Apni Dukan

Sunday, 7 January 2018

भीमा कोरेगाँव ब्राह्मण आतंकवाद बनाम भारतीय मूलनिवासी संभाजी महाराज और गोविंद गोपाल महार की समाधि और भीमा कोरेगांव का सच .प्रदीप नागदेव

छत्रपति शिवाजी के जेष्ठ पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज थे । शिवाजी महाराज के निधन के बाद 1680 में उन्होंने ही गद्दी संभाली थी। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की तरह ही इस बार भी पूना के ब्राह्मण संभाजी महाराज के राज्याभिषेक से खुश नही थे । 

छत्रपति संभाजी महाराज और मुगलों में कई बार युद्ध हुए , किन्तु एक वक्त संभाजी के साले गणोजी शिर्के और मनुवादी ब्राह्मणों के धोखेबाजी/ दगाबाजी से छत्रपति संभाजी महाराज को मुकरब खां द्वारा बन्दी बनाकर औरंगजेब के समक्ष पेश किया गया । 

औरंगजेब के मन की मुराद पूरी हो गई . संभाजी महाराज को सजा देने के वक्त भी ब्राम्हण पंडित की मौजूदगी में मनुस्मृति के अनुसार सजा दी गई . 

औरंगजेब ने 11 मार्च 1689 को संभाजी की 31वर्ष की आयु में वीभत्स रूप से हत्या कर उसके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर भीमा_कोरेगांव से पास वाले वडू गाँव में फिकवा दिये और यह फरमान जारी कर दिया कि कोई भी शख्स संभाजी के शरीर के टुकड़ों को उठाकर अंतिम संस्कार करेगा तो उसके भी टुकड़े टुकड़े कर दिए जाएंगे। 

संभाजी महाराज के विभत्स किये अंगों को उठाने की किसी की भी हिम्मत नही हुई। किन्तु उसी गाँव मे रहने वाले #गोविंद #गोपाल_गायकवाड़ महार वह शख्स है जिसने खुद के मौत की परवाह न कर छत्रपति संभाजी महाराज के यत्र तंत्र फैले शरीर के टुकड़ों को एकत्रित कर सिलाई किया , और ससम्मान छ्त्रपति संभाजी महाराज की अंत्येष्टि की रस्म पूर्ण की । 


इसी कारण गोविंद महार औऱ उनके परिवार के सभी 16 सदस्यों को मार दिया गया, ऐसे वीर गोविन्द महार की समाधि आज भी वडू गांव के महार बस्ती में संभाजी महाराज के समाधि के पास मौजूद है । 

अब भीमा कोरेगांव की सच्ची घटना यह है कि छ्त्रपति शिवाजी महाराज के साथ ही, उनके वंशजों के दुश्मन, ब्राह्मण पेशवा जिन्होंने शिवाजी को राजा मानने से इंकार कर दिया था , शिवाजी के वंशजो से धोखेबाज़ी से राजपाठ हथियाकर खुद 1713 में राजा बन बैठे। 

1 जनवरी 18018 को ब्राह्मणी पेशवाओं के 28000 सैनिक और महार रेजिमेंट के 500 सैनिकों के मध्य भीषण युद्ध हुआ जिसमें ब्राह्मणी पेशवाओं की पराजय हुई । पेशवाओं की इसी पराजय का जश्न मनाने 1 जनवरी को प्रतिवर्ष भीमा कोरेगांव में लाखों की तादात में बहुजन समाज (Sc,St,Obc) के लोग शौर्य दिवस मनाने और श्रद्दांजलि देने आते है । 


इस वर्ष 2018 में पेशवाओं औऱ महारो के बीच हुये युद्ध को 200 वर्ष पूर्ण हुए है। 
28 दिसंबर 2017 को वडू गांव में गोविन्द महार की समाधि के पास की सड़क पर उनके वंशजो ने एक दिशा निर्देशक बोर्ड लगाया था ताकि भिमा कोरेगांव में आने वाले बहुजन समाज के लोग वडू गांव में आते वक्त उन्हें गोविन्द गोपाल महार की समाधि के बारे में भी पता चले सके । 

किन्तु 29 दिसंबर 2017 को सुबह 10:30 बजे वडू गांव के सरपंच, ग्राम पंचायत के सदस्य, पुलिस पाटिल औऱ गांव में रहने वाले लगभग 500 से 700 लोगो ने मिलकर गोविन्द गोपाल महार की समाधि के पास लगाया हुआ दिशानिर्देशक बोर्ड तथा गोविन्द महार की समाधि का छत तोड़ दिया, 

इसके बाद गोविन्द महार के वंशजो ने समाधि तोड़ने वालों पर FIR दर्ज किया , साथ ही एट्रोसिटी एक्ट के तहत मामला दर्ज होने की खबर भी आई, इसके बाद 30 दिसंबर को भीमा कोरेगांव की ग्रामपंचायत में प्रस्ताव पारित किया गया कि 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव पूरी तरह से बंद रहेगा, ताकि भीमा कोरेगांव में आने वाले लाखों बहुजन लोगो को दिक्कते /असुविधा हो । 

इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव बंद रखा गया, 1 जनवरी को जब सुबह लगभग 12:00 बजे लोग शांतिप्रिय तरीके से अहमदनगर की औऱ से शौर्य स्तंभ की औऱ जा रहे थे तब भीमा नदी के पास कोरेगांव में कुछ लोगोंने स्तंभ की और जाने वाले लोगो पर बिल्डिंग के ऊपर से पत्थर फेकना शुरू कर दिया , साथ ही कुछ लोग वहा पर आने वाले लोगो की गाड़ियां तोड़ने लगे और गाड़ियों को जलाने लगे, इस तरह से ये आग धीरे धीरे बढ़ती चली गई, पत्थर बाजी बढ़ने लगी आगजनी बढ़ती गई और शौर्य स्तंभ की और जाने वाले लोगो के साथ मारपीट भी होती रही । 

लेकिन आज वही मनुवादी लोग इस घटना का संबंध पूना में हुई यलगार परिषद से जोड़ रहे है जिसमे उमर खालिद और जिग्नेश मेवानी आये थे, लेकिन वास्तविकता यह है कि उस परिषद का और भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा का किसी तरह से कोई भी संबंध नही है। 

भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की शुरुवात वडू गांव से ही हुई है, जहाँ पर गोविन्द गोपाल महार की समाधि को तोड़ने के बाद समाधि तोड़ने वालों पर FIR दर्ज हुआ और इसके बाद यह सारी प्लानिग हुई... 
साथियों...!! सच परेशान हो सकता है पराजित नही ...!! 


Reality of Bheema Koregoan , Treachery of Peshwa, Treachery of Brahman 

*भिड़े,एकबोटे,दवे ब्राम्हणों द्वारा बौद्ध,सिख,लिंगायत,मुस्लिम, क्रिचन मराठा ओ पर जानलेवा पथराव गाड़िया जलाई गईं प्रफुल अवाज़

 आज़ाद भारत में अंग्रेज़ों की जीत का जश्न क्यों? इस सवाल के जरिये जेनेऊ धारी ब्राम्हणवाद को फ़ैलाने वाली मीडिया और ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग भीमा कोरेगांव की ऐतिहासिक लड़ाई को अंग्रेज़ों की लड़ाई साबित करने की साज़िश कर रहे हैं. वो पूछ रहे हैं कि 200 साल पहले अंग्रेज़ों की जीत का जश्न मनाकर दलित देश विरोधी काम क्यों कर रहे हैं? असल में ये लोग हकीकत को बड़ी ही चालाकी से छुपा रहे हैं. क्योंकि अगर भीमा कोरेगांव जैसी ऐतिहासिक लड़ाई आपके लिए सिर्फ अंग्रेजी सेना की जीत है और उसपर गर्व करने का आपके पास कोई कारण नहीं है तो फिर सवाल है कि 42 मीटर ऊंचा इंडिया गेट आपके लिए गर्व का प्रतीक क्यों है?

इंडिया गेट प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की तरफ से लड़कर शहीद होने वाले भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था. 13,000 से ज्यादा शहीदों के नाम इंडिया गेट पर उकेरे गये हैं. ये सैनिक फ्रांस, मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और अफगानिस्तान जैसे मोर्चों पर लड़े थे जिनका मकसद ना भारत को आज़ाद कराना था औऱ ना ही अंग्रेजों से विद्रोह करना, तो बताईये आप आज़ाद भारत में इंडिया गेट को कैसे देखते हैं?
आप हाइफा युद्ध को कैसे देखते हैं?


23 सिंतबर 1918 को विदेशी सरज़मीं पर लड़ी गई हाइफा की ऐतिहासिक लड़ाई में भी तो भारतीय सैनिक अंग्रेज़ों की तरफ से लड़े थे. क्या उन राजपूत जवानों की बहादुरी पर गर्व नहीं करना चाहिए? तो क्या दिल्ली के तीन मूर्ति चौक जिसे पहले हाइफा चौक कहा जाता था, वहां से गुजरते हुए हमें सम्मान और जोश की अनुभूति नहीं करनी चाहिए? क्योंकि ये सभी सैनिक तो अंग्रेज़ों के लिए लड़े थे.

सारागढ़ी की लड़ाई का क्या ?

12 सितंबर 1897 को खैबर पख्तूनख्वा में लड़ी गई सारागढ़ी की लड़ाई को क्या कोई झुठला सकता है? ब्रिटिश सेना के 21 सिख सैनिकों ने अफगान सेना के 10 हज़ार सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये थे. क्या उस वक्त इन 21 बहादुरों का मकसद भारत की आज़ादी था? शायद नहीं, क्योंकि वो सब तो ब्रिटिश सेना की नौकरी कर रहे थे. तो क्या आप इस लड़ाई को इतिहास के पन्नों में दफना सकते हैं? क्या आपके लिए इस अदम्य साहस और वीरता की लड़ाई में गर्व की कोई बात नहीं?

एक सवाल मंगल पांडे के बारे में भी

मंगल पांडे ब्रिटिश सेना के सिपाही थे. मज़े से अंग्रेज अफसरों के हुक्म का पालन कर रहे थे. जब तक उनको मातादीन भंगी ने ये ताना नहीं दिया कि तु शूद्र से भेदभाव करता है लेकिन गाय के मांस का बना कारतूस मुंह से फाड़ता हैतबतक उन्हें ब्रिटिश सिपाही होने में कोई दिक्कत थी ही नहीं. मंगल पांडे ने वैसे भी अपनी हिंदू धार्मिक भावना के आधार पर विरोध किया था ना कि भारत मां की आज़ादी के लिए, तो क्या आप मंगल पांडे  गर्व करना छोड़ देंगे?फिर आप भीमा कोरेगांव की लड़ाई को बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? भीमा-कोरेगांव की लड़ाई तो फिर भी मानवता के खिलाफ खड़े लोगों से आजादी के लिए लड़ी गई थी.

1 जनवरी 1818 को पुणे के पास सिर्फ 500 महार सैनिकों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28 हज़ार सैनिकों की फौज को बुरी तरह धूल चटा दी थी. ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट के शौर्य और अदम्य साहस जैसी मिसाल इतिहास में कहीं नहीं मिलती. पेशवा राज भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का सबसे क्रूरतम शासनकाल था. मराठों के साथ छल करके ब्राह्मण पेशवा जब सत्ता की कुर्सी पर आये तो उन्होंने शूद्रों को नरक जैसी यातनाएं देना शुरू कर दिया. पेशवा राज में शूद्रों को थूकने के लिए गले में हांडी टांगना जरूरी था. साथ ही शूद्रों को कमर पर झाड़ू बांधना जरूरी था जिससे उनके पैरों के निशान मिटते रहें. शूद्र केवल दोपहर के समय ही घर से बाहर निकल सकते थे क्योंकि उस समय शरीर की परछाई सबसे छोटी होती है, परछाई कहीं ब्राह्मणों के शरीर पर ना पड़ जाये इसलिये उनके लिए समय निर्धारित था. शूद्रों को पैरों में घुंघरू या घंटी बांधनी जरूरी थी ताकि उसकी आवाज़ सुनकर ब्राह्मण दूर से ही अलर्ट हो जाये और अपवित्र होने से बच जाये.

ऐसे समय में जब पेशवाओँ ने नागवंशी मूलनिवासियो पर अत्यंत अमानवीय अत्याचार किये, उनका हर तरह से शोषण किया, तब उन्हें ब्रिटिश सेना में शामिल होने का मौका मिला. ब्रिटिश सेना में शामिल सवर्ण समाज के लोग शूद्रों से कोई संबंध नहीं रखते थे, इसलिये अलग महार रेजिमेंट बनाई गई. महारों के दिल में पेशवा साम्राज्य के अत्याचार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा था, इसलिये जब 1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में पेशवा सेना के साथ उनका सामना हुआ तो वो उनपर शेरों की तरह टूट पड़े. सिर्फ 500 महार सैनिकों ने बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों को धूल चटा दी और काट डाला. जाहिर सी बात है, जैसे हम हाइफा और सारागढ़ी के युद्ध के वीरों की वीरता को नहीं झुठला सकते, उसी तरह कोरेगांव के महार रेजिमेंट के जवानों के शौर्य को भी नहीं झुठलाया जा सकता.

1 जनवरी को इसी लड़ाई का 200वां शौर्य दिवस था जिसे मनाने देश भर के लाखों बौद्ध सिख,मुस्लिम,लिंगायत, मराठा,भीमा कोरेगांव में जुटे थे.ये लड़ाई अन्याय,शोषण और अपमान के प्रतिरोध का प्रतीक है जिसे युगों-युगों तक याद किया जाएगा. अंग्रेजों ने वीर महारों के याद में विजय स्तंभ बनवाया जो आज लाखों बौद्ध के लिए प्रेरणा का प्रतीक है.आपको सवाल उन पेशवाई गुंडों से पूछना चाहिए जो मूलनिवासियो के स्वाभीमान से जीने को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

 Reality of Bheema Koregaon , Brahman terror , Rss Conspiracy 

Tuesday, 2 January 2018

भीमा कोरेगांव का युद्ध सदीओ के जातिय उत्पीडन ,अपमान और ब्राह्मण अत्याचार के खिलाफ लड़ा गया

 जन उदय : गले में हांडी , पीछे झाड़ू ,शिक्षा , रोटी, नग्न बदन  और इज्जत के जिन्दगी से दूर , पानी नहीं मिलता था , रोटी नहीं मिलती थी , गुलाम मजदूरों की तरह काम कराया जाता  था , कुल मिला कर जानवरों से ज्यादा बदतर जिन्दगी . क्या कोई ऐसी  जिन्दगी से निजात नहीं पाना  चाहेगा ?? तो क्या इसके लिए युद्ध लड़ना होगा ?? लड़ेंगे ऐसी जिन्दगी जीने से अच्छा है युद्ध में मारे जाए “  बस यही भावना थी उन ५०० ने हाथो में तलवार थामी और चल दिए मीलो  पैदल युद्ध के मैदान  में , भूखे पेट , प्यासे लेकिन उनके सामने बस एक मकसद था उन ब्राह्मण गद्दारों के सर काटना ,जिन्होंने उनकी जिन्दगी को नरक बना कर रखा था

और जैसे ही  युद्ध के मैदान में पहुचे टूट पढ़े  उन २९०००  हजार ब्राह्मणों पर एक भूखे सेर की तरह और अंत सबको मालूम है


“”””हर साल 1 जनवरी को पूरा विश्व नए साल के आगमन की खुशियां मनाता है. हालांकि इस दिन एक और खास घटना घटी थी, जिससे दलित समाज के शौर्य का पता चलता है. यह दिन कोरेगांव के संघर्ष के विजय का दिन भी है, जिसमें महारों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी. भारत मंस अंग्रेज़ी राज़ की स्थापना के विषय में सामान्यतः लोग यह मानते हैं कि अंग्रेज़ों के पास आधुनिक हथियार और सेना थी इसलिए उन्होंने आसानी से भारत पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेजों ने भारत के राजाओं-महाराजाओं को अंग्रेज़ी सेना से नहीं बल्कि भारतीय सैनिकों की मदद से परास्त किया था. अंग्रेजों की सेना में बड़ी संख्या में भर्ती होने वाले ये सैनिक कोई और नहीं बल्कि इस देश के अछूतकहलाने वाले लोग थे. जानवरों सा जीवन जीने को विवश अछूतों को जब अंग्रेजी सेना में नौकरी मिली तो बेहतर जीवन और इज्जत के लिए ये अंग्रेजी सेना में शामिल हो गए. इसके परिणाम स्वरूप जो संघर्ष हुआ वह देश के इतिहास में दर्ज है.  


1 जनवरी 1818 को कोरेगांव के युद्ध में महार सैनिकों ने ब्राह्मणवादी पेशवाओं को धूल चटा दी थी. इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर प्रतिवर्ष 1 जनवरी को कोरेगांव जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे. डॉ आम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस (अंग्रेज़ी) के खंड 12 में द अनटचेबल्स एंड द पेक्स ब्रिटेनिकामें इस तथ्य का वर्णन किया है. ब्रिटिशों की भारत की जीत में वर्ष 1757 और 1818 का बड़ा महत्व है. 1757 में ईस्ट इण्डिया कंपनी और बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला के बीच युद्ध हुआ. इसे प्लासी की लड़ाई के नाम से जाना जाता है. यह पहला युद्ध था जिससे अंग्रेजों ने भारत की भूमि पर अपना अधिकार प्राप्त किया था. अंग्रजों ने भारत के अन्य भू-भाग पर अधिकार प्राप्त करने के लिए अंतिम युद्ध 1818  में किया. यह कोरेगांव की लड़ाई थी, जिसके माध्यम से अंग्रेजों ने मराठा साम्राज्य को ध्वस्त कर भारत में ब्रिटिश राज स्थापित किया. यहां 500 महार सैनिकों ने पेशवा राव के 28 हजार सैनिकों (घुड़सवारों एवं पैदल) की फौज को हराकर देश से पेशवाई का अंत किया. इन दोनों ही युद्धों में अंग्रेजों की जीत सिर्फ अछूतोंके कारण हुई. प्लासी की लड़ाई में अंग्रेजी सेना में रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में लड़े लोग दुसाध (पासवान) थे और कोरेगांव के युद्ध में शामिल लोग महार थे. इस तरह ब्रिटिशों के पहले और आखिरी युद्ध दोनों ही में अंग्रेजों को विजय दिलाने वाले लोग दलित ही थे. इतना ही नहीं विद्रोह के समय अंग्रेजों का साथ देने वाली रेजिमेंट बॉम्बे रेजिमेंट और मद्रास रेजिमेंट थी, जिसमें क्रमशः महाराष्ट्र के महार और दक्षिण के पर्रैया थे.

कोरेगांव भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित है. 01 जनवरी 1818 को सर्द मौसम में एक ओर कुल 28 हजार सैनिकों जिनमें 20000 हजार घुड़सवार और 8000 पैदल सैनिक थे, जिनकी अगुवाई पेशवा बाजीराव-II कर रहे थे तो दूसरी ओर बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्रीके 500 ‘महारसैनिक, जिसमें महज 250 घुड़सवार सैनिक ही थे. आप कल्पना कर सकते हैं कि सिर्फ 500 महार सैनिकों ने किस जज्बे से लड़ाई की होगी कि उन्होंने 28 हजार पेशवाओं को धूल चटा दिया. दूसरे शब्दों में कहें तो एक ओर ब्राह्मण राजबचाने की फिराक में पेशवाथे तो दूसरी ओर पेशवाओंके पशुवत अत्याचारोंसे बदलाचुकाने की फिराकमें गुस्से से तमतमाए महार’. आखिरकार इस घमासान युद्ध में ब्रह्मा के मुख से पैदाहुए पेशवा की शर्मनाक पराजय हुई. 500 लड़ाकों की छोटी सी सेना ने हजारों सैनिकों के साथ 12 घंटे तक वीरतापूर्वक लड़ाई लड़ी. भेदभाव से पीड़ित अछूतों की इस युद्ध के प्रति दृढ़ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महार रेजिमेंट के ज्यादातर सिपाही बिना पेट भर खाने और पानी के लड़ाई के पहले की रात 43 किलोमीटर पैदल चलकर युद्ध स्थल तक पहुंचे. यह वीरता की मिसाल है. इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है. यह महार रेजिमेंट के साहस का प्रतीक है. इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे. 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया.

दलित-आदिवासी समाज को अपने पूर्वज उन 500 महार सैनिकों को नमन करना चाहिए क्योंकि इस युद्ध में पेशवा की हार के बाद पेशवाईखतम हो गयी थी और अंग्रेजोंको इस भारत देश की सत्तामिली. इसके फलस्वरूप अंग्रेजोंने इस भारत देश में शिक्षणका प्रचार किया, जो हजारों सालों से बहुजन समाज के लिए बंद था. इसके उपरांत महात्मा फुले पढ़ पाएं और इस देश की जातीगत व्यवस्था को समझ पाएं. अगर महात्मा फुले न पढ़ पाते तो शिवाजी महाराज की समाधि कौन ढूंढ़ता. अगर महात्मा फुले न पढ़ पाते तो सावित्री बाईकभी इस देश की प्रथम महिला शिक्षिकान बन सकती थी. सावित्री बाई के अशिक्षित रहने की स्थिति में इस देश की महिलाएं कभी न पढ़ पाती, शाहू महाराज कभी आरक्षण नहीं दे पातें, और बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर भी नहीं पढ़ पातें. आप यह समझ सकते हैं कि अगर बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर नहीं पढ़ पाते तो दलितों-आदिवासियों की स्थिति आज क्या होती. इसलिए जिस तरह बाबासाहेब आम्बेडकर प्रतिवर्ष 1 जनवरी को कोरेगांव जाकर उन वीर दलितों का नमन किया करते थे, हमें भी उन वीरों के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करनी चाहिए और अपने पूर्वजों के शौर्य को याद कर गौरवान्वित होना चाहिए.””””
News Input  National Dastk

अब सवाल यह है  की आज  ब्राह्मण  जो  की सत्ता पर काबिज  है उसको इस दिवस  के मनाने से  परेशानी  इसलिए है क्योकि  ब्राह्मणों की शर्मनाक हार थी और जिस समाज को ये लोग जूते के निचे रखना चाहते  थे आज वो अपना कोई विजय  दिवस कैसे मना सकता है ??

कमाल की बात है आज भी ब्राह्मण आतंकवादी की तरह काम कर रहा है और अपने आपको देशभक्त कहता है और इस देश के मूलनिवासी  को देशद्रोही , ये वो लोग है जो गजनी से लेकर बाबर तक के भारत पर हमले में साथ थे
सबसे पहले भारत में बाहरी आक्रमणकारी सन्712 में मोहम्मद बिन कासिम आया था उसको लाने वाला और भारत की भौगोलिक जानकारी देने वाला एक "ब्राह्मण " था

जो कासिम का मंत्री बना और कासिम को सिंध में पहली बार विजय दिलवाई । उसके बाद मोहमद गजनी आया और मोहम्मद गजनी का सेनापति तिलक भी "ब्राह्मण " था ।
उसके बाद बाबर आया बाबर का सेनापति रैमीदास भी "ब्राह्मण" था ।
उसके बाद अंग्रेजो को भारत भूमि पर लाने वाले भी"ब्राह्मण " था ।
शहीद राजा नाहरसिंह को फांसी देने वाला गंगाधर कौल भी "ब्राह्मण "था ।
अंग्रेजों की बंदूकों में कारतूसों के लिए गाय की चर्बी सप्लाई करने वाला भी"ब्राह्मण" था ।

शहीद भगतसिंह के विरुद्ध गवाही देने वाला सोहनलाल वोहरा भी"ब्राह्मण " था । जाटों को लाहौर उच्चन्यायालय में शूद्र घोषित करवाने वाले भी"ब्राह्मण" था । गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट जिसके तहत जाटों को आरक्षण दिया गया, उसको रद्द करवाने वाले भी"ब्राह्मण" था । यानी भारत को गुलाम बनान ेवाला "ब्राह्मण" मुगलो के आगे मंत्री संतरी
बनने वाले ये बीरबल ब्राह्मण था और हमारे दिलों में हमेशा मुस्लिमो के प्रति नफरत भरते रहे और खुद मुश्लिम अक्रान्ताओ के दोस्त बने रहे ऐसा क्यो ??

और आज ये कहते है की दलित अपना इतिहास न जाने  और अपने विजय पर्व न बनाए  अब मीडिया इस बात को  तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है कि दलित ब्रिटिश  आर्मी की जीत का  जश्न मना रहे है जबकि हकीकत  यह है की   इस लड़ाई ने ही शुद्रो को  इज्जत से जीने की राह दिखाई  और इसी के बाद  ही ऐसे कानून आने शुरू  हुए  जिसमे दलितों  को  आम आदमी के अधिकार  मिलने लेगे शिक्षा मिलने लगी   बस  इसी  बात से ब्राह्मणों  को परेशानी  है इसीलिए उन्हें अंग्रेजो से भी नफरत है की उन्होंने शुद्रो  को समान कैसे बना दिया



Monday, 1 January 2018

गजनी हो या बाबर हर हमले में सहयोगी थे ब्राह्मण : राम भारत यादव

पहला विदेशी भारत पर आक्रमण करने वाले यूरेशियन आर्य(ब्राह्मण) ही हैं 5 हजार साल पहले
हम वर्षों से पढ़ते आ रहे है की भारत एक हजार साल तक गुलाम रहा लेकिन हमें यह नहीं बताया जाता कि भारत को गुलाम बनाने वाले लोग कौन था , किसकी वजह से गुलाम बना   दरसल हए ही  ब्राह्मण  लोग है जो  इस देश के सबसे बड़े दुश्मन  रहे है आइये  जानते है

सबसे पहले भारत में बाहरी आक्रमणकारी सन्712 में मोहम्मद बिन कासिम आया था उसको लाने वाला और भारत की भौगोलिक जानकारी देने वाला एक "ब्राह्मण " था

जो कासिम का मंत्री बना और कासिम को सिंध में पहली बार विजय दिलवाई । उसके बाद मोहमद गजनी आया और मोहम्मद गजनी का सेनापति तिलक भी "ब्राह्मण " था ।



उसके बाद बाबर आया बाबर का सेनापति रैमीदास भी "ब्राह्मण" था ।
उसके बाद अंग्रेजो को भारत भूमि पर लाने वाले भी"ब्राह्मण " था ।


शहीद राजा नाहरसिंह को फांसी देने वाला गंगाधर कौल भी "ब्राह्मण "था ।

अंग्रेजों की बंदूकों में कारतूसों के लिए गाय की चर्बी सप्लाई करने वाला भी"ब्राह्मण" था ।

शहीद भगतसिंह के विरुद्ध गवाही देने वाला सोहनलाल वोहरा भी"ब्राह्मण " था । जाटों को लाहौर उच्चन्यायालय में शूद्र घोषित करवाने वाले भी"ब्राह्मण" था । गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट जिसके तहत जाटों को आरक्षण दिया गया, उसको रद्द करवाने वाले भी"ब्राह्मण" था । यानी भारत को गुलाम बनान ेवाला "ब्राह्मण" मुगलो के आगे मंत्री संतरी

बनने वाले ये बीरबल ब्राह्मण था और हमारे दिलों में हमेशा मुस्लिमो के प्रति नफरत भरते रहे और खुद मुश्लिम अक्रान्ताओ के दोस्त बने रहे ऐसा क्यो ??

From Babar to Gouri , and other invaders brahman  supported / led the attack on India alongwith Muslim Invaders 
brahma invasion in India, Muslim and Brahman together attacked India , brahman culture, Treachery of Brahman 

Sunday, 31 December 2017

जल्द होगा दूसरा और अंतिम भीमा कोरेगांव का युद्ध ,

सिर्फ 500  महारो ने 2900 हजार  ब्राह्मणों को काट  दिया था भीमा कोरेगांव युद्ध में , ब्राह्मणों को नेस्तनाबूत करने के लिए  जल्द ही होगा  दूसरा  भीमा कोरेगाव युद्ध

पेशवाओ के राज में ब्राह्मणवाद इतना चरम पर था की अछूतो को सड़क पर चलने तक की अनुमति नहीं थी , यदि कोई अछूत सड़क पर चलता तो उसको आगे गले में हांड़ी लटकानी पड़ती थी ताकि उसका थूक जमीन पर न गिरे और पीछे झाड़ू लटकानी पड़ती थी ताकि उसके पदचिन्हो पर किसी ब्राह्मण का पैर न पड़े और वह अपवित्र न हो ।
पेशवा के ऐसे ही अमानवीय अत्याचारो से तंग आके महारास्ट्र के महारो ने अंग्रेजी सेना में भर्ती होके पेशवा बाजीराव को बुरी तरह हरा दिया था ।ये महारो का ही पराक्रम था की वे केवल 500 थे जबकि बाजीराव के 28000 सैनिक , पर केवल 500 महार अछूतो ने बाजीराव के 28000सैनिको को बुरी तरह धूल छटा दी थी ।
पेशवा बाजीराव का जनवरी 1818 में ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ कोरेगांव के पास अंतिम युद्ध हुआ । पेशवा की सेना में 28000 सैनिक थे और कंपनी की सेना में 500 पैदल और 50 घुड़सवार जिसमें अधिकतर महार थे । कंपनी की महार सेना ने पेशवा बाजीराव की सेना की धज्जियां उड़ा दीं । कोरेगांव का युद्ध स्मारक अछूत महार जाति के अद्भुत पराक्रम का परिचायक है । पेशवा ने अपने शासन काल में अछूतो पर जो अत्याचार किये थें , उनकी अछूत महारो में भयानक प्रतिक्रिया का कोरेगांव एक अद्भुत उदहारण है । इस युद्ध में पेशवा बाजीराव को पकड़ कर कंपनी की सेना ने मार कर पेशवा राज्य समाप्त कर उस पर अधिकार कर लिए और अछूतो को बहुत हद तक राहत मिली
भीमा नदीके तट पर बसा


गाँव  भीमा कोरेगांव’  पुणे ( महाराष्ट्र ) की कहानी  01 जनवरी 1818 का ठंडादिन
दो सेनाएंआमने - सामने 28000 सैनिकों सहित पेशवा बाजीराव – ( II ) 2’ के विरूद्ध
बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्रीके 500 ‘महारसैनिक ब्राह्मणराज बचाने की फिराक में पेशवा
और दूसरी तरफ पेशवाओंके पशुवत अत्याचारोंका बदलाचुकाने की फिराकमें गुस्से से तमतमाए
500 “ महार के बीच घमासान युद्धहुआ जिसमे ब्रह्माके मुँह से जनित’ ( पैदा हुए ) 28000 ‘पेशवाकी
500 महार योद्धाओ से शर्मनाक पराजयहुई हमारे सिर्फ 500 योद्धाओने 28000 पेश्वाओका नाश कर दिया
और ईसके साथ ही भारत से पेश्वाई खत्म कर दी ऐसे बहादुर थे हमारे पुरखे और ऐसा हमारा गौरवशाली ईतिहास है सब से पहले उन 500 ‘महार’ ( पूर्वजों ) करो नमनकरो ... क्यों ... ?? क्योंकी.........
1 ) उस हारके बाद, ‘पेशवाईखतम हो गयी थी | 2 ) ‘अंग्रेजोको इस भारत देश की सत्तामिली |
3 ) ‘अंग्रेजोने इस भारत देश में शिक्षणका प्रचार किया, जो हजारोसालों से बहुजनसमाज के
लिए बंदथा | 4 ) ‘महात्मा फुलेपढ़ पाए, और इस देश की जातीयता समजपाऐ |
5 ) अगर महात्मा फुलेन पढ़ पाते तो शिवाजी महाराजकी समाधीकोण ढूँढनिकलते |
6 ) अगर महात्मा फुलेपढ़पाते, तो सावित्री बाईभी इस देश की प्रथम महिला शिक्षिकान बन
सकती थी | 7 ) अगर सावित्री बाई’, पढ़पाई होती तो, इस देश की महिलाकभी न पढ़ पाती |
8 ). ‘शाहू महाराज’, ‘आरक्षणकभी न दे पाते 9 ) ‘डॉ. बाबा साहब’, कभी न
पढ़पाते | 10 ) अगर 1 जनवरी, 1818 को 500 ‘महारसैनिकों ने 28,000 ‘ब्राम्हण
( पेशवाओं ) को, मार न डाला होता तो ... !!! आज हम लोग कहा पे होते ... ?? आज भी भीमा कोरेगाव में
विजय स्तम्भ खड़ा है और उसपे उन हमारे शुरवीर ,बहादुर और वतन परस्त महार सैनिको जो उस युद्ध में सहिद हुए थे उनके नाम उस पे लिखा हुआ है। सोचो 28000÷500=56 के हिसाब से हमारे एक महार सैनिक ने
अकेले ने ही 56 पेशवाओ को काट डाला था कहि देखा,सुना या पढ़ा है ? ऐसे योद्धा के बारे में
नहीं ना ? क्यों की ..... भारत में ब्राह्मनो का राज चलता है और वे कभी नही चाहते
की हमारे वीरो की कहानी हम तक पहुचे

जाने पेशवा......कौन ??
महाराष्ट्र में राजा के बाद प्रधानमंत्री के पद को पेशवा कहा जाता था । जो केवल ब्राह्मण प्रजाति के लिए आरक्षित होता था । यदि राजा लड़ने में अक्षम (नाबालिक /बीमार या वॄद्ध ) हो तो पेशवा कुछ समय के किये उनका कार्यभार संभाल लिया करता था । यह पेशवा का पद वंशानुगत नही था । किंतु बालाजी बिश्वनाथ भट्ट ने यह पद अपने वंशजो के लिए वंशानुगत कर खुद राजा बन बैठा और अपने पुत्र बाजीराव पेशवा प्रथम को राजपाठ सौप दिया ।
आओ देखे पेशवाओ की अमानवीय हरकते......
छत्रपति शिवाजी महाराज के "रैयत " के अनुसार राजकार्य के घोर विरोधी पेशवा !!
शिवाजी महाराज को भरे दरबार मे शूद्र कह कर अपमानित करने वाले पेशवा !!
शिवाजी महाराज को शूद्र कह कर उनके राज्याभिषेक नहीं करने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज के विरोध मे यज्ञ करने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज कि हत्या की साजिश करने वाले.....पेशवा ....!!!
शिवाजी ने जिस अफजल खां को बाघनख से चीर दिया था , उस वक्त छत्रपति शिवाजी महाराज को तलवार से वार करने वाला अफजल खान का वकील चाटुकार कुष्णाभास्कर कुलकर्णी....पेशवा !!
संभाजी महाराज को मुगलो से पकडवाने वाले .....पेशवा .....!!!
संभाजी महाराज की "मनुस्मृति" के अनुसार ...मुगलो से हत्या करवाने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज की माँ साहेब जिजाऊ ,शिवपुत्र संभाजी का चरित्र हनन करने/ बदनामी कारक पुस्तक लिखने वाले पेशवा !!
विदेशी लेखक जेम्स लेने को पुणे स्थित भन्डारकर इंस्टीट्यूट मे "शिवाजी द किंग ईन इस्लामिक इंडिया " नामक पुस्तक लिखवाने वाले पेशवा ...!!!
राष्ट्रपिता फूले जी ने जब छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि को खोजा व साफ सफाई करने के बाद शिव जयंती मनाने का निर्णय लिया तो .....
इस "कुनभट" को इतना तव्वज्यो क्यो दे रहे हो... राष्ट्रपिता फूले जी को ऐसी सलाह देने वाला
शिवाजी महाराज को जातिगत सम्बोधन करने वाला ग्रामजोशी पेशवा !!
कुलमी.. कुनबी...कुर्मी जातियों को कुणभट कहकर नाम बिगाडने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवजी के पोते शाहुजी महाराज को शूद्र कहकर उनके के स्नान के समय वैदिक मन्त्रो की जगह पौराणिक मन्त्र पडने वाला पेशवा !!
छत्रपति शाहुजी महाराज को निचले ( शूद्र ) वर्ण का कहकर , महाराज को उनके रसोईघर मे नही आने देने वाला , महाराज को अपमानित करने वाला जातिवाद करने वाला पेशवा ..!!
शिवाजी महाराज के राज्य को नष्ट करने वाले
खत्म करने वाले पेशवा...!!
शिवाजी के द्वारा शुरू किए गये "शिव शक संवत " को बन्द करने वाले पेशवा,...!!!!
"शिव शक संवत " की जगह मुगलो का "फसली शक संवत" शुरू करने वाले मुगलो के गुलाम पेशवा...!!!
अछूतो के गले मे मिटटी का बर्तन व कमर मे झाडू लटकाने वाले अमानविय/जातिवाद/वर्णवादी/दुष्ट पेशवा...!!
महिलाओ को वासना पूर्ति का साधन समझने वाले/कामूक/अन्यायी/ अत्यचारी/दरिन्दे/नाचने वाली/ गाने वाली /मुजरा करने वाली मस्तानी के पीछे अपनी पत्नी को धोखा देने वाले , अपनी प्रजा को धोखा देने वाले
पेशवा  
शिवाजी महाराज को भरे दरबार मे शूद्र कह कर अपमानित करने वाले पेशवा !! शिवाजी महाराज को शूद्र कह कर उनके राज्याभिषेक नहीं करने वाले पेशवा !! छत्रपति शिवाजी महाराज के विरोध मे यज्ञ करने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज कि हत्या की साजिश करने वाले.....पेशवा ....!!! शिवाजी ने जिस अफजल खां को बाघनख से चीर दिया था , उस वक्त छत्रपति शिवाजी महाराज को तलवार से वार करने वाला अफजल खान का वकील चाटुकार कुष्णाभास्कर कुलकर्णी....पेशवा !! संभाजी महाराज को मुगलो से पकडवाने वाले .....पेशवा .....!!!
संभाजी महाराज की "मनुस्मृति" के अनुसार ...मुगलो से हत्या करवाने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवाजी महाराज की माँ साहेब जिजाऊ ,शिवपुत्र संभाजी का चरित्र हनन करने/ बदनामी कारक पुस्तक लिखने वाले पेशवा !!
विदेशी लेखक जेम्स लेने को पुणे स्थित भन्डारकर इंस्टीट्यूट मे "शिवाजी द किंग ईन इस्लामिक इंडिया " नामक पुस्तक लिखवाने वाले पेशवा ...!!!
राष्ट्रपिता फूले जी ने जब छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि को खोजा व साफ सफाई करने के बाद शिव जयंती मनाने का निर्णय लिया तो .....
इस "कुनभट" को इतना तव्वज्यो क्यो दे रहे हो... राष्ट्रपिता फूले जी को ऐसी सलाह देने वाला
शिवाजी महाराज को जातिगत सम्बोधन करने वाला ग्रामजोशी पेशवा !!
कुलमी.. कुनबी...कुर्मी जातियों को कुणभट कहकर नाम बिगाडने वाले पेशवा !!
छत्रपति शिवजी के पोते शाहुजी महाराज को शूद्र कहकर उनके के स्नान के समय वैदिक मन्त्रो की जगह पौराणिक मन्त्र पडने वाला पेशवा !!
छत्रपति शाहुजी महाराज को निचले ( शूद्र ) वर्ण का कहकर , महाराज को उनके रसोईघर मे नही आने देने वाला , महाराज को अपमानित करने वाला जातिवाद करने वाला पेशवा ..!!
शिवाजी महाराज के राज्य को नष्ट करने वाले
खत्म करने वाले पेशवा...!!
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पेशवा

The Battle of Bhima Koregaon ist January 1818 where in only 500 Mahars defeated the Force of 2900  Peshwa Brahman . Reality of Bhima Koregaon . Battle of Bhima Koregaon , Mahars of India , Aboriginals of India , Brahman terror , Brahman treachery ,
The Brahmans the a biggest treachery of  India

Aboriginals honour , Caste system in india