अपने ने Lord Mayo को क्यो मारा ?
देश के इस बहादुर ने यु जवाब दिया ”he had done it on orders from God. Then he was asked, if there was any co-conspirator. He said: ‘Yes, God is the co-conspirator” और Mar 11, 1872 को जब सूली को हसते-हसते चूमा
भारतीय जेल कर्मी को मुखातिब करते हुए उनके ज़ुबान पर ये शब्द थे
“‘Brothers! I h
s! I have killed your enemy and you are a witness that I am a Muslim.’ And then he breathed his last while reciting Kalima.”
सभी जानते है अंग्रेज़ो ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के प्रयास के विफल होने पर खास तौर से मुस्लिम जनता को निशाना बनाया था और इसका ताज़ा सबूत अंडमान और निकोबार है जहा अभी हाल ही के वर्षो मे सबसे ज़्यादा आबादी वहा मुस्लिम की है क्योंकि जब देश के हर कोने से मुस्लिम उल्मा रेशमी रुमाल आंदोलन इत्यादि) और लोगो को काला पानी दिया जाता तो अंडमान निकोबार भेज दिया जाता और वह लोग भी अपना तक़दीर समझ कर वही बस गये और शादी व्याह करके वही जिंदगी काटने लगे और इस इन्तेज़ार मे लगे रहे की हम लोगो की क़ुर्बानी बेकार नही जाएगी
और इंशाअल्लाह एक दिन अपना देश आज़ाद होगा तो हम लोग फिर अपने घरो को लौटेगे।
इस तरह काला पानी का सज़ा पाने वाले सबसे ज़्यादा अनुपात मुस्लिमो का ही था और सारा अंडमान और निकोबार मुस्लिमो से पट गया था ।
आज़ादी के बाद सरकार ने लोगो को नौकरी इत्यादि का लालच देकर तमिलनाडु और अन्य राज्यो से लोगो को बुलाकर वहा बसाया । इस तरह अब फिलहाल मुस्लिम का अनुपात वहा कम हो गया।

ऐसे गुमनाम शहीदो को श्रद्धांजलि देने वाले आज बहुत कम है मगर जिन्होने देश के लिए अपने जान की आहुति दे दी उनको अपना मक़सद प्यारा था ना की नाम और शोहरत

आज भी दलितों के कान में शीशा पिघला कर डाला जाता है अगर मांगते है शिक्षा

जन उदय : सब लोगो ने ब्राह्मणों के उस साम्राज्य की बात तो सुनी होगी की जब दलितों को शिक्षा के लिए मनाही थी और  अगर गलती से भी कोई दलित / शुद्र स्कूल के पास से गुजर जाए और उसके कानो में कोई ब्राह्मणों का मन्त्र पड़  जाए तो उस शुद्र के कानो में शीशा पिघला कर दाल दिया जाता  था .

देश के एक बड़े   इतने बड़े समाज को ब्राह्मणों ने केवल शिक्षा  से वंचित करके गुलाम बना कर रख लिया   इसी अशिक्षा की वजह से ये मानसिक रूप से भी गुलाम हो गए और शुद्रो की ये गुलामी सदीओ तक चलती रही . यानी एक वक्त के राजा अपने ही देश में इन  विदेशी ब्राह्मण आक्रमंकारियो  के गुलाम बन गए .

शुद्रो की गुलामी सुनिश्चित   रहे  ब्राह्मणों ने इस देश में राज करने वाले वाले  , या राज करने के लिए आने वाले हर देशी विदेशी वर्ग को अपना समर्थन  दिया , और शासन करने में मदद की

शिक्षा  पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोडा तो लार्ड मैकाले ने जिसने शिक्षा में सभी वर्गो को पढने का सामान अधिकार दिया  , इस पर ब्राह्मणों को बहुत अफ़सोस हुआ , खैर  इन अंग्रेजो को भी ब्राह्मण  बाद में मदद करते नजर आये

आजादी के बाद  ये ब्राह्मणों की  मजबूरी  हो गई क्योकि   डॉ  भीम राव अम्बेडकर ने पूना पैक्ट में अपने लिए सारे  अधिकार ले लिए थे लेकिन धूर्त ब्राह्मणों  ने इस पर भी चाल चली  लेकिन इतने कामयाब नहीं हुए और बाबा साहेब ने समानता  के साथ साथ सविंधान में  ही सरकार को मजबूर कर दिया की  सरकार सबको शिक्षा दे , लेकिन ब्राह्मणों को ये भी मंजूर नहीं था इसलिए इन्होने शिक्षा को निजी और सरकारी दो भागो में बाँट  दिया यानी गरीब / शुद्र  और निजी उच्च   जाति  इरादा  था ऐसा करने के पीछे की सरकारी खराब शिक्षा से ये शुद्र उपर नहीं उठ पायंगे  और इनका वर्चस्व हर चीज पर बना रहेगा, जैसा की हुआ भी लेकिन शुद्र के मेघावी बच्चे आगे निकलने लगे , और जीवन के हर क्षेत्र में आगे आने लगे , बावजूद इसके की ब्राह्मणों ने खूब बेईमानी  की  धोखे  दिए   लेकिन फिर भी शुद्र  आगे आ गए

अब ब्राह्मणों के पास एक ही रास्ता  बचा  की भारत की उस शिक्षा वाव्य्स्था को बिलकुल बर्बाद कर दिया जाए ताकि ये दलित शुद्र आगे न आ सके  इसलिए धीरे धीरे  शिक्षा का बजट कम किया जा रहा है  , उच्च संस्थाओं  जैसे आई आई टी , मेडिकल में फी बढाई जा रही है  और निजी कॉलेज को प्राथमिकता  दी जा रही है इसके अलावा उच्च शिक्षा में आने वाले दलित और ओ बी सी न आ पाए इसके लिए यु जी सी के द्वारा दी जाने वाली फेलोशिप बंद करने जा रही है यही नहीं यु जी सी का सालाना बजट इस बार ५५ % कम कर  दिया गया है , पुरे देश में  पिछले  दो सालमे ३ लाख से जयादा  सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए है

और सबसे बड़ी  बात की सरकारी स्कूलों में ९वी कक्षा तक फेल न करने की निति  से भी  शिक्षा  तो बर्बाद हो  ही  रही है  बल्कि ब्राह्मण  टीचर  इन स्कूलों में जानबूझ कर दलित  छात्रो को  तीन विषय में  फेल कर रहे है  और इनको पास करने के लिए एक हजार रूपये  प्रति विषय  लिया जा  रहा है

रोहित वेमुला  , डेल्टा की संस्थानिक हत्या  और अन्य  छात्रो की हत्या ये सब साबित कर रही है


आज से सदीओ पहले जिस  तरह शीशा  पिघला कर डालने का चलन  रहा होगा , अब शीशा  पिघला कर  दलितों के कान में डालने का स्टाइल  बदल  गया है लेकिन काम वही है 

Monday, 4 April 2016

जूते भी साफ़ किये टट्टी सिर पर ढोई ,लेकिन ब्राह्मणों की तरह देश से गद्दारी नहीं की मधु मिश्रा एक राजनैतिक वेश्या है


जन उदय : मधु मिश्र जो भारतीय जनता पार्टी की महिला मोर्चे की अध्यक्ष है इनको शायद ब्राह्मणों  का इतिहास नहीं मालूम है की किस तरह  ब्राह्मणों  ने इस देश से गद्दारी की है ,वैज्ञानिक तौर  पर साबित हो चुका है की ब्राह्मण विदेशी हमलावर है लेकिन बावजूद इसके इस देश ने इनको खाने को दिया , रहने को जगह दी , पहनने को कपडे दिए  लेकिन इनकी फितरत हमेशा गद्दार और लुटेरे की बनी रही  जो आज भी बनी हुई है ,

भाजपा की महिला मोर्चा अध्यक्ष मधु मिश्रा जिस परसुराम समारोह में बोल रही थी दरसल इस परसुराम का  असली नाम पुष्य मित्र शुंग  था जो  सम्राट अशोक के पोते के वक्त उसका सेनापति था , इसने धोके से अशोक के पोते को मार सत्ता  हथिया  ली और इसके बाद इसने दलितों और बौध  लोगो की हत्या करना शुरू कर दिया , यहाँ तक की इसने गर्भवती बौध महिलाओं के पेट फाड़ कर उनके बच्चे को निकाला और फिर उसकी हत्या  की , 


यही नहीं  भारत में जो भी मंदिर  नजर आते है जिन्हें ब्राह्मण अपने भगवानो के मंदिर बताता है वे भी बौध मठो को तोड़ कर  ही बनाए गए है  जिसका स्स्बूत यह है की जब बाबरी मस्जिद को तोडा  गया तो उसके निचे से कोई  ब्राह्मण देवी देवता की नहीं बल्कि बौध  मुर्तिया ही निकली है


यहाँ तक की आज भी खुदाई में सिर्फ बौध विहार और मठ मिलते है न की कोई मंदिर  जिससे ये साबित हो जाता है की इस देश में मंदिर थे  ही नहीं
मुस्लिम काल में भी ब्राह्मणों ने अपनी जान बचाने के लिए मुस्लिम राजाओं का ही साथ देना बेहतर समझा इस बारे में काफी शौध सामने आये है की गैर इस्लामी लोगो पर लगने वाला जाजिया  कर ब्राह्मणों पर नहीं लगता था क्योकि ये मुस्लिम राजाओं से फ़रियाद करते थे की ये कर  ब्राह्मणों पर न लगाया जाए  क्योकि ब्राह्मण भी मुस्लिम की तरह विदेशी है

इसके बाद ब्रिटिश शासन काल में तिलक  सावरकर , गोविलकर , अटल बिहारी बाजपाई ये  ऐसे लोग है जो अंग्रेजो की मदद करते थे  और उनको शासन  चलाने में साथ देते थे , इसके साथ ही अंग्रेजो के लिए मुखबरी का भी काम करते थे ,
आई सी एस परीक्षा में १७ में से १६ ब्राह्मण हुआ करते थे ,  इसलिए १९४७ के बाद ये हमेशा उच्च पदों पर रहे  और अन्य सवर्णों को राजनीती में साहयता  दी  और देश को लूटना जारी रखा

इसका एक बेहतरीन उधाह्र्ण देखिये  “” एक संसदीय क्षेत्र  के विकास के लिए जिसमे स्कूल , डिस्पेंसरी , अस्पताल , कोलेज , सडक , बिजली अगर देना हो तो कितना  समय लगेगा ??  तो कोई भी साधारण  व्यक्ति कह सकता है की हद से हद बीस साल , लेकिन ये सब चीजे आज भी हमारे देश में उपलब्ध नहीं है ?? कारण   यह है की इन ब्राह्मणों ने ही विकास का सारा पैसा खा लिया  और इसे नाम दिया भ्रष्टाचार का , जब की यह विषय सबसे बड़े  देशद्रोह का होना चाहिए
इन बातो से साबित हो जाता है की ये सबसे बड़े  देशद्रोही है , गद्दार है , ये लोग जब तक शासन में रहंगे  या इस देश में रहेंगे  इस देश से गद्दारी करते  रहेंगे , कभी कांग्रेस  ,बन कर कभी भाजपा  बन कर कभी वामंपथी  बन कर

 मधु मिश्रा   का ब्यान “”उत्तर प्रदेश में भाजपा की महिला मोर्चा अध्यक्ष मधु मिश्रा ने एक विप्र समारोह में लगातार लगातार सजग और शिक्षित होते दलित समाज के आगे बढ़ने पर अपनी टीस जाहिर की। ब्राह्मणों के कार्यक्रम में उन्होंने दलितों को निशाना बनाते हुए कहा कि जो कभी तुम्हारे जूते साफ करते थे


 वे आज संविधान के सहारे तुम्हारे ही सिर पर बैठकर राज कर रहे हैं। यह बयान उन्होंने अलीगढ़ के रामलीला मैदान में आयोजित विप्र सम्मेलन व होली मिलन समारोह में दिया। उन्होंने कहा था, ''साथियो आप सब यहां बैठे हैं। यहां कुछ विप्र बंधुओं के अलावा भी लोग बैठे हैं। मैं उनसे क्षमा चाहती हूं। आज तुम्हारे सिर पर बैठ कर संविधान के सहारे जो राज कर रहे हैं। याद करो, वो कभी तुम्हारे जूते साफ किया करते थे। आज तुम्हारे हुजूर हो गए हैं। क्यों? क्योंकि हम बंट गए। हम विभाजित हो गए।''


Sunday, 3 April 2016

“भारत माता की जय” वाले आतंकवादी संगठनो को इस देश से निकालना होगा

जन उदय : भारत माता की जय ,  संघियो का एक हथियार बन गया है जसके जरिये ये पाने  आपको देशभक्त साबित करने में लगे है  और जो न बोले उसको देशद्रोही , जब की असलियत यह है की ये संघी इनका मूल स्थान भारत है ही नहीं   ये आर्य विदेशी हमलावर है , जो कई क्रम   और खेप में भारत आये ,

\ये लोग जब से आये कभी भी इन्होने इस देश को देश नहीं माना  यहाँ आने वाले हर  हमलावर के साथ इन्होने सत्ता के मजे लिए

अंग्रेजो के साथ मिलकर भी ये इस देश की सत्ता में रहे बल्कि ये चाहते थे की अंग्रेज  जाते वक्त इनके हाथो में सत्ता सोंपे  लेकिन ऐसा न हुआ 

“”RSS के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने "14 अगस्त 1947 के भगवा ध्वज के पीछे का रहस्य_ शीर्षक सम्पादकीय में.. "भाग्य की लात खाकर सत्ता में आ गए लोग हमारे हाथ में तिरंगा पकड़ा सकते हैं पर हिन्दू उस तिरंगे को न कभी स्वीकारेंगे, न उसका सम्मान करेंगे. 3 की संख्या खुद में ही अशुभ है, अपशकुनी है, और तीन रंगों वाला झंडा देश को बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक नुकसान पंहुचाएगा और देश के लिए खतरनाक होगा

तिरंगे और देश के सविंधान से इन्हें सबसे जयादा अलर्जी रही है इसलिए समय समय पर इन्होने जब चाहा देश के सविंधान को जलाया , दंगे करवाए जिस तरह पुरे देश में इस वक्त एक आतंक का माहोल बना दिया है संघ ने उससे लगता है ये लोग बहुत जल्द ही अराजकता ले आयंगे पुरे देश में ,

हाल ही में फद्न्विस जो महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री है दुबारा से अपना गैर जिम्मेदाराना ब्यान जारी किया है कि जो भारत माता की जय बोलेगा वही इस देश में रहेगा ,


मुसलमान बोल चुके है की हम नहीं बोलेंगे तो इस पर इन्होने मुसलमानों को विदेशी बताना शुरू कर दिया है , लेकिन सिक्खों ने भी मना कर दिया है लेकिन उनके खिलाफ ये जवाब नहीं दे रहे है , इनकी इन्ही हरकत की वजह से नवजोत सिद्धू ने इनकी पार्टी छोड़ दी है वैसे भी सिक्ख धर्म के सबसे बड़े दुश्मन ये खुद ब्राह्मण भी रहे है

न बोल कि लब आज़ाद है न बोल जुबां तेरी है , पत्रकार बनके रहेगा तो संघ का गुलाम बन कर रहेगा ये है भाजपा का शुशासन


छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की चुनौतियों का पता लगाने के लिए 13 से 15 मार्च के बीच एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की जो फैक्ट फाइंडिंग टीम वहां गई थी, उसकी रिपोर्ट में कुछ ऐसी चौंकाने वाली बातें शामिल हैं जिन्हें जान कर दिल्ली व दूसरे महानगरों में बैठे पत्रकारों और संपादकों की आँखें खुल सकती हैं.

मसलन, अगर आपको यह बताया जाए कि बस्तर का प्रशासन राष्ट्रीय मीडिया को माओवादियों का समर्थक मानता है, तो इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? इसका सीधा सा मतलब यह है कि यदि आप दिल्ली के पत्रकार हैं, खुद को राष्ट्रीय मीडिया का हिस्सा मानते हैं और बस्तर में विजिटर के तौर पर असाइनमेंट पर जा रहे हैं, तो सतर्क हो जाइए क्योंकि वहां न तो आपका प्रेस कार्ड काम आएगा और न ही राष्ट्रीय मीडिया का बैनर, क्योंकि आप पहले से ही माओवादी समर्थक माने जा चुके हैं.

आइए, एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट के कुछ ऐसे ही चौंकाने वाले अंशों पर निगाह डालते हैं:
•             बस्तर पत्रकार संघ के अध्यक्ष करीमुद्दीन ने बताया, ‘‘मैं जगदलपुर से बाहर की किसी भी जगह बीते छह साल से नहीं गया हूं क्योंकि मुझे सच लिखने की मनाही है और आप जो देखते हैं अगर उसे लिख नहीं सकते, तो फिर बाहर जाकर सूचना जुटाने का कोई मतलब नहीं बनता।’’ वे पिछले तीन दशक से ज्यादा वक्त से यूएनआइ के बस्तर प्रतिनिधि हैं।
•             एक स्थानीय अखबार के संपादक दिलशाद नियाज़ी ने बताया कि वे डर के मारे पिछले आठ साल से पड़ोसी जिले बीजापुर नहीं गए हैं।

•             मालिनी सुब्रमण्यम ने बताया कि यदि कोई पत्रकार सूचना जुटाने के लिए बाहर जाने की हिम्मत भी कर लें, तो माना जाता है कि उसे लोगों से बात नहीं करनी है। उन्होंने बताया, ‘‘पुलिस अधिकारी पत्रकारों से यह उम्मीद करते हैं कि उनकी कही बात का भरोसा कर के वे छाप दें। अगर कोई पत्रकार तथ्यों को जुटाने के लिए थोड़ी भी अतिरिक्त मेहनत करने की मंशा रखता हो, तो यह उन्हें पसंद नहीं आता। एक आत्मसमर्पण के मामले में मैंने जब कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की, तो पहले मुझसे पूछा गया कि मैं उन लोगों के नाम बताऊं जिनसे मैं बात करना चाहती हूं और मेरे वहां पहुंचने से पहले ही उन्हें बता दिया गया था कि मुझसे क्या बोलना है।’’




•             जैसा कि स्थानीय पत्रकार कहते हैं, बस्तर में पत्रकारों की तीन श्रेणियां हैं- सरकार समर्थक, सरकार के थोड़े कम समर्थक और माओवादी समर्थक या उनसे सहानुभूति रखने वाले पत्रकार।

•             स्ट्रिंगर और समाचार एजेंटः ये लोग बस्तर में पत्रकारिता की रीढ़ हैं। संघर्ष-क्षेत्र के सुदूर इलाकों में तैनात इन लोगों को स्ट्रिंगर, न्यूजएजेंट और यहां तक कि हॉकर भी कहा जाता है। ये लोग खबरें जुटाकर या तो जगदलपुर ब्यूरो में या फिर सीधे मुख्यालय में भेजते हैं। इन्हें अपने अखबार से न तो कोई औपचारिक नियुक्ति पत्र मिलता है और न ही काम के बदले कोई पारिश्रमिक मिलता है।
•             स्थानीय अधिकारियों ने दावा किया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि जगदलपुर से कोई स्क्रोल डॉट इन नामक वेबसाइट के लिए लिख रहा है। जगदलपुर के कलक्टर ने इस बारे में कहा, ‘‘वह तो मुख्यधारा का मीडिया भी नहीं है।’’
•             स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि इस विवाद के सामने आने से पहले खुद उन्हें नहीं पता था कि मालिनी सुब्रमण्यम स्क्रोल डॉट इन के लिए लिखती हैं। मालिनी ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने कभी भी सरकार के जनसंपर्क विभाग में एक पत्रकार के बतौर अपना पंजीकरण करवाने की परवाह नहीं की क्योंकि वे दैनंदिन घटनाओं को कवर नहीं करती थीं।
•             आलोक पुतुल छत्तीसगढ़ से बीबीसी हिंदी के लिए लिखते हैं। वे खबर करने के लिए बस्तर गए थे और बस्तर के आइजी एसआरपी कल्लूरी व पुलिस अधीक्षक नारायण दास से मिलने की कोशिश कर रहे थे। कई कोशिशों के बाद उन्हें आइजी की ओर से यह संदेश मिला, ‘‘आपकी रिपोर्टिंग बहुत एकतरफा और पूर्वाग्रहग्रस्त होती है। आप जैसे पत्रकारों पर अपना समय खर्च करने का कोई मतलब नहीं है। मेरे साथ मीडिया और प्रेस का एक राष्ट्रवादी और देशभक्त तबका खड़ा है और वह मेरा समर्थन भी करता है। बेहतर है कि मैं उन्हें वक्त दूं। शुक्रिया।’’

•             पुलिस अधीक्षक ने भी ऐसा ही संदेश भेजा, ‘‘हाय (अंग्रेज़ी में अभिवादन) आलोक, मुझे देश के लिए बहुत सारे काम करने हैं। मेरे पास आप जैसे पत्रकारों के लिए वक्त नहीं है जो एकतरफा तरीके से खबरें लिखते हैं। मेरा इंतजार मत करना।’’
•             इस बारे में टीम द्वारा सवाल किए जाने पर जगदलपुर के कलक्टर अमित कटारिया ने हंसते हुए कहा, ‘‘आलोक पुतुल और आइजी के बीच कुछ कम्युनिकेशन गैप रहा होगा, और कुछ नहीं।’’
•             राज्य सरकार चाहती है कि माओवादियों के साथ सरकार की लड़ाई को मीडिया राष्ट्र के लिए की जा रही लड़ाई के रूप में देखे, उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले की तरह बरते और इस बारे में कोई सवाल न खड़ा करे।




 सोर्स : mediavigil.com